MYTHOLOGICAL STORIES=পৌরাণিক কাহিনী ·
2>MTL=Post=2***महालक्ष्मीबेलवृक्ष***( 1 to 11 )
1------------ महालक्ष्मी ने क्यों धरा बेलवृक्ष का रूप?=+mtl
2-------------धनतेरस से जुडी है एक पौराणिक कलेजा भर आने वाली कहानी!=+mtl
3------------ বিষ্ণুর মৎস্য অবতার=+mtl
4-------------पंच कन्याए जिनके स्मरण मात्र से महापातक नष्ट हो जाते है=+mtl
5------------ उसका नाम शैब्या =एक पतिव्रता ब्राह्मणी=+mtl
6-------------सावित्री सत्यवान कथा (Savitri Satyavan katha)=+mtl
7-------------सती अनुसुइया की कहानी (Sati Anasuya Story)=+mtl
8>-----------तुलसी और शालिग्राम विवाह की कथा
9>------------लक्ष्मी कहाँ रहती हैं?
8>-----------तुलसी और शालिग्राम विवाह की कथा
9>------------लक्ष्मी कहाँ रहती हैं?
10>क्यों नहीं लेना चाहते थे शुकदेवजी जन्म, क्या हुआ उनके जन्म के बाद?
11>इस कहानी से समझे जीवन का सही अर्थ...
11>इस कहानी से समझे जीवन का सही अर्थ...
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1> महालक्ष्मी ने क्यों धरा बेलवृक्ष का रूप ?
शिव ने क्यों माना बिल्ववृक्ष को शिवस्वरूप।
नारदजी ने एक बार भोलेनाथ की स्तुति कर पूछा – प्रभु आपको प्रसन्न करने के लिए सबसे उत्तम और सुलभ साधन क्या है. हे त्रिलोकीनाथ आप तो निर्विकार और निष्काम हैं, आप सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं. फिर भी मेरी जानने की इच्छा है कि आपको क्या प्रिय है?
शिवजी बोले-
नारदजी वैसे तो मुझे भक्त के भाव सबसे प्रिय हैं, फिर भी आपने पूछा है तो बताता हूं.
मुझे जल के साथ-साथ बिल्वपत्र बहुत प्रिय है. जो अखंड बिल्वपत्र मुझे श्रद्धा से अर्पित करते हैं मैं उन्हें अपने लोक में स्थान देता हूं.
नारदजी भगवान शंकर औऱ माता पार्वती की वंदना कर अपने लोक को चले गए. उनके जाने के पश्चात पार्वतीजी ने शिवजी से पूछा- हे प्रभु मेरी यह जानने की बड़ी उत्कट इच्छा हो रही है कि आपको बेलपत्र इतने प्रिय क्यों है. कृपा करके मेरी जिज्ञासा शांत करें.
शिवजी बोले-
हे शिवे! बिल्व के पत्ते मेरी जटा के समान हैं. उसका त्रिपत्र यानी तीन पत्ते, ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद हैं. शाखाएं समस्त शास्त्र का स्वरूप हैं. बिल्ववृक्ष को आप पृथ्वी का कल्पवृक्ष समझें जो ब्रह्मा-विष्णु-शिवस्वरूप है.
हे पार्वती! स्वयं महालक्ष्मी ने शैल पर्वत पर बिल्ववृक्ष रूप में जन्म लिया था इस कारण भी बेल का वृक्ष मेरे लिए अतिप्रिय है. महालक्ष्मी ने बिल्व का रूप धरा, यह सुनकर पार्वतीजी कौतूहल में पड़ गईं.
पार्वतीजी कौतूहल से उपजी जिज्ञासा को रोक न पाई. उन्होंने पूछा- देवी लक्ष्मी ने आखिर बिल्ववृक्ष का रूप क्यों लिया? आप यह कथा विस्तार से कहें.
भोलेनाथ ने देवी पार्वती को कथा सुनानी शुरू की. हे देवी, सत्ययुग में ज्योतिरूप में मेरे अंश का रामेश्वर लिंग था. ब्रह्मा आदि देवों ने उसका विधिवत पूजन-अर्चन किया था.
इसका परिणाम यह हुआ कि मेरे अनुग्रह से वाणी देवी सबकी प्रिया हो गईं. वह भगवान विष्णु को सतत प्रिय हो गईं.
मेरे प्रभाव से भगवान केशव के मन में वाग्देवी के लिए जितनी प्रीति उपजी हुई वह स्वयं लक्ष्मी को नहीं भाई.
लक्ष्मी देवी का श्रीहरि के प्रति मन में कुछ दुराव पैदा हो गया. वह चिंतित और रूष्ट होकर चुपचाप परम उत्तम श्रीशैल पर्वत पर चली गईं.
वहां उन्होंने तप करने का निर्णय किया और उत्तम स्थान का चयन करने लगीं.
महालक्ष्मी ने उत्तम स्थान का निश्चय करके मेरे लिंग विग्रह की उग्र तपस्या प्रारम्भ कर दी. उनकी तपस्या कठोरतम होती जा रही थी.
हे परमेश्वरी कुछ समय बाद महालक्ष्मी जी ने मेरे लिंग विग्रह से थोड़ा उर्ध्व में एक वृक्ष का रूप धारण कर लिया. अपने पत्तों और पुष्प द्वारा निरंतर मेरा पूजन करने लगीं.
इस तरह महालक्ष्मी ने कोटि वर्ष ( एक करोड़ वर्ष) तक घोर आराधना की. अंततः उन्हें मेरा अनुग्रह प्राप्त हुआ.
मैं वहां प्रकट हुआ और देवी से इस घोर तप की आकांक्षा पूछकर वरदान देने को तैयार हुआ.
महालक्ष्मी ने मांगा कि श्रीहरि के हृदय में मेरे प्रभाव से वाग्देवी के लिए जो स्नेह हुआ है वह समाप्त हो जाए.
शिवजी बोले-
मैंने महालक्ष्मी को समझाया कि श्रीहरि के हृदय में आपके अतिरिक्त किसी और के लिए कोई प्रेम नहीं है. वाग्देवी के प्रति उनका प्रेम नहीं अपितु श्रद्धा है.
यह सुनकर लक्ष्मीजी प्रसन्न हो गईं और पुनः श्रीविष्णु के ह्रदय में स्थित होकर निरंतर उनके साथ विहार करने लगी.
हे पार्वती! महालक्ष्मी के हृदय का एक बड़ा विकार इस प्रकार दूर हुआ था. इस कारण हरिप्रिया उसी वृक्षरूपं में सर्वदा अतिशय भक्ति से भरकर यत्नपूर्वक मेरी पूजा करने लगी.
हे पार्वती इसी कारण बिल्व का वृक्ष, उसके पत्ते, फलफूल आदि मुझे बहुत प्रिय है. मैं निर्जन स्थान में बिल्ववृक्ष का आश्रय लेकर रहता हूं.
बिल्ववृक्ष को सदा सर्वतीर्थमय एवं सर्वदेवमय मानना चाहिए. इसमें तनिक भी संदेह नहीं है. बिल्वपत्र, बिल्वफूल, बिल्ववृक्ष अथवा बिल्वकाष्ठ के चन्दन से जो मेरा पूजन करता है वह भक्त मेरा प्रिय है.
बिल्ववृक्ष को शिव के समान ही समझो. वह मेरा शरीर है. जो विल्व पर चंदन से मेरा नाम अंकित करके मुझे अर्पण करता है मैं उसे सभी पापों से मुक्त करके अपने लोक में स्थान देता हूं.
हे देवी उस व्यक्ति को स्वयं लक्ष्मीजी भी नमस्कार करती हैं जो विल्व से मेरा पूजन करते हैं. जो बीलवमुल में प्राण छोड़ता है उसको रूद्र देह प्राप्त होता है.
