Sunday, May 4, 2025

16>কিভাবে নাগেদের উৎপন্ন হল

       



  

16>কিভাবে নাগেদের উৎপন্ন হল

कैसे हुई नागो की उत्पत्ति, जानिए पुराणो में वर्णित नागो के बारे में

 हमारे धर्म ग्रंथो में शेषनाग, वासुकि नाग, तक्षक नाग, कर्कोटक नाग, धृतराष्ट्र नाग, कालिया नाग आदि नागो का वर्णन मिलता है। आज हम आपको इस लेख में इन सभी नागो के बारे में विस्तार से बताएंगे। लेकिन सबसे पहले हम आपको इन पराकर्मी नागों के पृथ्वी पर जन्म लेने से सम्बंधित पौराणिक कहानी सुनाते है।

इन नागो से सम्बंधित यह कथा पृथ्वी के आदि काल से सम्बंधित है। इसका वर्णन वेदव्यास जी ने भी महाभारत के आदि पर्व में किया है। महाभारत के आदि पर्व में इसका वर्णन होने के कारण लोग इसे महाभारत काल की घटना समझते है, लेकिन ऐसा नहीं है। महाभारत के आदि काल में कई ऐसी घटनाओं का वर्णन है जो की महाभारत काल से बहुत पहले घटी थी लेकिन उन घटनाओ का संबंध किसी न किसी तरीके से महाभारत से जुड़ता है, इसलिए उनका वर्णन महाभारत के आदि पर्व में किया गया है।
नागो की उत्पत्ति :

कद्रू और विनता दक्ष प्रजापति की पुत्रियाँ थीं और दोनों कश्यप ऋषि को ब्याही थीं। एक बार कश्यप मुनि ने प्रसन्न होकर अपनी दोनों पत्नियों से वरदान माँगने को कहा। कद्रू ने एक सहस्र पराक्रमी सर्पों की माँ बनने की प्रार्थना की और विनता ने केवल दो पुत्रों की किन्तु दोनों पुत्र कद्रू के पुत्रों से अधिक शक्तिशाली पराक्रमी और सुन्दर हों। कद्रू ने 1000 अंडे दिए और विनता ने दो। समय आने पर कद्रू के अंडों से 1000 सर्पों का जन्म हुआ।

पुराणों में कई नागो खासकर वासुकी, शेष, पद्म, कंबल, कार कोटक, नागेश्वर, धृतराष्ट्र, शंख पाल, कालाख्य, तक्षक, पिंगल, महा नाग आदि का काफी वर्णन मिलता है।
शेषनाग (Sheshnaag) :


कद्रू के बेटों में सबसे पराक्रमी शेषनाग थे। इनका एक नाम अनन्त भी है। शेषनाग ने जब देखा कि उनकी माता व भाइयों ने मिलकर विनता के साथ छल किया है तो उन्होंने अपनी मां और भाइयों का साथ छोड़कर गंधमादन पर्वत पर तपस्या करनी आरंभ की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उन्हें वरदान दिया कि तुम्हारी बुद्धि कभी धर्म से विचलित नहीं होगी।

ब्रह्मा ने शेषनाग को यह भी कहा कि यह पृथ्वी निरंतर हिलती-डुलती रहती है, अत: तुम इसे अपने फन पर इस प्रकार धारण करो कि यह स्थिर हो जाए। इस प्रकार शेषनाग ने संपूर्ण पृथ्वी को अपने फन पर धारण कर लिया। क्षीरसागर में भगवान विष्णु शेषनाग के आसन पर ही विराजित होते हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण व श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम शेषनाग के ही अवतार थे।
वासुकि नाग (Vasuki Nag) :


धर्म ग्रंथों में वासुकि को नागों का राजा बताया गया है। ये भी महर्षि कश्यप व कद्रू की संतान थे। इनकी पत्नी का नाम शतशीर्षा है। इनकी बुद्धि भी भगवान भक्ति में लगी रहती है। जब माता कद्रू ने नागों को सर्प यज्ञ में भस्म होने का श्राप दिया तब नाग जाति को बचाने के लिए वासुकि बहुत चिंतित हुए। तब एलापत्र नामक नाग ने इन्हें बताया कि आपकी बहन जरत्कारु से उत्पन्न पुत्र ही सर्प यज्ञ रोक पाएगा।

तब नागराज वासुकि ने अपनी बहन जरत्कारु का विवाह ऋषि जरत्कारु से करवा दिया। समय आने पर जरत्कारु ने आस्तीक नामक विद्वान पुत्र को जन्म दिया। आस्तीक ने ही प्रिय वचन कह कर राजा जनमेजय के सर्प यज्ञ को बंद करवाया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार समुद्रमंथन के समय नागराज वासुकी की नेती बनाई गई थी। त्रिपुरदाह के समय वासुकि शिव धनुष की डोर बने थे।
तक्षक नाग (Takshak Nag) :


धर्म ग्रंथों के अनुसार तक्षक पातालवासी आठ नागों में से एक है। तक्षक के संदर्भ में महाभारत में वर्णन मिलता है। उसके अनुसार श्रृंगी ऋषि के शाप के कारण तक्षक ने राजा परीक्षित को डसा था, जिससे उनकी मृत्यु हो गयी थी। तक्षक से बदला लेने के उद्देश्य से राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने सर्प यज्ञ किया था। इस यज्ञ में अनेक सर्प आ-आकर गिरने लगे। यह देखकर तक्षक देवराज इंद्र की शरण में गया।

जैसे ही ऋत्विजों (यज्ञ करने वाले ब्राह्मण) ने तक्षक का नाम लेकर यज्ञ में आहुति डाली, तक्षक देवलोक से यज्ञ कुंड में गिरने लगा। तभी आस्तीक ऋषि ने अपने मंत्रों से उन्हें आकाश में ही स्थिर कर दिया। उसी समय आस्तीक मुनि के कहने पर जनमेजय ने सर्प यज्ञ रोक दिया और तक्षक के प्राण बच गए। ग्रंथों के अनुसार तक्षक ही भगवान शिव के गले में लिपटा रहता है।
कर्कोटक नाग (Karkotaka Naga) :

कर्कोटक शिव के एक गण हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार सर्पों की मां कद्रू ने जब नागों को सर्प यज्ञ में भस्म होने का श्राप दिया तब भयभीत होकर कंबल नाग ब्रह्माजी के लोक में, शंखचूड़ मणिपुर राज्य में, कालिया नाग यमुना में, धृतराष्ट्र नाग प्रयाग में, एलापत्र ब्रह्मलोक में और अन्य कुरुक्षेत्र में तप करने चले गए।

ब्रह्माजी के कहने पर कर्कोटक नाग ने महाकाल वन में महामाया के सामने स्थित लिंग की स्तुति की। शिव ने प्रसन्न होकर कहा कि- जो नाग धर्म का आचरण करते हैं, उनका विनाश नहीं होगा। इसके उपरांत कर्कोटक नाग उसी शिवलिंग में प्रविष्ट हो गया। तब से उस लिंग को कर्कोटेश्वर कहते हैं। मान्यता है कि जो लोग पंचमी, चतुर्दशी और रविवार के दिन कर्कोटेश्वर शिवलिंग की पूजा करते हैं उन्हें सर्प पीड़ा नहीं होती।
धृतराष्ट्र नाग (Dhritarashtra Naga) :

धर्म ग्रंथों के अनुसार धृतराष्ट्र नाग को वासुकि का पुत्र बताया गया है। महाभारत के युद्ध के बाद जब युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ किया तब अर्जुन व उसके पुत्र ब्रभुवाहन (चित्रांगदा नामक पत्नी से उत्पन्न) के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में ब्रभुवाहन ने अर्जुन का वध कर दिया। ब्रभुवाहन को जब पता चला कि संजीवन मणि से उसके पिता पुन: जीवित हो जाएंगे तो वह उस मणि के खोज में निकला।

वह मणि शेषनाग के पास थी। उसकी रक्षा का भार उन्होंने धृतराष्ट्र नाग को सौंप था। ब्रभुवाहन ने जब धृतराष्ट्र से वह मणि मागी तो उसने देने से इंकार कर दिया। तब धृतराष्ट्र एवं ब्रभुवाहन के बीच भयंकर युद्ध हुआ और ब्रभुवाहन ने धृतराष्ट्र से वह मणि छीन ली। इस मणि के उपयोग से अर्जुन पुनर्जीवित हो गए।
कालिया नाग (Kaliya Naag) :


श्रीमद्भागवत के अनुसार कालिया नाग यमुना नदी में अपनी पत्नियों के साथ निवास करता था। उसके जहर से यमुना नदी का पानी भी जहरीला हो गया था। श्रीकृष्ण ने जब यह देखा तो वे लीलावश यमुना नदी में कूद गए। यहां कालिया नाग व भगवान श्रीकृष्ण के बीच भयंकर युद्ध हुआ। अंत में श्रीकृष्ण ने कालिया नाग को पराजित कर दिया। तब कालिया नाग की पत्नियों ने श्रीकृष्ण से कालिया नाग को छोडऩे के लिए प्रार्थना की। तब श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि तुम सब यमुना नदी को छोड़कर कहीं ओर निवास करो। श्रीकृष्ण के कहने पर कालिया नाग परिवार सहित यमुना नदी छोड़कर कहीं ओर चला गया।
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Thursday, July 25, 2024

15>চিরঞ্জীবী আট (৮) জন::-

15> চিরঞ্জীবী আট (৮) জন::---

হিন্দু ধর্ম বিশ্বাসে আট জন অমর ব্যক্তিত্ব:--

●1>বেদব্যাস: যে ঋষি মহাভারত রচনা 

        করেছিলেন। ...


●2>হনুমান: একজন সর্বশ্রেষ্ঠ ব্রহ্মচারী, 

       রামকে সেবা করেছিলেন। ...


●3>পরশুরাম: বিষ্ণুর ষষ্ঠ অবতার। ...


●4>বিভীষণ: রাবণের ভাই। ...


●5>অশ্বত্থামা: দ্রোণের পুত্র। ...


●6>পাতালের মহাবলী বলীরাজা: অসুর 

       বা অসুরদের শাসক যিনি বর্তমান 

       কেরালার আশেপাশে কোথাও 

       বিদ্যমান ছিলেন। ...


●7>কৃপাচার্য: মহাভারতের 

      রাজকুমারদের রাজকীয় গুরু।


●8>মার্কণ্ডেয়: মার্কণ্ডেয় ভৃগু ঋষির বংশে জন্মগ্রহণকারী প্রাচীন ঋষি। 


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আটজন চিরঞ্জীবী::---


চিরঞ্জীবী (সংস্কৃত: चिरञ्जीवि) বলতে হিন্দু ঐতিহ্যে আটজন অমর বা দীর্ঘজীবী ব্যক্তি যারা বর্তমান যুগ কলিযুগের শেষ না হওয়া পর্যন্ত জীবিত থাকবেন।


সংস্কৃত শব্দ চিরঞ্জীবী অর্থ অমর, যদিও এটি শাশ্বত এর সাথে সঙ্গতিপূর্ণ নয়। শব্দটি চিরম্ (চিরকাল) এবং জীব (জীবিত) এর সংমিশ্রণ।