मेरी पूजा के लिए बेल के उत्तम पत्तों का ही प्रयोग करना चाहिए
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2>धनतेरस से जुडी है एक पौराणिक कलेजा भर आने वाली कहानी!वाली से ठीक दो दिन पहले यानि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है धनतेरस का त्यौहार, इस दिन सोने चांदी की खूब खरीदारी होती है और रात में दिन दान द्वारा धन्वन्तरि की पूजा होती है. लेकिन इस दिन के पीछे की छुपी कहानी जान आप बच सकते है असमय/अकाल मृतरयु से. एक बार यमराज ने अपने गणो से पूछा की तुम लोग मेरे कहने पर जीवो के प्राण हरने का काम करते हो क्या तुम्हे कभी इसमें कुछ अजीब नही लगा या तुम्हे तरस नही आया. इस्पे सब गणो ने अपनी कर्तव्य निष्ठां जताई लेकिन जब यमराज ने पुनः पूछा की संकोच न करो मुझे बताओ तो एक गण ने बताया की महाराज एक बार ऐसा हुआ था की हमारा भी कलेजा भर आया था.
राजा हिमा को पुत्र हुआ तो आनंद उत्सव हुआ लेकिन जन्म कुंडली के हिसाब से उसकी मृत्यु शादी के चार दिन बाद ही निश्चित थी, इस कारन राजा उसे एक जंगल में यमुना नदी के किनारे एक गुफा में रख आया. लेकिन होनी को कौन टाल सकता था, हंस राजा की बेटी वंहा से वन विहार करती गुजरी और राजकुमार को देख रीझ गई और गन्धर्व विवाह कर लिया.
दोनों की जोड़ी कामदेव और रति सरीखी थी दोनों में अटूट प्रेम था लेकिन जब चौथे दिन हम राजकुमार के प्राण हरने गए तो हमारा कलेजा पसीज गया. यमराज में सुन द्रवित हो गए लेकिन विधि के विधान को कौन टाल सकता है तब एक यम ने पूछा की प्रभु ऐसी अकाल मृत्यु को टाला नही जा सकता है क्या?
इस पर यमराज ने कहा की धन तेरस के दिन दिन दान और विधि पूर्वक पूजन होता है धन धन्य को खुला रखा जाता है और रात भर तेल के दिए जलाये जाते है उन मनुष्यो की कभी भी अकाल मृत्यु नही होती है.
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3> বিষ্ণুর মৎস্য অবতার
হিন্দু পুরাণে বিষ্ণুর প্রথম অবতার। মৎস্যের উর্ধ্বশরীর চতুর্ভূজ বিষ্ণুর এবং নিম্নাঙ্গ একটি মাছের।
মৎস্য পুরাণ অনুসারে, প্রাগৈতিহাসিক দ্রাবিড় রাজ্যের বিষ্ণুভক্ত রাজা সত্যব্রত (যিনি পরে মনু নামে পরিচিত হন) একদিন নদীর জলে হাত ধুচ্ছিলেন। এমন সময় একটি ছোটো মাছ তাঁর হাতে চলে আসে এবং তাঁর কাছে প্রাণভিক্ষা চায়। তিনি মাছটিকে একটি পাত্রে রাখেন। কিন্তু মাছটি ক্রমশ বৃদ্ধিপ্রাপ্ত হতে থাকে। তিনি সেটিকে প্রথমে একটি পুষ্করিণীতে, পরে নদীতে এবং শেষে সমুদ্রে ছেড়ে দেন। কিন্তু কোনো ফল হয় না। সেটি এতটাই বৃদ্ধি পায় যে সকল আধারই পূর্ণ হয়ে যায়। শেষে মাছটি বিষ্ণুর রূপে আত্মপ্রকাশ করে সত্যব্রতকে জানান যে সাত দিনের মধ্যে প্রলয় সংঘটিত হবে এবং সকল জীবের বিনাশ ঘটবে। তাই সত্যব্রতকে নির্দেশ দেওয়া হয় যে সকল প্রকার ঔষধি, সকল প্রকার বীজ, সপ্তর্ষি, বাসুকি নাগ ও অন্যান্য প্রাণীদের সঙ্গে নিতে।
প্রলয় সংঘটিত হলে মৎস্যরূপী বিষ্ণু পূর্বপ্রতিশ্রুতি অনুসারে পুনরায় আবির্ভূত হন। তিনি সত্যব্রতকে একটি নৌকায় আরোহণ করতে বলেন এবং তাঁর শিঙে বাসুকি নাগকে নৌকার কাছি হিসেবে বাঁধতে বলেন।
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4> पंच कन्याए
पंच कन्याए जिनके स्मरण मात्र से महापातक नष्ट हो जाते है
किसी पवित्र उद्देश्य या भावना से किया गया तप, त्याग या संयम ही व्रत-उपवास के रूप में प्रचलित है.संकलप का ही दूसरा नाम व्रत है. पतिव्रत या पत्नीव्रत का पालन करना तमाम व्रत-उपवासों में सर्वोच्च स्तर के माने जाते हैं.ज्ञात और अज्ञात रूप से दुनिया में एसी अनेक स्त्रियां हो चुकी हैं, जिन्होंने पतिव्रता धर्म का पालन किया है.
"अहिल्या द्रौपदी सीता तारा मंदोदरी तथा
पंचकन्या ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशनम्"
गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या, पांडवों की पत्नी द्रौपदी, प्रभु रामचंद्र की पत्नी सीता, राजा हरिश्चंद्र की पत्नी तारामती व रावण की पत्नी मंदोदरी, इन पांच कन्याओ का जो स्मरण करता है, उसके महापातक नष्ट होते हैं.
1. अहिल्या - ऋषि गौतम कि पत्नी जिन्हें गौतम ऋषि ने पत्थर बन जाने का श्राप दिया,और भगवान श्री राम ने अपने चरण के स्पर्श से उन्हें फिर से नारी बना दिया था.
2. द्रौपदी - राजा द्रुपद की पुत्री तथा पांच पांडवों की पत्नी द्रौपदी को सती के साथ ही पंच कुवांरी कन्याओं में भी शामिल किया जाता है.
3. सीता - भगवान श्री रामचंद्र जी की पत्नी सीता,जब प्रभु श्री राम को वनवास हुआ तो वनवासी वस्त्र धारण करके अपने पति श्री राम के साथ महलों के सब सुख त्यागकर १४ वर्ष वन में रही.
4. मंदोदरी - मंदोदरी लंकापति रावण की पत्नी थी.हेमा नाम की अप्सरा के गर्भ से मंदोदरी ने जन्म लिया तथा रावण की प्रधान पटरानी बनी.मंदोदरी ही इन्द्रजीत मेघनाद की माता तथा मयासुर की कन्या थी.रावण को सदा अच्छी सलाह देती थी.पंच सती में शामिल होने के साथ-साथ इनकी गणना भी पंचकन्याओं में की
जाती है.
5. तारामती - सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की पत्नी तारामति,जब राजा हरिश्चन्द्र ने अपना राज्य विश्वामित्र जी को
दिया तो राजा कंगालो की भांति राज्य से चले गए और अपना दिया हुआ वचन पूरा करने के लिए अपनी
पत्नी और बेटे को भी बेच दिया.
पंच महान सती
इसी तरह "पंच सती" भी है.जिन्हें हिन्दुओं के धार्मिक इतिहास में जिन पांच स्त्रियों को पतिव्रता धर्म का पालन करने वाली सती माना गया है, वे निम्र प्रकार हैं:- अनुसूया, द्रोपदी, सुलक्षणा, सावित्री , मंदोदरी
1. अनुसूया - पतिव्रता स्त्रियों में अनुसूया का स्थान सबसे ऊँचा है. वे अत्रि-ऋषि की पत्नी थीं. जब सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा में यह विवाद छिड़ा कि सर्वश्रेष्ठ पतिव्रता कौन है? अंत में यही निष्कर्ष निकला कि अत्रि पत्नी अनुसूया ही सर्वश्रेष्ठ पतिव्रता हैं. अनुसूया के सतीत्व की परीक्षा लेने के लिये त्रिदेव अनुसूया के आश्रम में ब्राह्मण बनकर भिक्षा मांगने पंहुचे.त्रिदेव ने अनुसूया से कहा कि जब आप अपने संपूर्ण वस्त्र उतार देंगी तभी हम भिक्षा स्वीकार करेंगे. तब अनुसूया ने अपने सतीत्व के बल पर उक्त तीनों देवों को अबोध बालक बनाकर उन्हें भिक्षा दी. उल्लैख मिलता है कि अनुसूया ने ही सीता को पतिव्रत की शिक्षा दी थी.
2. द्रौपदी - राजा द्रुपद की पुत्री तथा पांच पांडवों की पत्नी द्रौपदी को सती के साथ ही पंच कन्याओं में भी शामिल किया जाता है.