চিরঞ্জীবীগণ::--


●1>বেদব্যাস: যে ঋষি মহাভারত রচনা করেছিলেন। তিনি পাণ্ডিত্য এবং প্রজ্ঞার প্রতিনিধিত্ব করেন। তিনি ছিলেন ঋষি পরাশর ও সত্যবতীর পুত্র,[৫] এবং ঋষি বশিষ্ঠের প্রপৌত্র। তিনি ত্রেতাযুগের শেষের দিকে জন্মগ্রহণ করেছিলেন, সম্পূর্ণ দ্বাপর যুগ দেখার জন্য বেঁচে ছিলেন এবং কলিযুগের প্রাথমিক পর্ব দেখেছিলেন।

●2>হনুমান: একজন সর্বশ্রেষ্ঠ ব্রহ্মচারী, রামকে সেবা করেছিলেন। তিনি ভগবান রামের একনিষ্ঠ ভক্ত। তিনি নিঃস্বার্থ, সাহস, ভক্তি, বুদ্ধিমত্তা, শক্তি, ব্রহ্মচর্য ও ধার্মিক আচরণের পক্ষে দাঁড়িয়েছেন।

●3>পরশুরাম: বিষ্ণুর ষষ্ঠ অবতার। তিনি সমস্ত অস্ত্র, শাস্ত্র ও ঐশ্বরিক অস্ত্রের জ্ঞানী। কল্কি পুরাণ উল্লেখ করে যে তিনি কল্কির সামরিক গুরু হতে সময়ের শেষে আবার আবির্ভূত হবেন। তারপর তিনি চূড়ান্ত অবতারকে স্বর্গীয় অস্ত্র গ্রহণের জন্য তপস্যা করার নির্দেশ দেবেন, যা শেষ সময়ে মানবজাতিকে বাঁচাতে হবে।

●4>বিভীষণ: রাবণের ভাই। রাবণের সাথে যুদ্ধের আগে বিভীষণ রামের কাছে আত্মসমর্পণ করেন। রাম কর্তৃক রাবণ নিহত হওয়ার পর তিনি পরবর্তীতে লঙ্কার রাজা হন। তিনি ন্যায়ের পক্ষে দাঁড়িয়েছেন। বিভীষণ সত্যিকারের চিরঞ্জীবি নন, কারণ তাঁর দীর্ঘায়ুর বর শুধুমাত্র মহাযুগের শেষ পর্যন্ত পৃথিবীতে থাকবে।

●5>অশ্বত্থামা: দ্রোণের পুত্র। ভগবান শিবের মতো বীরত্বের অধিকারী পুত্র লাভের জন্য দ্রোণ ভগবান শিবকে খুশি করার জন্য বহু বছর কঠোর তপস্যা করেছিলেন। অশ্বত্থামা হলেন এগারোজন রুদ্রের একজনের অবতার। কুরুক্ষেত্র যুদ্ধে অশ্বত্থামা ও কৃপাকে এখনও বেঁচে থাকা একমাত্র ব্যক্তি বলে মনে করা হয়। তিনি অমর হতে পারেন কিন্তু কৃষ্ণ তাকে একটি অভিশাপ দিয়েছিলেন যে, তিনি চিরকাল বেঁচে থাকবেন কিন্তু কারো সাথে যোগাযোগ করতে পারবেন না বা স্পর্শ করতে পারবেন না, তার শরীরে বেদনাদায়ক ঘা এবং আলসার রয়েছে যা কখনই নিরাময় হবে না।

●6>মহাবলী: অসুর বা অসুরদের শাসক যিনি বর্তমান কেরালার আশেপাশে কোথাও বিদ্যমান ছিলেন। তাঁর ছেলে ছিলেন বাণাসুর। তিনি ছিলেন তিন জগতের গুণী সম্রাট ও বিরোচনের পুত্র এবং প্রহ্লাদের নাতি যিনি ছিলেন অসুর বংশোদ্ভূত। তাকে বিষ্ণুর বামন অবতার পাতাল লোকে পাঠান। প্রতি বছর ওনামের দিনে (কেরালার সরকারি উৎসব), তিনি কেরালা অঞ্চলে বসবাসকারী তার লোকেদের সাথে দেখা করতে স্বর্গ থেকে পৃথিবীতে নেমে আসেন।

●7>কৃপাচার্য: মহাভারতের রাজকুমারদের রাজকীয় গুরু। তাকে রাজা শান্তনু দত্তক নিয়েছিলেন। তাঁর বোন ছিলেন কৃপী, যিনি দ্রোণাচার্যকে বিয়ে করেছিলেন। একসাথে তারা অশ্বত্থামার জন্ম দেয়। তিনি তার ছাত্রদের মধ্যে নিরপেক্ষতার কারণে দীর্ঘ জীবনের জন্য পরিচিত এবং তাদের নিজের সন্তানের মতো আচরণ করতেন। তিনি তার ভাগ্নে অশ্বত্থামা সহ সকল যোদ্ধাদের মধ্যে একমাত্র বেঁচে আছেন যারা আসলেই কুরুক্ষেত্র যুদ্ধে লড়াই করেছিলেন।

●8>মার্কণ্ডেয়: মার্কণ্ডেয় ভৃগু ঋষির বংশে জন্মগ্রহণকারী প্রাচীন ঋষি। মার্কন্ডেয় পুরাণ বিশেষ করে, মার্কন্ডেয় এবং জৈমিনি নামক একজন ঋষির মধ্যে কথোপকথন রয়েছে এবং ভাগবত পুরাণের কয়েকটি অধ্যায় তাঁর কথোপকথন এবং প্রার্থনার জন্য উৎসর্গীকৃত। মহাভারতেও তার উল্লেখ আছে।

সমস্ত চিরঞ্জীবী জীবিত, বিশেষ করে পরশুরাম শুধুমাত্র বিষ্ণুর দশম ও শেষ অবতার বা কল্কিকে সাহায্য করার জন্য, পাপীদের ধ্বংস করতে এবং পৃথিবীতে ধর্ম বা ধার্মিকতা পুনরুদ্ধার করতে এবং পরবর্তী মহাযুগের দ্বার উন্মুক্ত করতে পুনরায় আসবেন।

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Wednesday, May 8, 2019

14>অমরনাথ ধামের কথা।

14>অমরনাথ ধামের কথা

अमरनाथ धाम से जुडी शिव-पार्वती कथा

 Hindi Story of Amarnath Dham : एक बार देवी पार्वती ने देवों के देव महादेव से पूछा, ऐसा क्यों है कि आप अजर हैं, अमर हैं लेकिन मुझे हर जन्म के बाद नए स्वरूप में आकर, फिर से बरसों तप के बाद आपको प्राप्त करना होता है । जब मुझे आपको पाना है तो मेरी तपस्या और इतनी कठिन परीक्षा क्यों? आपके कंठ में पडी़ नरमुंड माला और अमर होने के रहस्य क्या

महादेव ने पहले तो देवी पार्वती के उन सवालों का जवाब देना उचित नहीं समझा, लेकिन पत्नीहठ के कारण कुछ गूढ़ रहस्य उन्हें बताने पडे़। शिव महापुराण में मृत्यु से लेकर अजर-अमर तक के कर्इ प्रसंंग हैं, जिनमें एक साधना से जुडी अमरकथा बडी रोचक है। जिसे भक्तजन अमरत्व की कथा के रूप में जानते हैं।

हर वर्ष हिम के आलय (हिमालय) में अमरनाथ, कैलाश और मानसरोवर तीर्थस्थलों में लाखों श्रद्घालु पहुंचते हैं। सैकडों किमी की पैदल यात्रा करते हैं, क्यों? यह विश्वास यूं ही नहीं उपजा। शिव के प्रिय अधिकमास, अथवा आषाढ़ पूर्णिमा से श्रावण मास तक की पूर्णिमा के बीच अमरनाथ की यात्रा भक्तों को खुद से जुडे रहस्यों के कारण और प्रासंगिक लगती है।

पौराणिक मान्याताओं के अनुसार, अमरनाथ की गुफा ही वह स्थान है जहां भगवान शिव ने पार्वती को अमर होने के गुप्त रहस्य बतलाए थे, उस दौरान उन ‘दो ज्योतियों’ के अलवा तीसरा वहां कोर्इ प्राणी नहीं था । न महादेव का नंदी और नही उनका नाग, न सिर पे गंगा और न ही गनपति, कार्तिकेय….!

सबसे पहले नंदी को पहलगाम पर छोड़ा महादेव ने
गुप्त स्थान की तलाश में महादेव ने अपने वाहन नंदी को सबसे पहले छोड़ा, नंदी जिस जगह पर छूटा, उसे ही पहलगाम कहा जाने लगा। अमरनाथ यात्रा यहीं से शुरू होती है। यहां से थोडा़ आगे चलने पर शिवजी ने अपनी जटाओं से चंद्रमा को अलग कर दिया, जिस जगह ऐसा किया वह चंदनवाडी कहलाती है। इसके बादगंगा जी को पंचतरणी में और कंठाभूषण सर्पों को शेषनाग पर छोड़ दिया, इस प्रकार इस पड़ाव का नाम शेषनाग पड़ा।

अगले पड़ाव पर गणेश छूटे
अमरनाथ यात्रा में पहलगाम के बाद अगला पडा़व है गणेश टॉप, मान्यता है कि इसी स्थान पर महादेव ने पुत्र गणेश को छोड़ा। इस जगह को महागुणा का पर्वत भी कहते हैं। इसके बाद महादेव ने जहां पिस्सू नामक कीडे़ को त्यागा, वह जगह पिस्सू घाटी है।

.. और शुरू हुर्इ शिव-पार्वती की कथा
इस प्रकार महादेव ने अपने पीछे जीवनदायिनी पांचों तत्वों को स्वंय से अलग किया। इसके पश्चात् पार्वती संग एक गुफा में महादेव ने प्रवेश किया। कोर्इ तीसरा प्राणी, यानी कोर्इ कोई व्यक्ति, पशु या पक्षी गुफा के अंदर घुस कथा को न सुन सके इसलिए उन्होंने चारों ओर अग्नि प्रज्जवलित कर दी। फिर महादेव ने जीवन के गूढ़ रहस्य की कथा शुरू कर दी।

कथा सुनते-सुनते सो गर्इं पार्वती, कबूतरों ने सुनी
कहा जाता है कि कथा सुनते-सुनते देवी पार्वती को नींद आ गर्इ, वह सो गर्इं और महादेव को यह पता नहीं चला, वह सुनाते रहे। यह कथा इस समय दो सफेद कबूतर सुन रहे थे और बीच-बीच में गूं-गूं की आवाज निकाल रहे थे। महादेव को लगा कि पार्वती मुझे सुन रही हैं और बीच-बीच में हुंकार भर रही हैं। चूंकि वैसे भी भोले अपने में मग्न थे तो सुनाने के अलावा ध्यान कबूतरों पर नहीं गया।

वे कबूतर अमर हुए और अब गुफा में होते हैं उनके दर्शन
दोनों कबूतर सुनते रहे, जब कथा समाप्त होने पर महादेव का ध्यान पार्वती पर गया तो उन्हें पता चला कि वे तो सो रही हैं। तो कथा सुन कौन रहा था? उनकी दृष्टि तब दो कबूतरों पर पड़ी तो महादेव को क्रोध आ गया। वहीं कबूतर का जोड़ा उनकी शरण में आ गया और बोला, भगवन् हमने आपसे अमरकथा सुनी है। यदि आप हमें मार देंगे तो यह कथा झूठी हो जाएगी, हमें पथ प्रदान करें। इस पर महादेव ने उन्हें वर दिया कि तुम सदैव इस स्थान पर शिव व पार्वती के प्रतीक चिह्न में निवास करोगे। अंतत: कबूतर का यह जोड़ा अमर हो गया और यह गुफा अमरकथा की साक्षी हो गर्इ। इस तरह इस स्थान का नाम अमरनाथ पड़ा।