3. सुलक्षणा - रावण के परम तेजस्वी पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) की पत्नी सुलक्षणा को पंच सती में गिना जाता है.
4. सावित्री - ये ऋषि अश्वपति की पुत्री थीं. इनके पति का नाम सत्यवान था. जब सावित्री के पति सत्यवान की असमय ही मृत्यु हो गई तो सावित्री ने अपनी तपस्या के बल पर सत्यवान को पुनर्जीवित कर लिया. सावित्री के इसी तपोबल के कारण इन्हैं पंच सती में शामिल किया गया है.
5. मंदोदरी - मंदोदरी लंकापति रावण की पत्नी थी. हेमा नाम की अप्सरा के गर्भ से मंदोदरी ने जन्म लिया तथा रावण की प्रधान पटरानी बनी. मंदोदरी ही इन्द्रजीत मेघनाद की माता तथा मयासुर की कन्या थी. रावण को सदा अच्छी सलाह देती थी.पंच सती में शामिल होने के साथ-साथ इनकी गणना भी पंचकन्याओं में की जाती है.
!! जय जय श्री राधाकृष्ण !!
जय गोविंदा जय गोपाला, जय जय श्री राधेकृष्णा !!
मुरली मनोहर, कृष्ण कन्हैया ! सब बोलो जय श्री राधेकृष्णा !!
जीवन में परम सुख़, आनन्द, प्रेम, करुणा और कल्याण के लिये सदैव जपते रहिये !! समस्त मंत्रो का मूलः
और सभी शास्त्रो और ग्रंथो का सार
हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे !
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे !
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5> उसका नाम शैब्या =एक पतिव्रता ब्राह्मणी
प्राचीन काल की बात है , मध्य देश में अत्यंत शोभायमान नगरी थी !
उसमे एक पतिव्रता ब्राह्मणी रहती थी , उसका नाम शैब्या था !
उसका पति पूर्व जन्म के पाप से कोढ़ी हो गया था !
उसके शरीर में अनेको घाव हो गए थे जो बराबर बहते रहते थे !
शैब्या अपने पति की सेवा में निरंतर लगी रहती थी , उसके पति के मन में जो भी आता उसे यथा शक्ति पूर्ण करने का प्रयास करने में सलग्न रहती थी और प्रतिदिन देवता की भांति स्नेह से दोष बुद्धि त्याग कर पूजा करती थी !
एक दिन उसके पति ने सड़क से जाती हुई एक परम सुंदरी वैश्या को देखा , उस पर द्रष्टि पड़ते ही वह अत्यंत मोह के वशीभूत हो गया !
उसकी चेतना पर कामदेव ने अधिकार कर लिया और तेज साँस लेता हुआ उदास हो गया , पत्नी आई और पूछा स्वामी क्या हुआ बताए ....मै यथा संभव पूरा करने का प्रयास करुँगी , एक मात्र आप ही मेरे गुरु व् प्रियतम है !
पत्नी के इस प्रकार पूछने पर उसने कहा : प्रिये , उस कार्य को न तुम पूर्ण कर सकती हो न मै ....अतः व्यर्थ की बात करना उचित नहीं !
पतिव्रता बोली : नाथ मै आपका मनोरथ जानकर विश्वास के साथ उसे सिद्ध कर दूंगी आप आज्ञा दीजिए!
कोढ़ी ने कहा : साध्वी ...अभी अभी यहाँ से एक परम सुन्दरी वैश्या जा रही थी जो की बड़ी नवयोवना दिख रही थी तथा उसका शरीर सब और से बड़ा मनोरम था , उसे देखने के बाद मेरा मन कामाग्नि से दग्ध हो रहा है यदि तुम्हारी और से उस नवयौवना को प्राप्त कर संकू तो जीवन सफल हो जाए !
प्रभो ! आप धेर्य रखिए मै यथा संभव प्रयास अवश्य करुँगी !
यह कह कर पतिव्रता ने मन ही मन कुछ विचार किया और रात्रि के अंतिम भाग में वह गोबर और झाड़ू लेकर वैश्या के घर गयी और उसके उठने से पहले उसके यहाँ झाड़ू लगाकर गोबर से उसका आँगन लिप दिया और तुरंत घर को लौट आई ...ऐसा उसने तिन दिन तक किया !
उधर वैश्या ने अपनी दसियों से पूछा की यह नित्य हमारा आँगन कोन साफ करता है तो उन्होंने कहा हमें नहीं ज्ञात !
.....तब एक दिन उसने रात्रि के अंतिम पहर में किसी की आहट सुनी और देखा ....तो उसकी नजरे ब्राह्मणी पर पड़ी.....
तो उसने कहा : हाय हाय आप क्या करती है ...रहने दीजिए और वैश्या ने उसके पांव पकड़ लिए और पुनः कहा : पतिव्रते !
आप मेरी आयु , शरीर , संपत्ति , यश , तथा कीर्ति का विनाश करने की चेष्टा क्यों कर रही है ...साध्वी आप जो मांगोगी वह मै सहर्ष दे दूंगी , यह बात मै दृढ निश्चय से कह रही हूँ !
पतिव्रता ने वैश्या से कहा : मुझे धन आदि की नही अपितु तुम्हारी आवश्यकता है करो तो बताऊ !
वैश्या बोली : जी निश्चित ही पूर्ण करुँगी आपका कार्य बताए !
पतिव्रता लजाते लजाते वह कार्य जो उसके पति को प्रिय था कह सुनाया !
दुर्गन्धयुक्त मनुष्य के साथ संसर्ग का विचार करके उसे बड़ा मन में दुःख हुआ तब भी वह पतिव्रता से बोली .....यदि आप उन्हें यहाँ लें आये तो मै उनका मनोरथ पूर्ण कर दूंगी !
पतिव्रता ने कहा : ठीक है रात्रि में मै उन्हें ले आउंगी ! और घर पहुँच कर उसने पति को सारी बात बता दी .......वह बोला मै तो चलने अक्षम हूँ ....वह बोली मै आपको पीठ पर उठाकर ले चलूंगी !
कोढ़ी बोला : देवी जो काम तुमने किया है वह अन्य के लिए अति दुष्कर है !
उसी नगर में किसी धनि के घर चोरो ने डाका डाला जब यह बात राजा को पता चली तो उन्होंने चोर पकड़ने का सैनिको को आदेश दिया ....सैनिको ने जंगल में एक तपस्वी “ माण्डव्य ऋषि जो की तपस्या में लींन थे उन्हें यह समझके की यह अभिमय कर रहा है चोर समझ के पकडके राजा के सामने लाए राजा ने कहा जो दण्ड चोर का वह इसे दी जाए ........!
“ मांडव्य ऋषि को नगर के बिच में गड़े एक शूल पर रख दिया ...वह शूल उनके गुदा द्वार से होता हुआ मस्तिष्क के पार हो गया .....इसी बिच वह साध्वी अपने पति को पीठ पर उठा कर वैश्या के यहाँ चली जा रही थी कि उसके पति का शरीर ऋषि से छू गया और उनकी समाधी टूट गयी !
माण्डव्य ऋषि कुपित होकर बोले : “ जिसने इस समय मुझे गाढ़ वेदना का अनुभव करानेवली अवस्था में पहुचाया , वह सूर्योदय होते ही भस्म हो जाए !”
माण्डव्य के इतना कहते ही वह कोढ़ी जमीन पर गिर गया !
यह देख पतिव्रता बोली “ आज से तिन दिनों तक सूर्य का उदय ही ना हो ! और पति को घर लाकर शय्या पर सुलाकर उसका हाथ पकड़े बैठे रही !
इस प्रकार सूर्य का उदय ही न हुआ ...त्रिलोकी व्यथित हो उठी , सारे देवता इन्द्र को आगे कर ब्रह्मा जी के पास गए और ब्राह्मणी और माण्डव्य ऋषि का वृतांत बताया !!
तब ब्रह्मा जी देवताओ सहित कई विमानों से उस कोढ़ी के घर पहुचे उनके विमानों की कांति सेकड़ो सूर्य की भांति थी ....!
ब्रह्माजी ने कहा : माता सम्पूर्ण देवताओ, ब्राह्मणों,गौ,आदि प्राणियों की म्रत्यु होने की सम्भावना है .....ऐसा कार्य आपको क्यों पसंद आया .....? सूर्योदय के प्रति जो तुम्हारा क्रोध है उसे त्याग दो !