मान्यता है कि आज इन दो कबूतरों के दर्शन भक्तों को होते हैं। अमरनाथ गुफा में यह भी प्रकृति का ही चमत्कार है कि शिव की पूजा वाले विशेष दिनों में बर्फ के शिवलिंग अपना आकार ले लेते हैं। यहां मौजूद शिवलिंग किसी आश्चर्य से कम नहीं है। पवित्र गुफा में एक ओर मां पार्वती और श्रीगणेश के भी अलग से बर्फ से निर्मित प्रतिरूपों के भी दर्शन किए जा सकते हैं।
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13>সুদর্শন চক্র ।



সুদর্শন চক্র --( RK 12/20)

Sudarshan chakra story : भगवान शिव ने ही दिया था विष्णु को सुदर्शन चक्र, जानिए पुराणों में वर्णित एक रोचक कथा
Sudarshan chakra story in Hindi : भगवान शिव व विष्णु से जुड़ी अनेक कथाएं हमारे धर्म ग्रंथों में मिलती है। ऐसी ही एक रोचक कथा कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी से भी जुड़ी है। इस दिन बैकुंठ चतुर्दशी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु व शिव की पूजा करने का विधान है। पुराणों में इस व्रत से जुड़ी जो कथा है, जो इस प्रकार है।

पौराणिक कथा

एक बार भगवान विष्णु, शिवजी का पूजन करने के लिए काशी आए। यहां मणिकार्णिका घाट पर स्नान करके उन्होंने एक हजार स्वर्ण कमल फूलों से भगवान शिव की पूजा का संकल्प लिया। अभिषेक के बाद जब भगवान विष्णु पूजन करने लगे तो शिवजी ने उनकी भक्ति की परीक्षा लेने के लिए एक कमल का फूल कम कर दिया। भगवान विष्णु को अपने संकल्प की पूर्ति के लिए एक हजार कमल के फूल चढ़ाने थे।

एक पुष्प की कमी देखकर उन्होंने सोचा कि मेरी आंखें ही कमल के समान हैं इसलिए मुझे कमलनयन और पुण्डरीकाक्ष कहा जाता है। एक कमल के फूल के स्थान पर मैं अपनी आँख ही चढ़ा देता हूं। ऐसा सोचकर भगवान विष्णु जैसे ही अपनी आँख भगवान शिव को चढ़ाने के लिए तैयार हुए, वैसे ही शिवजी प्रकट होकर बोले- हे विष्णु। तुम्हारे समान संसार में कोई दूसरा मेरा भक्त नहीं है।

आज की यह कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी अब से बैंकुठ चतुर्दशी के नाम से जानी जाएगी। इस दिन व्रत पूर्वक जो पहले आपका और बाद में मेरा पूजन करेगा और बैकुंठ लोक की प्राप्ति होगी। तब प्रसन्न होकर शिवजी ने भगवान विष्णु को सुदर्शन चक्र भी प्रदान किया और कहा कि यह चक्र राक्षसों का विनाश करने वाला होगा। तीनों लोकों में इसकी बराबरी करने वाला कोई अस्त्र नहीं होगा।

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12>অর্জুন ,অস্ত্র উঠিয়েছিলেন যুধিষ্ঠিরকে মারবার জন্য।



12>মহাভারতে অর্জুন ,অস্ত্র উঠিয়েছিলেন যুধিষ্ঠিরকে মারবার জন্য। *****


  
महाभारत काल की यह कथा हमें वह समय याद कराती है जब कुरुक्षेत्र युद्ध चल रहा था। यह युद्ध का 17वां दिन था और राजकुमार युधिष्ठिर तथा कर्ण के बीच युद्ध हो रहा था। सभी को इस युद्ध से बेहद उम्मीदें थीं कि तभी शस्त्र विद्या में माहिर रहे कर्ण ने युधिष्ठिर पर एक ज़ोरदार वार किया।

एक के बाद एक करके कर्ण के सभी वार युधिष्ठिर पर भारी पड़ते गए और वह बुरी तरह से घायल हो गया। अब कर्ण के पास एक मौका था कि वह युधिष्ठिर को मारकर पाण्डवों की नींव हिलाकर रख दे, लेकिन उसने यह मौका हाथ से जाने दिया। आखिर क्यों?

कर्ण ने युधिष्ठिर पर सिर्फ इसलिए वार नहीं किया क्योंकि उसने पांडवों की माता कुंती को यह वचन दिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह उनके किसी भी पुत्र को जान से नहीं मारेगा। और यही कारण था कि ना चाहते हुए भी कर्ण ने युधिष्ठिर को जीवित ही जाने दिया।

जब अनुज नकुल तथा सहदेव ने अपने ज्येष्ठ भ्राता राजकुमार युधिष्ठिर की यह हालत देखी तो शीघ्र ही उन्हें तंबू में ले गए, जहां उनकी मरहम-पट्टी के सभी इंतज़ाम किए गए। जब तीनों भाई तंबू में थे तो बाकी दो भाई अर्जुन तथा भीम अभी भी युद्ध में शत्रुओं की सेना से संघर्ष कर रहे थे।

अचानक ही अर्जुन को राजकुमार युधिष्ठिर की अनुपस्थिति का एहसास हुआ और उन्होंने भीम से इस बारे में पूछताछ की। तब भीम ने बताया कि किस तरह से कर्ण तथा युधिष्ठिर के बीच हुए द्वंद युद्ध में भ्राता युधिष्ठिर घायल हो गए, जिसके बाद उन्हें विश्राम करने के लिए ले जाया गया है।

तभी भीम ने अर्जुन से कहा कि वह शत्रुओं को अकेले ही संभाल लेंगे और अर्जुन से आग्रह किया कि वे भ्राता युधिष्ठिर के पास जाएं और उनके स्वास्थ्य का ब्योरा लें। आज्ञानुसार राजकुमार अर्जुन उस तंबू की ओर चले दिए, जहां युधिष्ठिर घायल आवस्था में पीड़ा से जूझ रहे थे।

तंबू में लेटे हुए युधिष्ठिर ने अचानक ही अपने अनुज को अपनी ओर आते हुए देखा। अर्जुन को देख उनकी खुशी का ठिकाना ना रहा। वह समझ गए कि हो ना हो अर्जुन युद्ध में कर्ण पर विजय प्राप्त कर उनके पास खुशखबरी लेकर आ रहे हैं।

वह अंदर ही अंदर बेहद गर्व महसूस कर रहे थे कि उनकी इस हालत के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को उनके अनुज ने दंड दे दिया है और अवश्य ही अर्जुन ने कर्ण को मार दिया होगा। लेकिन युधिष्ठिर सत्य से अनजान थे।

तंबू में प्रवेश करते ही अर्जुन ने ज्येष्ठ भ्राता को प्रणाम किया और उनसे उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछा। लेकिन इससे ज्यादा तो युधिष्ठिर इस बात को सुनने के लिए ज्यादा उत्तेजित हो रहे थे कि अर्जुन ने कर्ण को मारा या नहीं। लेकिन तभी राजकुमार अर्जुन द्वारा वहां आने का असली कारण व्यक्त किया गया।

उन्होंने बताया कि कैसे भीम ने युधिष्ठिर के घायल होने की खबर सुनाई जिसके बाद वह दौड़े-दौड़े उनकी स्थिति का ब्योरा लेने आ गए। अर्जुन के मुख से सच्चाई सुनते ही युधिष्ठिर अपना आपा खो बैठे। वह सच उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचा रहा था।

उन्हें ऐसा महसूस हुआ मानो कोई उनके सम्मान को तीर के समान चीरता हुआ जा रहा हो। वे बेहद क्रोधित हो उठे और बोले, “तुम यहां केवल मेरे घावों के बारे में पूछने आए हो या फिर उन्हें और कुरेदने आए हो? तुम किस प्रकार के अनुज हो जो अब तक अपने ज्येष्ठ भ्राता के अपमान का बदला नहीं ले सके।“

युधिष्ठिर के इन कटु वचनों को सुनकर अर्जुन बेहद शर्मिंदा महसूस कर रहे थे, लेकिन युधिष्ठिर का क्रोध शांत नहीं हो रहा था। वे आगे बोले, “यदि तुम मेरे लिए इतना भी करने में असमर्थ हो तो तुम्हारे इस गांडीव अस्त्र का कोई लाभ नहीं है। उतार कर फेंक दो इसे।“

अपने प्रिय गांडीव अस्त्र की निंदा सुनते ही अर्जुन के मुख पर निराशा वाले भाव पल में ही क्रोध के साथ बदल गए। वह संसार में किसी से भी किसी भी प्रकार की निंदा सुन सकते थे, लेकिन उनके गांडीव के बारे में कोई एक भी अपशब्द बोले, यह उन्हें बर्दाश्त नहीं था।

दरअसल यह अर्जुन द्वारा लिए गए एक वचन का हिस्सा था, जिसके अनुसार कोई भी अपना या पराया व्यक्ति यदि उनके पवित्र एवं प्रिय गांडीव अस्त्र के बारे में बुरे वचन बोलेगा, तो वह उसका सिर कलम कर देंगे। यही कारण था कि युधिष्ठिर द्वारा गांडीव की निंदा करते ही अर्जुन ने अगले ही पल अपना गांडीव उठाया और क्रोध भरी आंखों से युधिष्ठिर को मारने के लिए आगे बढ़े।

तभी श्रीकृष्ण वहां पहुंचे और अर्जुन के इस व्यवहार को देखते ही उन्हें रुकने की आज्ञा दी। श्रीकृष्ण राजकुमार अर्जुन का यह रूप देखकर बेहद अचंभित हुए। वे समझ नहीं पा रहे थे कि आखिरकार ऐसी क्या बात हुई जो अर्जुन अपने ही प्रिय भाई युधिष्ठिर के प्राण लेने को तैयार हो गए।

तत्पश्चात अर्जुन ने उन्हें घटना का सार बताया और फिर श्रीकृष्ण को समझ आया कि आखिर बात क्या थी। उस समय भगवान कृष्ण ने अर्जुन को समझाया और बोले, “हे अर्जुन! मैं तुम्हारे अपने गांडीव के संदर्भ में लिए गए वचन का सम्मान करता हूं। वचनानुसार तुम्हें अपने ही ज्येष्ठ भ्राता को मार देने का पूरा हक है, परन्तु धार्मिक संदर्भों में यह पाप है।“

लेकिन दूसरी ओर अर्जुन भी अपने वचन से मजबूर थे। उनकी मंशा को और गहराई से समझते हुए श्रीकृष्ण बोले, “अर्जुन, यदि तुम्हे अपने वचन को पूरा करना है तो इसका एक अन्य साधन भी है। माना जाता है कि अपने से बड़ों का अनादर करना उन्हें मृत्यु दंड देने के समान होता है। यदि अभी तुम अपने ज्येष्ठ भ्राता का अपमान करो तो तुम्हारा वचन पूरा हो जाएगा।“

श्रीकृष्ण की आज्ञानुसार अर्जुन ने अगले ही पल युधिष्ठिर का तिरस्कार किया। अपने द्वारा किए गए इस अनादर को अर्जुन सहन ना कर सके और इस बार अपने ही प्राण लेने के लिए उन्होंने अपनी तलवार उठा ली। लेकिन भगवान कृष्ण ने उन्हें ऐसा करने नहीं दिया।