पतिव्रता बोली : एक मात्र पति ही मेरे गुरु है ! इनसे बढ़कर सम्पूर्ण लोको में कोई नही ! सूर्योदय होते ही मुनि के शाप से इनकी म्रत्यु हो जाएगी इस हेतु मैंने सूर्य को शाप दिया है ! ना कि लोभ , क्रोध , मोह , मात्सर्य अथवा काम के वश होकर दिया है !
ब्रह्माजी बोले : माता ! एक की म्रत्यु से तीनो लोको का हित हो रहा है , ऐसी दशा में तुम्हे बहुत पुन्य होगा !
पतिव्रता बोली : पति का त्याग करके आपका कल्याणमय सत्यलोक भी अच्छा नहीं लगता !
ब्रह्माजी ने कहा : सूर्योदय होने पर जब सारी त्रिलोकी स्वास्थ्य हो जाएगी तब तुम्हारे पति के भस्म हो जाने पर भी मै तुम्हारा कल्याण – साधन करूँगा , हमलोगों के आशीर्वाद से यह कोढ़ी ब्राह्मण कामदेव के समान सुन्दर हो जाएगा !
ब्रह्माजी के यो कहने पर क्षण भर विचार करके उसने हाँ कहकर स्वीकृति दे दी !
फिर तो तत्काल सूर्योदय हुआ और कोढ़ी राख का ढेर हो गया और पुनः राख से कामदेव के सामान सुन्दर रूप धारण कर ब्राह्मण प्रकट हुआ !
सभी प्रसन्न हुए स्वर्ग से सूर्य के सामान तेजस्वी विमान आया उसमे दोनों सवार हो देवताओ के साथ चले गए !!
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6>सावित्री सत्यवान कथा (Savitri Satyavan katha)
Savitri Satyavan Hindi Story : महाभारत एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमे अनेकों पौराणिक, धार्मिक कथा-कहानियों का संग्रह है। ऐसी ही एक कहानी है सावित्री और सत्यवान की, जिसका सर्वप्रथम वर्णन महाभारत के वनपर्व में मिलता है। जब वन में गए युधिष्ठर, मार्कण्डेय मुनि से पूछते है की क्या कोई अन्य नारी भी द्रोपदी की जैसे पतिव्रता हुई है जो पैदा तो राजकुल में हुई है पर पतिव्रत धर्म निभाने के लिए जंगल-जंगल भटक रही है। तब मार्कण्डेय मुनि, युधिष्ठर को कहते है की पहले भी सावित्री नाम की एक नारी इससे भी कठिन पतिव्रत धर्म का पालन कर चुकी है और मुनि, युधिष्ठर को यह कथा सुनाते है।
मद्रदेश के अश्वपतिनाम का एक बड़ा ही धार्मिक राजा था। जिसकी पुत्री का नाम सावित्री था। सावित्री जब विवाह योग्य हो गई। तब महाराज उसके विवाह के लिए बहुत चिंतित थे। उन्होंने सावित्री से कहा बेटी अब तू विवाह के योग्य हो गयी है। इसलिए स्वयं ही अपने योग्य वर चुनकर उससे विवाह कर लें। धर्मशास्त्र में ऐसी आज्ञा है कि विवाह योग्य हो जाने पर जो पिता कन्यादान नहीं करता, वह पिता निंदनीय है। ऋतुकाल में जो स्त्री से समागम नहीं करता वह पति निंदा का पात्र है। पति के मर जाने पर उस विधवा माता का जो पालन नहीं करता । वह पुत्र निंदनीय है।
तब सावित्री शीघ्र ही वर की खोज करने के लिए चल दी। वह राजर्षियों के रमणीय तपोवन में गई। कुछ दिन तक वह वर की तलाश में घुमती रही। एक दिन मद्रराज अश्वपति अपनी सभा में बैठे हुए देवर्षि बातें कर रहे थे। उसी समय मंत्रियों के सहित सावित्री समस्त वापस लौटी। तब राजा की सभा में नारदजी भी उपस्थित थे। नारदजी ने जब राजकुमारी के बारे में राजा से पूछा तो राजा ने कहा कि वे अपने वर की तलाश में गई हैं। जब राजकुमारी दरबार पहुंची तो और राजा ने उनसे वर के चुनाव के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि उन्होंने शाल्वदेश के राजा के पुत्र जो जंगल में पले-बढ़े हैं उन्हें पति रूप में स्वीकार किया है।
उनका नाम सत्यवान है। तब नारदमुनि बोले राजेन्द्र ये तो बहुत खेद की बात है क्योंकि इस वर में एक दोष है तब राजा ने पूछा वो क्या तो उन्होंने कहा जो वर सावित्री ने चुना है उसकी आयु कम है। वह सिर्फ एक वर्ष के बाद मरने वाला है। उसके बाद वह अपना देहत्याग देगा। तब सावित्री ने कहा पिताजी कन्यादान एकबार ही किया जाता है जिसे मैंने एक बार वरण कर लिया है। मैं उसी से विवाह करूंगी आप उसे कन्यादान कर दें। उसके बाद सावित्री के द्वारा चुने हुए वर सत्यवान से धुमधाम और पूरे विधि-विधान से विवाह करवा दिया गया।
सत्यवान व सावित्री के विवाह को बहुत समय बीत गया। जिस दिन सत्यवान मरने वाला था वह करीब था। सावित्री एक-एक दिन गिनती रहती थी। उसके दिल में नारदजी का वचन सदा ही बना रहता था। जब उसने देखा कि अब इन्हें चौथे दिन मरना है। उसने तीन दिन व्रत धारण किया। जब सत्यवान जंगल में लकड़ी काटने गया तो सावित्री ने उससे कहा कि मैं भी साथ चलुंगी। तब सत्यवान ने सावित्री से कहा तुम व्रत के कारण कमजोर हो रही हो। जंगल का रास्ता बहुत कठिन और परेशानियों भरा है। इसलिए आप यहीं रहें। लेकिन सावित्री नहीं मानी उसने जिद पकड़ ली और सत्यवान के साथ जंगल की ओर चल दी।
सत्यवान जब लकड़ी काटने लगा तो अचानक उसकी तबीयत बिगडऩे लगी। वह सावित्री से बोला मैं स्वस्थ महसूस नही कर रहा हूं सावित्री मुझमें यहा बैठने की भी हिम्मत नहीं है। तब सावित्री ने सत्यवान का सिर अपनी गोद में रख लिया। फिर वह नारदजी की बात याद करके दिन व समय का विचार करने लगी। इतने में ही उसे वहां एक बहुत भयानक पुरुष दिखाई दिया। जिसके हाथ में पाश था। वे यमराज थे। उन्होंने सावित्री से कहा तू पतिव्रता स्त्री है। इसलिए मैं तुझसे संभाषण कर लूंगा। सावित्री ने कहा आप कौन है तब यमराज ने कहा मैं यमराज हूं। इसके बाद यमराज सत्यवान के शरीर में से प्राण निकालकर उसे पाश में बांधकर दक्षिण दिशा की ओर चल दिए। सावित्री बोली मेरे पतिदेव को जहां भी ले जाया जाएगा मैं भी वहां जाऊंगी। तब यमराज ने उसे समझाते हुए कहा मैं उसके प्राण नहीं लौटा सकता तू मनचाहा वर मांग ले।
तब सावित्री ने वर में अपने श्वसुर के आंखे मांग ली। यमराज ने कहा तथास्तु लेकिन वह फिर उनके पीछे चलने लगी। तब यमराज ने उसे फिर समझाया और वर मांगने को कहा उसने दूसरा वर मांगा कि मेरे श्वसुर को उनका राज्य वापस मिल जाए। उसके बाद तीसरा वर मांगा मेरे पिता जिन्हें कोई पुत्र नहीं हैं उन्हें सौ पुत्र हों। यमराज ने फिर कहा सावित्री तुम वापस लौट जाओ चाहो तो मुझसे कोई और वर मांग लो। तब सावित्री ने कहा मुझे सत्यवान से सौ यशस्वी पुत्र हों। यमराज ने कहा तथास्तु। यमराज फिर सत्यवान के प्राणों को अपने पाश में जकड़े आगे बढऩे लगे। सावित्री ने फिर भी हार नहीं मानी तब यमराज ने कहा तुम वापस लौट जाओ तो सावित्री ने कहा मैं कैसे वापस लौट जाऊं । आपने ही मुझे सत्यवान से सौ यशस्वी पुत्र उत्पन्न करने का आर्शीवाद दिया है। तब यमराज ने सत्यवान को पुन: जीवित कर दिया। उसके बाद सावित्री सत्यवान के शव के पास पहुंची और थोड़ी ही देर में सत्यवान के शव में चेतना आ गई।