उन्होंने अर्जुन को बताया कि कैसे खुद के प्राणों का अंत करना यानी कि आत्मदाह करना शास्त्रों में अधर्म माना जाता है। और पाण्डवों द्वारा अधर्म के मार्ग पर चलना एक बहुत बड़ा पाप एवं अन्याय साबित होगा। इसीलिए उसे धर्म का मार्ग चुनना चाहिए।

इसके साथ ही श्रीकृष्ण ने कहा कि आत्मप्रशंसा, आत्मघात के समकक्ष है। इसलिए तुम दूसरों के सम्मुख अपनी वीरता की खुलकर तारीफ़ करो, जिससे तुम्हारा वचन पूरा हो जाएगा।

श्रीकृष्ण के इन वचनों को सुन धीरे-धीरे राजकुमार अर्जुन का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने खुद के सिर पर रखी उस तलवार को नीचे उतार कर फेंक दिया। इस प्रकार भगवान कृष्ण के निर्देशों से राजकुमार अर्जुन का वचन पूरा हुआ और साथ ही वह किसी भी प्रकार का अधर्म करने से बच गए।-
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11>ভগবানের বাহন কেন পশু ।

11>ভগবানের বাহন কেন পশু

 भगवानों के वाहन पशु ही क्यों होतेहैं?

किसी भी मंदिर में जाइए, किसी भी भगवान को देखिए, उनके साथ एक चीज सामान्य रूप से जुड़ी हुई है, वह है उनके वाहन।
लगभग सभी भगवान के वाहन पशुओं को ही माना गया ত্রিদেবের ধারিত প্রতীক
है। शिव के नंदी से लेकर दुर्गा के शेर तक और विष्णु के गरूढ़ से लेकर इंद्र के ऐरावत हाथी तक। लगभग सारे देवी-देवता पशुओं पर ही सवार हैं।

आखिर क्यों सर्वशक्तिमान भगवानों को पशुओं की सवारी की आवश्यकता पड़ी, जब की वे तो अपनी दिव्यशक्तियों से पलभर में कहीं भी आ-जा सकते हैं? क्यों हर भगवान के साथ कोई पशु जुड़ा हुआ है?

भगवानों के साथ जानवरों को जोडऩे केपीछे कई सारे कारण हैं।

इसमें अध्यात्मिक, वैज्ञानिक और व्यवहारिक कारणों से भारतीय मनीषियों ने भगवानों के वाहनों के रूप पशु-पक्षियों को जोड़ा है। वास्तव में देवताओं के साथ पशुओं कोउनके व्यवहार के अनुरूप जोड़ा गया है।

दूसरा सबसे बड़ा कारण है प्रकृति की रक्षा।

अगर पशुओं को भगवान के साथ नहीं जोड़ा जाता तो शायद पशु के प्रति हिंसा का व्यवहार और ज्यादा होता।

हर भगवान के साथ एक पशु को जोड़ कर भारतीय मनीषियों ने प्रकृति और उसमें रहने वाले जीवों की रक्षा का एक संदेश दिया है। हर पशु किसी न किसी भगवान का प्रतिनिधि है, उनका वाहन है, इसलिए इनकी हिंसा नहीं करनी चाहिए। मूलत: इसके पीछे एक यही संदेश सबसे बड़ा है।

आपको क्या लगता है? गणेश जी ने चूहों को यूं ही चुन लिया? या नंदी शिव की सवारी यूं ही बन गए?

भगवानों ने अपनी सवारी बहुत ही विशेष रूप से चुनी। यहां तक कि उनके वाहन उनकी चारित्रिक विशेषताओं को भी बताते हैं... भगवान गणेश और मूषक गणेश जी का वाहन है मूषक। मूषक शब्द संस्कृत के मूष से बना है जिसका अर्थ है लूटना या चुराना। सांकेतिक रूप से मनुष्य का दिमाग मूषक, चुराने वाले यानी चूहे जैसा ही होताहै। यह स्वार्थ भाव से गिरा होता है। गणेश जी का चूहे पर बैठना इस बातका संकेत है कि उन्होंने स्वार्थ परविजय पाई है और जनकल्याण के भाव को अपने भीतर जागृत किया है।

शिव और नंदी

जैसे शिव भोलेभाले, सीधे चलने वाले लेकिन कभी-कभी भयंकर क्रोध करने वाले देवता हैं तो उनका वाहन हैं नंदी बैल। संकेतों की भाषा में बैल शक्ति, आस्था व भरोसे का प्रतीक होता है। इसके अतिरिक्त भगवान के शिव का चरित्र मोह माया और भौतिक इच्छाओं से परे रहने वाला बताया गयाहै। सांकेतिक भाषा में बैल यानी नंदी इन विशेषताओं को पूरी तरह चरितार्थ करते हैं। इसलिए शिव का वाहन नंदी हैं।

कार्तिकेय और मयूर

कार्तिकेय का वाहन है मयूर। एक कथा के अनुसार यह वाहन उनको भगवान विष्णु से भेंट में मिला था। भगवान विष्णु ने कार्तिकेय की साधक क्षमताओं को देखकर उन्हें यह वाहन दिया था, जिसका सांकेतिक अर्थ था कि अपने चंचल मन रूपी मयूर को कार्तिकेय ने साध लिया है। वहीं एक अन्य कथा में इसे दंभ के नाशक के तौरपर कार्तिकेय के साथ बताया गया है।

मां दुर्गा और उनका शेर

दुर्गा तेज, शक्ति और सामथ्र्य का प्रतीक है तो उनके साथ सिंह है। शेर प्रतीक है क्रूरता, आक्रामकता और शौर्य का। यह तीनों विशेषताएं मां दुर्गा के आचरण में भी देखने को मिलती है। यह भी रोचक है कि शेर की दहाड़ को मां दुर्गा की ध्वनि ही माना जाता है, जिसके आगे संसार की बाकी सभी आवाजें कमजोर लगती हैं।

मां सरस्वती और हंस

हंस संकेतों की भाषा में पवित्रता और जिज्ञासा का प्रतीक है जो कि ज्ञान की देवी मां सरस्वती के लिए सबसे बेहतर वाहन है। मां सरस्वती काहंस पर विराजमान होना यह बताता है कि ज्ञान से ही जिज्ञासा को शांत किया जा सकता है और पवित्रता को जस का तस रखा जा सकता है।

भगवान विष्णु और गरुड़

गरुण प्रतीक हैं दिव्य शक्तियों और अधिकार के। भगवद् गीता में कहा गया है कि भगवान विष्णु में ही सारा संसार समाया है। सुनहरे रंग का बड़ेआकार का यह पक्षी भी इसी ओर संकेत करता है। भगवान विष्णु की दिव्यता और अधिकार क्षमता के लिए यह सबसे सही प्रतीक है।

मां लक्ष्मी और उल्लू

मां लक्ष्मी के वाहन उल्लू को सबसे अजीब चयन माना जाता है। कहा जाता है कि उल्लू ठीक से देख नहीं पाता, लेकिन ऐसा सिर्फ दिन के समय होता है। उल्लू शुभता और धन-संपत्ति के प्रतीक होते हैं।

ऐसे ही बाकी देवताओं के साथ भी पशुओं को उनके व्यवहार और स्वभाव केआधार पर जोड़ा गया।
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10>|| ত্রিদেবের ধারিত প্রতীক।

10>|| ত্রিদেবের ধারিত প্রতীক

।त्रिदेवो द्वारा धारित प्रतीक।

:।त्रिदेवो द्वारा धारित प्रतीक।

प्राकृतिक सत्ता के तीन अंग ब्रह्मा,विष्णु,एवं महेश जो क्रमशः सर्जक,पोषक एवं संहारक का कार्य करते है। उनके द्वारा धारित चिह्नो मेँ रहस्य छिपा है जिनका हमारे जीवन से सीधा सम्बन्ध है और हमेँ वे प्रेरणा प्रदान करते है -

सर्जक (ब्रह्मा) -

कमण्डल एवं माला - कमण्डल का जल हमेँ प्रेरणा देता है कि हमारा हर सर्जन (कार्य) प्राणवान होना चाहिए, संतो एवं महापुरुषो के निर्देशानुसार एवं सत्तचित्त होकर कार्य करने से हमारा हर कार्य अवश्य ही प्राणवान होगा।किसी भी कार्य मेँ एकाग्र होने के लिए लगन एवं सांतत्य की जरुरत होती है जो ब्रह्मा के हाथो मे विद्यमान माला से पूर्ण होती है ।वह हमें जप तप एवं भगवद् भक्ति की प्रेरणा देता है ।

पोषक(विष्णु) -

शंख एवं चक्र - शंखनाद का अर्थ- शुभ विचारो का सर्जक । जो मंगल क्रान्ति का प्रतीक है ।शंख हमेँ प्रेरणा देता है कि हर महानक्रान्तिकारी कार्य के मूल मे मंगल एवं शुभविचार ही होते है। शंखनाद से मन के अधिष्ठाता चन्द्रदेव प्रसन्न होते है , जिससे हमारे मन मेँ विशेष आह्लाद , उत्साह ,एवं सात्विकता का संचार होता है ।शंखनाद कर्त्ता को शंखघोष कान्तिमान एवं शक्तिमान बनाता है। साथ ही वातावरण के हानिकारक परमाणुओ को नष्ट करता है ।उसमेँ सात्विक आन्दोलन पैदा करता है, शंख का जल अमंगल का नाशक एवं पवित्रता वर्धक है जबकि सुदर्शन चक्र गतिसूचक है वह हमेँ प्रेरणा देता है कि हे मानव! यदि तू उन्नति चाहता है तो सत्पथ पर तत्परतापूर्वक आगे बढ भूतकाल को भूलकर नकारात्मकता एवं पलायनवादिता के हीन विचारो को भेदकर आगे बढ़।

संहारक (रुद्र ) -

त्रिशूल एवं डमरु - त्रिशूल संहार का प्रतीक है तो डमरु संगीत का ।

ये हमेँ प्रेरणा देते है कि जिस प्रकार क्रोध का आवाहन करके शिवजी त्रिशूल द्वारा दुष्टों का संहार करते हैँ तथा उल्लास का आव्हान करके डमरु द्वारा भक्तो को आह्लादित करते हैँ, फिर भी दोनो स्थितियो मेँ उनके हृदय मेँ समता एवं शांति निवास करती है।उसी प्रकार हमे भी दुष्ट जनो से लोहा लेने हेतु क्रोध को आव्हान करना पडे उस समय तथा आह्लाद सुख के क्षण आये उस समय भी अपने हृदय को सम एवं शांति बनाये रखना चाहिए ।त्रिशूल यह भी संकेत देता है कि जो तीनो गुणो(सत,रज,तम) पर विजय पाकर त्रिगुणातीत अवस्था को प्राप्त करते हैँ उन्हेँ संसार ताप रुपी शूल कष्ट नहीँ पहुँचा सकते हैँ इस प्रकार त्रिदेव के अस्त्र हमेँ प्रेरणा देते है कि जो मनुष्य अपने जीवन मेँ कोई महान कार्य करना चाहता है उसमेँ सर्जक , पोषक , एवं संहारक प्रतिभा होनी चाहिए।सर्जक प्रतिभान्तर्गत सद् विचारोँ का सर्जन आता है, जबकि पोषक प्रतिभा सद् वृत्ति का पोषण करती है , एवं संहारक प्रतिभा दुर्विचार तथा दुर्गुणो के संहार की योग्यता प्रदान करती है
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