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7>सती अनुसुइया की कहानी (Sati Anasuya Story)
Sati Anasuya Story in Hindi : सती अनुसूईया महर्षि अत्री की पत्नी थी। जो अपने पतिव्रता धर्म के कारण सुविख्यात थी। एक दिन देव ऋषि नारद जी बारी-बारी से विष्णुजी, शिव जी और ब्रह्मा जी की अनुपस्थिति में विष्णु लोक, शिवलोक तथा ब्रह्मलोक पहुंचे। वहां जाकर उन्होंने लक्ष्मी जी, पार्वती जी और सावित्री जी के सामने अनुसुइया के पतिव्रत धर्म की बढ़ चढ़ के प्रशंसा की तथा कहाँ की समस्त सृष्टि में उससे बढ़ कर कोई पतिव्रता नहीं है। नारद जी की बाते सुनकर तीनो देवियाँ सोचने लगी की आखिर अनुसुइया के पतिव्रत धर्म में ऐसी क्या बात है जो उसकी चर्चा स्वर्गलोक तक हो रही है ? तीनो देवीयों को अनुसुइया से ईर्ष्या होने लगी।
नारद जी के वहां से चले जाने के बाद सावित्री , लक्ष्मी तथा पार्वती एक जगह इक्ट्ठी हुई तथा अनुसूईया के पतिव्रत धर्म को खंडित कराने के बारे में सोचने लगी। उन्होंने निश्चय किया की हम अपने पतियों को वहां भेज कर अनुसूईया का पतिव्रत धर्म खंडित कराएंगे। ब्रह्मा, विष्णु और शिव जब अपने अपने स्थान पर पहुँचे तो तीनों देवियों ने उनसे अनुसूईया का पतिव्रत धर्म खंडित कराने की जिद्द की। तीनों देवों ने बहुत समझाया कि यह पाप हमसे मत करवाओ। परंतु तीनों देवियों ने उनकी एक ना सुनी और अंत में तीनो देवो को इसके लिए राज़ी होना पड़ा।
तीनों देवो ने साधु वेश धारण किया तथा अत्रि ऋषि के आश्रम पर पहुंचे। उस समय अनुसूईया जी आश्रम पर अकेली थी। साधुवेश में तीन अत्तिथियों को द्वार पर देख कर अनुसूईया ने भोजन ग्रहण करने का आग्रह किया। तीनों साधुओं ने कहा कि हम आपका भोजन अवश्य ग्रहण करेंगे। परंतु एक शर्त पर कि आप हमे निवस्त्र होकर भोजन कराओगी। अनुसूईया ने साधुओं के शाप के भय से तथा अतिथि सेवा से वंचित रहने के पाप के भय से परमात्मा से प्रार्थना की कि हे परमेश्वर ! इन तीनों को छः-छः महीने के बच्चे की आयु के शिशु बनाओ। जिससे मेरा पतिव्रत धर्म भी खण्ड न हो तथा साधुओं को आहार भी प्राप्त हो व अतिथि सेवा न करने का पाप भी न लगे। परमेश्वर की कृपा से तीनों देवता छः-छः महीने के बच्चे बन गए तथा अनुसूईया ने तीनों को निःवस्त्र होकर दूध पिलाया तथा पालने में लेटा दिया।
जब तीनों देव अपने स्थान पर नहीं लौटे तो देवियां व्याकुल हो गईं। तब नारद ने वहां आकर सारी बात बताई की तीनो देवो को तो अनुसुइया ने अपने सतीत्व से बालक बना दिया है। यह सुनकर तीनों देवियां ने अत्रि ऋषि के आश्रम पर पहुंचकर माता अनुसुइया से माफ़ी मांगी और कहाँ की हमसे ईर्ष्यावश यह गलती हुई है। इनके लाख मना करने पर भी हमने इन्हे यह घृणित कार्य करने भेजा। कृप्या आप इन्हें पुनः उसी अवस्था में कीजिए। आपकी हम आभारी होंगी। इतना सुनकर अत्री ऋषि की पत्नी अनुसूईया ने तीनो बालक को वापस उनके वास्तविक रूप में ला दिया। अत्री ऋषि व अनुसूईया से तीनों भगवानों ने वर मांगने को कहा। तब अनुसूईया ने कहा कि आप तीनों हमारे घर बालक बन कर पुत्र रूप में आएँ। हम निःसंतान हैं। तीनों भगवानों ने तथास्तु कहा तथा अपनी-अपनी पत्नियों के साथ अपने-अपने लोक को प्रस्थान कर गए। कालान्तर में दतात्रोय रूप में भगवान विष्णु का , चन्द्रमा के रूप में ब्रह्मा का तथा दुर्वासा के रूप में भगवान शिव का जन्म अनुसूईया के गर्भ से हुआ।
Sati Anasuya Story in Hindi : सती अनुसूईया महर्षि अत्री की पत्नी थी। जो अपने पतिव्रता धर्म के कारण सुविख्यात थी। एक दिन देव ऋषि नारद जी बारी-बारी से विष्णुजी, शिव जी और ब्रह्मा जी की अनुपस्थिति में विष्णु लोक, शिवलोक तथा ब्रह्मलोक पहुंचे। वहां जाकर उन्होंने लक्ष्मी जी, पार्वती जी और सावित्री जी के सामने अनुसुइया के पतिव्रत धर्म की बढ़ चढ़ के प्रशंसा की तथा कहाँ की समस्त सृष्टि में उससे बढ़ कर कोई पतिव्रता नहीं है। नारद जी की बाते सुनकर तीनो देवियाँ सोचने लगी की आखिर अनुसुइया के पतिव्रत धर्म में ऐसी क्या बात है जो उसकी चर्चा स्वर्गलोक तक हो रही है ? तीनो देवीयों को अनुसुइया से ईर्ष्या होने लगी।
नारद जी के वहां से चले जाने के बाद सावित्री , लक्ष्मी तथा पार्वती एक जगह इक्ट्ठी हुई तथा अनुसूईया के पतिव्रत धर्म को खंडित कराने के बारे में सोचने लगी। उन्होंने निश्चय किया की हम अपने पतियों को वहां भेज कर अनुसूईया का पतिव्रत धर्म खंडित कराएंगे। ब्रह्मा, विष्णु और शिव जब अपने अपने स्थान पर पहुँचे तो तीनों देवियों ने उनसे अनुसूईया का पतिव्रत धर्म खंडित कराने की जिद्द की। तीनों देवों ने बहुत समझाया कि यह पाप हमसे मत करवाओ। परंतु तीनों देवियों ने उनकी एक ना सुनी और अंत में तीनो देवो को इसके लिए राज़ी होना पड़ा।
तीनों देवो ने साधु वेश धारण किया तथा अत्रि ऋषि के आश्रम पर पहुंचे। उस समय अनुसूईया जी आश्रम पर अकेली थी। साधुवेश में तीन अत्तिथियों को द्वार पर देख कर अनुसूईया ने भोजन ग्रहण करने का आग्रह किया। तीनों साधुओं ने कहा कि हम आपका भोजन अवश्य ग्रहण करेंगे। परंतु एक शर्त पर कि आप हमे निवस्त्र होकर भोजन कराओगी। अनुसूईया ने साधुओं के शाप के भय से तथा अतिथि सेवा से वंचित रहने के पाप के भय से परमात्मा से प्रार्थना की कि हे परमेश्वर ! इन तीनों को छः-छः महीने के बच्चे की आयु के शिशु बनाओ। जिससे मेरा पतिव्रत धर्म भी खण्ड न हो तथा साधुओं को आहार भी प्राप्त हो व अतिथि सेवा न करने का पाप भी न लगे। परमेश्वर की कृपा से तीनों देवता छः-छः महीने के बच्चे बन गए तथा अनुसूईया ने तीनों को निःवस्त्र होकर दूध पिलाया तथा पालने में लेटा दिया।
जब तीनों देव अपने स्थान पर नहीं लौटे तो देवियां व्याकुल हो गईं। तब नारद ने वहां आकर सारी बात बताई की तीनो देवो को तो अनुसुइया ने अपने सतीत्व से बालक बना दिया है। यह सुनकर तीनों देवियां ने अत्रि ऋषि के आश्रम पर पहुंचकर माता अनुसुइया से माफ़ी मांगी और कहाँ की हमसे ईर्ष्यावश यह गलती हुई है। इनके लाख मना करने पर भी हमने इन्हे यह घृणित कार्य करने भेजा। कृप्या आप इन्हें पुनः उसी अवस्था में कीजिए। आपकी हम आभारी होंगी। इतना सुनकर अत्री ऋषि की पत्नी अनुसूईया ने तीनो बालक को वापस उनके वास्तविक रूप में ला दिया। अत्री ऋषि व अनुसूईया से तीनों भगवानों ने वर मांगने को कहा। तब अनुसूईया ने कहा कि आप तीनों हमारे घर बालक बन कर पुत्र रूप में आएँ। हम निःसंतान हैं। तीनों भगवानों ने तथास्तु कहा तथा अपनी-अपनी पत्नियों के साथ अपने-अपने लोक को प्रस्थान कर गए। कालान्तर में दतात्रोय रूप में भगवान विष्णु का , चन्द्रमा के रूप में ब्रह्मा का तथा दुर्वासा के रूप में भगवान शिव का जन्म अनुसूईया के गर्भ से हुआ।
8>तुलसी और शालिग्राम विवाह की कथा
एक समय जलंधर नाम का एक पराक्रमी असुर हुआ। इसका विवाह वृंदा नामक कन्या से हुआ। वृंदा भगवान विष्णु की परम भक्त थी। इसके पतिव्रत धर्म के कारण जलंधर अजेय हो गया था। इसने एक युद्ध में भगवान शिव को भी पराजित कर दिया। अपने अजेय होने पर इसे अभिमान हो गया और स्वर्ग की कन्याओं को परेशान करने लगा। दुःखी होकर सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गये और जलंधर के आतंक को समाप्त करने की प्रार्थना करने लगे।
भगवान विष्णु ने अपनी माया से जलांधर का रूप धारण कर लिया और छल से वृंदा के पतिव्रत धर्म को नष्ट कर दिया। इससे जलंधर की शक्ति क्षीण हो गयी और वह युद्ध में मारा गया। जब वृंदा को भगवान विष्णु के छल का पता चला तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर का बन जाने का शाप दे दिया। देवताओं की प्रार्थना पर वृंदा ने अपना शाप वापस ले लिया। लेकिन भगवान विष्णु वृंदा के साथ हुए छल के कारण लज्जित थे अतः वृंदा के शाप को जिवित रखने के लिए उन्होनें अपना एक रूप पत्थर रूप में प्रकट किया जो शालिग्राम कहलाया।
भारत में शालिग्राम पत्थर नर्मदा नदी से प्राप्त होता है। भगवान विष्णु ने वृंदा से कहा कि तुम अगले जन्म में तुलसी के रूप में प्रकट होगी और लक्ष्मी से भी अधिक मेरी प्रिय रहोगी। तुम्हारा स्थान मेरे शीश पर होगा। मैं तुम्हारे बिना भोजन ग्रहण नहीं करूंगा। यही कारण है कि भगवान विष्णु के प्रसाद में तुलसी अवश्य रखा जाता है। बिना तुलसी के अर्पित किया गया प्रसाद भगवान विष्णु स्वीकार नहीं करते हैं।
भगवान विष्णु को दिया शाप वापस लेने के बाद वृंदा जलंधर के साथ सती हो गयी। वृंदा के राख से तुलसी का पौधा निकला। वृंदा की मर्यादा और पवित्रता को बनाये रखने के लिए देवताओं ने भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप का विवाह तुलसी से कराया। इसी घटना को याद रखने के लिए प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देव प्रबोधनी एकादशी के दिन तुलसी का विवाह शालिग्राम के साथ कराया जाता है।
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9>लक्ष्मी कहाँ रहती हैं?
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एक बूढे सेठ थे । वे खानदानी रईस थे, धन-ऐश्वर्य प्रचुर मात्रा में था परंतु लक्ष्मीजी का तो है चंचल स्वभाव । आज यहाँ तो कल वहाँ!!
सेठ ने एक रात को स्वप्न में देखा कि एक स्त्री उनके घर के दरवाजे से निकलकर बाहर जा रही है।
उन्होंने पूछा : ‘‘हे देवी आप कौन हैं ? मेरे घर में आप कब आयीं और मेरा घर छोडकर आप क्यों और कहाँ जा रही हैं?
वह स्त्री बोली : ‘‘मैं तुम्हारे घर की वैभव लक्ष्मी हूँ । कई पीढयों से मैं यहाँ निवास कर रही हूँ किन्तु अब मेरा समय यहाँ पर समाप्त हो गया है इसलिए मैं यह घर छोडकर जा रही हूँ । मैं तुम पर अत्यंत प्रसन्न हूँ क्योंकि जितना समय मैं तुम्हारे पास रही, तुमने मेरा सदुपयोग किया । संतों को घर पर आमंत्रित करके उनकी सेवा की, गरीबों को भोजन कराया, धर्मार्थ कुएँ-तालाब बनवाये, गौशाला व प्याऊ बनवायी । तुमने लोक-कल्याण के कई कार्य किये । अब जाते समय मैं तुम्हें वरदान देना चाहती हूँ । जो चाहे मुझसे माँग लो ।
सेठ ने कहा : ‘‘मेरी चार बहुएँ है, मैं उनसे सलाह-मशवरा करके आपको बताऊँगा । आप कृपया कल रात को पधारें ।
सेठ ने चारों बहुओं की सलाह ली ।
उनमें से एक ने अन्न के गोदाम तो दूसरी ने सोने-चाँदी से तिजोरियाँ भरवाने के लिए कहा ।
किन्तु सबसे छोटी बहू धार्मिक कुटुंब से आयी थी। बचपन से ही सत्संग में जाया करती थी ।
उसने कहा : ‘‘पिताजी ! लक्ष्मीजी को जाना है तो जायेंगी ही और जो भी वस्तुएँ हम उनसे माँगेंगे वे भी सदा नहीं टिकेंगी । यदि सोने-चाँदी, रुपये-पैसों के ढेर माँगेगें तो हमारी आनेवाली पीढी के बच्चे अहंकार और आलस में अपना जीवन बिगाड देंगे। इसलिए आप लक्ष्मीजी से कहना कि वे जाना चाहती हैं तो अवश्य जायें किन्तु हमें यह वरदान दें कि हमारे घर में सज्जनों की सेवा-पूजा, हरि-कथा सदा होती रहे तथा हमारे परिवार के सदस्यों में आपसी प्रेम बना रहे क्योंकि परिवार में प्रेम होगा तो विपत्ति के दिन भी आसानी से कट जायेंगे।
दूसरे दिन रात को लक्ष्मीजी ने स्वप्न में आकर सेठ से पूछा : ‘‘तुमने अपनी बहुओं से सलाह-मशवरा कर लिया? क्या चाहिए तुम्हें ?
सेठ ने कहा : ‘‘हे माँ लक्ष्मी ! आपको जाना है तो प्रसन्नता से जाइये परंतु मुझे यह वरदान दीजिये कि मेरे घर में हरि-कथा तथा संतो की सेवा होती रहे तथा परिवार के सदस्यों में परस्पर प्रेम बना रहे।
यह सुनकर लक्ष्मीजी चौंक गयीं और बोलीं : ‘‘यह तुमने क्या माँग लिया। जिस घर में हरि-कथा और संतो की सेवा होती हो तथा परिवार के सदस्यों में परस्पर प्रीति रहे वहाँ तो साक्षात् नारायण का निवास होता है और जहाँ नारायण रहते हैं वहाँ मैं तो उनके चरण दबाती हूँ और मैं चाहकर भी उस घर को छोडकर नहीं जा सकती। यह वरदान माँगकर तुमने मुझे यहाँ रहने के लिए विवश कर दिया है.!
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10>क्यों नहीं लेना चाहते थे शुकदेवजी जन्म, क्या हुआ उनके जन्म के बाद?
भागवत में अब तक आपने अंक 315में आपने पढ़ा....हम हर तरफ से माया से घिरे हैं, घर, परिवार, बच्चे, बीवी, धन, सम्पत्ति, दुकानदारी, व्यवसाय। ये सब माया की तरह ही हैं, जो मौजूद भी हैं लेकिन नित्य नहीं है।माया बांधने का काम करती है। माया का अर्थ है माया, मा का अर्थ है नहीं है, या का अर्थ है यह। यानी माया का पूर्ण अर्थ हुआ यह नहीं है। माया में आदमी इस तरह बंध जाता है कि उसे कुछ भी भान नहीं रहता। बड़े-बड़े विद्वान और ऋषि भी माया के जाल में फंस गए हैं। माया से बचकर रहने से ही जीवन सुखी रह सकता है अब आगे...
महाभारत में कथा है कि भगवान वेद व्यास की पत्नी गर्भवती थी और शुकदेवजी ही उनके गर्भ में पल रहे थे। शुकदेवजी गर्भ से ही माया रहित थे, वे संसार के मोह में फंसना नहीं चाहते थे, सो बरसों तक गर्भ में पलते रहे। ऋषियों ने बहुत प्रयास किया कि वे संसार में आ जाएं लेकिन वे नहीं माने। उन्होंने कहा जब विष्णु अपनी माया को रोक दें तो ही वे संसार में आएंगे। एक पल से भी कम समय के लिए भगवान विष्णु ने अपनी माया को रोक लिया और शुकदेवजी गर्भ से निकलकर सीधे वन की ओर भागे। जैसे ही माया सक्रिय हुई, वेद व्यासजी पुत्र वियोग से व्यथित होकर उनके पीछे भागने लगे। वे ब्रह्मज्ञान के ज्ञाता होकर भी वे माया से मोहित होकर पुत्र के पीछे दौड़ पड़े।
दौड़ते-दौड़ते शुकदेवजी एक तालाब के किनारे से गुजरे, वहां कुछ युवतियां नहा रही थीं, शुकदेव को देखकर भी वे विचलित नहीं हुईं और नहाने में लगी रहीं। तभी थोड़ी देर बाद वहीं से वेद व्यास भी गुजरे, तो युवतियां अपने कपड़े संभालने लगीं। वेद व्यास ने आश्चर्य से पूछा कि तुम ये कैसा व्यवहार कर रही हो, एक युवक गुजरा तो तुम्हें कोई लाज महसूस नहीं हुई और मैं वृद्ध हूं, तुम्हारे पिता जैसा हूं, तुम मुझसे लाज कर रही हो, भाग रही हो।
युवतियों ने जवाब दिया महर्षि आपका पुत्र माया से मुक्त है, उसे संसार से कोई मोह नहीं है, हमें देखकर भी वो अनदेखा कर गया लेकिन आप उसके विपरित हैं, आपमें अभी भी मोह और माया है। आप अपने ब्रह्म तत्व के ज्ञाता पुत्र के पीछे भाग रहे हैं। आप खुद भी परमतत्व के ज्ञाता हैं। वेद व्यास को युवतियों की बात समझ में आ गई। उन्होंने शुकदेव का पीछा करना छोड़ दिया।कथा बताती है कि हम भले ही कितने ही धीर-गंभीर और ज्ञानी क्यों न हों, माया से कब घिर जाएंगे, पता नहीं चलेगा। सबसे पहले माया को समझना जरूरी है।
10>क्यों नहीं लेना चाहते थे शुकदेवजी जन्म, क्या हुआ उनके जन्म के बाद?
भागवत में अब तक आपने अंक 315में आपने पढ़ा....हम हर तरफ से माया से घिरे हैं, घर, परिवार, बच्चे, बीवी, धन, सम्पत्ति, दुकानदारी, व्यवसाय। ये सब माया की तरह ही हैं, जो मौजूद भी हैं लेकिन नित्य नहीं है।माया बांधने का काम करती है। माया का अर्थ है माया, मा का अर्थ है नहीं है, या का अर्थ है यह। यानी माया का पूर्ण अर्थ हुआ यह नहीं है। माया में आदमी इस तरह बंध जाता है कि उसे कुछ भी भान नहीं रहता। बड़े-बड़े विद्वान और ऋषि भी माया के जाल में फंस गए हैं। माया से बचकर रहने से ही जीवन सुखी रह सकता है अब आगे...
महाभारत में कथा है कि भगवान वेद व्यास की पत्नी गर्भवती थी और शुकदेवजी ही उनके गर्भ में पल रहे थे। शुकदेवजी गर्भ से ही माया रहित थे, वे संसार के मोह में फंसना नहीं चाहते थे, सो बरसों तक गर्भ में पलते रहे। ऋषियों ने बहुत प्रयास किया कि वे संसार में आ जाएं लेकिन वे नहीं माने। उन्होंने कहा जब विष्णु अपनी माया को रोक दें तो ही वे संसार में आएंगे। एक पल से भी कम समय के लिए भगवान विष्णु ने अपनी माया को रोक लिया और शुकदेवजी गर्भ से निकलकर सीधे वन की ओर भागे। जैसे ही माया सक्रिय हुई, वेद व्यासजी पुत्र वियोग से व्यथित होकर उनके पीछे भागने लगे। वे ब्रह्मज्ञान के ज्ञाता होकर भी वे माया से मोहित होकर पुत्र के पीछे दौड़ पड़े।
दौड़ते-दौड़ते शुकदेवजी एक तालाब के किनारे से गुजरे, वहां कुछ युवतियां नहा रही थीं, शुकदेव को देखकर भी वे विचलित नहीं हुईं और नहाने में लगी रहीं। तभी थोड़ी देर बाद वहीं से वेद व्यास भी गुजरे, तो युवतियां अपने कपड़े संभालने लगीं। वेद व्यास ने आश्चर्य से पूछा कि तुम ये कैसा व्यवहार कर रही हो, एक युवक गुजरा तो तुम्हें कोई लाज महसूस नहीं हुई और मैं वृद्ध हूं, तुम्हारे पिता जैसा हूं, तुम मुझसे लाज कर रही हो, भाग रही हो।
युवतियों ने जवाब दिया महर्षि आपका पुत्र माया से मुक्त है, उसे संसार से कोई मोह नहीं है, हमें देखकर भी वो अनदेखा कर गया लेकिन आप उसके विपरित हैं, आपमें अभी भी मोह और माया है। आप अपने ब्रह्म तत्व के ज्ञाता पुत्र के पीछे भाग रहे हैं। आप खुद भी परमतत्व के ज्ञाता हैं। वेद व्यास को युवतियों की बात समझ में आ गई। उन्होंने शुकदेव का पीछा करना छोड़ दिया।कथा बताती है कि हम भले ही कितने ही धीर-गंभीर और ज्ञानी क्यों न हों, माया से कब घिर जाएंगे, पता नहीं चलेगा। सबसे पहले माया को समझना जरूरी है।
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11>इस कहानी से समझे जीवन का सही अर्थ...
भागवत में अब तक आपने अंक 313 पढ़ा...बहुत बड़ी आपत्ति हो तो शिकार के द्वारा अथवा विद्यार्थियों को पढ़ाकर अपनी आपत्ति के दिन काट दे। वैश्य भी आपत्ति के समय शूद्रों की वृत्ति सेवा से अपना जीवन निर्वाह कर ले। गृहस्थ पुरुष अनायास प्राप्त अथवा शास्त्रोक्त रीति से उपार्जित अपने शुद्ध धन से अपने भृत्य, आश्रित प्रजाजन को किसी प्रकार का कष्ट न पहुंचाते हुए न्याय और विधि के साथ ही यज्ञ करें अब आगे...
प्रभु दर्शन की दृष्टि चाहिए। हम उसके अणु से छोटे अंश सूर्य को देख नहीं सकते तो फिर उसे कैसे देख सकते हैं। अर्जुन ने दर्शन करने चाहे, भगवान ने भी दर्शन देने की तैयारी की, लेकिन वह दर्शन नहीं कर सका, जब तक कि भगवान ने कृपा करके उसको अपनी दृष्टि नहीं दी। इसीलिए भक्त भगवान से कुछ नहीं मांगता, उसकी कृपा उसे वह अहेतु हितैषी अपने आप दे देता है। यह अपने आप मिलने वाली कृपा के लिए भक्त क्या करे, बस समर्पण कर दे। तन्मय हो जाए साधना में।
साधना किस प्रकार करें? नारद भक्ति सूत्र, शाण्डिल्य भक्ति सूत्र, रामायण में भगवान के द्वारा शबरी को दिए गए नवभक्ति सूत्र भागवतीय सूत्र हैं जो साधना का स्वरूप बताते हैं। ये अपने आप में विषद विषय है। कोई एक आधार ले लिया जाए और चल पड़ा जाए। इन सबमें सरलतम लगता है, नि निरंतर हरिनाम लेना राम नाम लेना। शिव नाम लेना। अपने प्रिय भगवान को सदैव याद करना और याद रखना भक्ति है। इसका फल ही भगवत् दर्शन है। प्रिय को जानने का और तरीका नहीं शास्त्रों की व्याख्या पण्डितों का काम है।
श्रद्धा और विश्वास का आधार लिए बिना भक्ति अवतरित नहीं होती। पार्वती और शंकर ही भक्ति सुरसरि धारा को धारण कर सकते हैं। जो भागीरथ तपस्या के बाद ही प्राप्त हो सकती है। जो परम ब्रम्ह की चरणामृत है।अर्थात् भक्ति प्राप्त करके भक्त बनने के लिए पहले श्रद्धा-विश्वास जगाएं। यही शक्ति जागरण है। कुण्डलिनी जागरण, फिर इन्द्रिय निग्रह यम नियम द्वारा तप करके निश्चल निर्विकार बने भक्ति अवतरित होगी और तब भक्त बन भगवान के प्रिय बन उसकी कृपा पाई जा सकेगी और दु:ख का सागर उस कल्याणमय की कृपा से सहज ही पार किया जा सकेगा।
भागवत गृहस्थी का ग्रंथ है। इसमें लगभग जीवन के हर पक्ष को स्पर्श किया गया है। भगवान उद्धव को गृहस्थी के साथ-साथ वानप्रस्थ और संन्यास के भी धर्म बता रहे हैं। इसी के साथ कथा ग्यारहवें स्कंध के 18वें अध्याय में प्रवेश कर रही है। इन चर्चाओं में भागवत का ही नहीं, जीवन का भी सार सामने आ रहा है।भगवान कहते हैं-उद्धव! यदि गृहस्थ मनुष्य वानप्रस्थ आश्रम में जाना चाहें तो अपनी पत्नी को पुत्रों के हाथ सौंप दे अथवा अपने साथ ही ले ले और फिर शांत चित्त से अपनी आयु का तीसरा भाग वन में ही रहकर व्यतीत करे।
भागवत में जो आचरण बताए हैं वे बहुत कठिन हैं, लेकिन देशकाल परिस्थिति के बदलाव के साथ एक बात समझ लें इसका सीधा अर्थ है संयम। वानप्रस्थ को चाहिए कि कौन सा पदार्थ कहां से लाना चाहिए, किस समय लाना चाहिए,कौन-कौन पदार्थ अपने अनुकूल हैं- इन बातों को जानकर अपने जीवन-निर्वाह के लिए स्वयं ही सब प्रकार के कन्दमूल फल आदि ले आवे। देशकाल आदि से अनभिज्ञ लोगों से लाएं हुए अथवा दूसरे समय के संचित पदार्थों को अपने काम में न ले। इसका अर्थ है भोजन संयम बनाए रखें।
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11>इस कहानी से समझे जीवन का सही अर्थ...
भागवत में अब तक आपने अंक 313 पढ़ा...बहुत बड़ी आपत्ति हो तो शिकार के द्वारा अथवा विद्यार्थियों को पढ़ाकर अपनी आपत्ति के दिन काट दे। वैश्य भी आपत्ति के समय शूद्रों की वृत्ति सेवा से अपना जीवन निर्वाह कर ले। गृहस्थ पुरुष अनायास प्राप्त अथवा शास्त्रोक्त रीति से उपार्जित अपने शुद्ध धन से अपने भृत्य, आश्रित प्रजाजन को किसी प्रकार का कष्ट न पहुंचाते हुए न्याय और विधि के साथ ही यज्ञ करें अब आगे...
प्रभु दर्शन की दृष्टि चाहिए। हम उसके अणु से छोटे अंश सूर्य को देख नहीं सकते तो फिर उसे कैसे देख सकते हैं। अर्जुन ने दर्शन करने चाहे, भगवान ने भी दर्शन देने की तैयारी की, लेकिन वह दर्शन नहीं कर सका, जब तक कि भगवान ने कृपा करके उसको अपनी दृष्टि नहीं दी। इसीलिए भक्त भगवान से कुछ नहीं मांगता, उसकी कृपा उसे वह अहेतु हितैषी अपने आप दे देता है। यह अपने आप मिलने वाली कृपा के लिए भक्त क्या करे, बस समर्पण कर दे। तन्मय हो जाए साधना में।
साधना किस प्रकार करें? नारद भक्ति सूत्र, शाण्डिल्य भक्ति सूत्र, रामायण में भगवान के द्वारा शबरी को दिए गए नवभक्ति सूत्र भागवतीय सूत्र हैं जो साधना का स्वरूप बताते हैं। ये अपने आप में विषद विषय है। कोई एक आधार ले लिया जाए और चल पड़ा जाए। इन सबमें सरलतम लगता है, नि निरंतर हरिनाम लेना राम नाम लेना। शिव नाम लेना। अपने प्रिय भगवान को सदैव याद करना और याद रखना भक्ति है। इसका फल ही भगवत् दर्शन है। प्रिय को जानने का और तरीका नहीं शास्त्रों की व्याख्या पण्डितों का काम है।
श्रद्धा और विश्वास का आधार लिए बिना भक्ति अवतरित नहीं होती। पार्वती और शंकर ही भक्ति सुरसरि धारा को धारण कर सकते हैं। जो भागीरथ तपस्या के बाद ही प्राप्त हो सकती है। जो परम ब्रम्ह की चरणामृत है।अर्थात् भक्ति प्राप्त करके भक्त बनने के लिए पहले श्रद्धा-विश्वास जगाएं। यही शक्ति जागरण है। कुण्डलिनी जागरण, फिर इन्द्रिय निग्रह यम नियम द्वारा तप करके निश्चल निर्विकार बने भक्ति अवतरित होगी और तब भक्त बन भगवान के प्रिय बन उसकी कृपा पाई जा सकेगी और दु:ख का सागर उस कल्याणमय की कृपा से सहज ही पार किया जा सकेगा।
भागवत गृहस्थी का ग्रंथ है। इसमें लगभग जीवन के हर पक्ष को स्पर्श किया गया है। भगवान उद्धव को गृहस्थी के साथ-साथ वानप्रस्थ और संन्यास के भी धर्म बता रहे हैं। इसी के साथ कथा ग्यारहवें स्कंध के 18वें अध्याय में प्रवेश कर रही है। इन चर्चाओं में भागवत का ही नहीं, जीवन का भी सार सामने आ रहा है।भगवान कहते हैं-उद्धव! यदि गृहस्थ मनुष्य वानप्रस्थ आश्रम में जाना चाहें तो अपनी पत्नी को पुत्रों के हाथ सौंप दे अथवा अपने साथ ही ले ले और फिर शांत चित्त से अपनी आयु का तीसरा भाग वन में ही रहकर व्यतीत करे।
भागवत में जो आचरण बताए हैं वे बहुत कठिन हैं, लेकिन देशकाल परिस्थिति के बदलाव के साथ एक बात समझ लें इसका सीधा अर्थ है संयम। वानप्रस्थ को चाहिए कि कौन सा पदार्थ कहां से लाना चाहिए, किस समय लाना चाहिए,कौन-कौन पदार्थ अपने अनुकूल हैं- इन बातों को जानकर अपने जीवन-निर्वाह के लिए स्वयं ही सब प्रकार के कन्दमूल फल आदि ले आवे। देशकाल आदि से अनभिज्ञ लोगों से लाएं हुए अथवा दूसरे समय के संचित पदार्थों को अपने काम में न ले। इसका अर्थ है भोजन संयम बनाए रखें।
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