Friday, March 25, 2016

5>16 पौराणिक कथाएं -( 30 to 45))

16 पौराणिक कथाएं – पिता के वीर्य और माता के गर्भ के बिना जन्मे पौराणिक पात्रों की 

30>धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर के जन्म कि कथा ---------------31> कौरवों के जन्म की कथा :
32> पांडवों के जन्म की कथा :-----------------------------------33> कर्ण के जन्म की कथा :
34 राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुधन के जन्म की कथा :---------35> पवन पुत्र हनुमान के जन्म कि कथा :
36>हनुमान पुत्र मकरध्वज के ज़न्म की कथा :------------------37> द्रोणाचार्य के जन्म की कथा :
38 >ऋषि ऋष्यश्रृंग के जन्म की कथा :----------------------------39>कृपाचार्य व कृपी के जन्म की कथा :
40>द्रौपदी व धृष्टद्युम्न के जन्म की कथा :-----------------------41> राधा के जन्म की कथा :
42>राजा सगर के साठ हजार पुत्रों के जन्म की कथा :----------43> जनक नंदिनी सीता के जन्म की कहानी :
44> मनु व शतरूपा के जन्म की कहानी :------------------------45>राजा पृथु के जन्म की कथा :
========================================================================

16 Hindi stories of mythological characters which born without mother tomb and father sperm : हमारे हिन्दू धर्म ग्रंथो वाल्मीकि रामायण, महाभारत आदि में कई ऐसे पात्रों का वर्णन है जिनका जन्म बिना माँ के गर्भ और पिता के वीर्य के हुआ था। यहां हम आपको 16 ऐसे ही पौराणिक पात्रो क़े ज़न्म की कहानी बतायेँगे। इनमे से कई पात्रो के ज़न्म मे माँ के गर्भ का कोई योगदान नहीं था तो कुछ पात्रों के ज़न्म में पिता क़े वीर्य का जबकि कुछ मैं दोनो क़ा हीं।


माँ के गर्भ में बच्चा
1. धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर के जन्म कि कथा :

हस्तिनापुर नरेश शान्तनु और रानी सत्यवती के चित्रांगद और विचित्रवीर्य नामक दो पुत्र हुये। शान्तनु का स्वर्गवास चित्रांगद और विचित्रवीर्य के बाल्यकाल में ही हो गया था इसलिये उनका पालन पोषण भीष्म ने किया। भीष्म ने चित्रांगद के बड़े होने पर उन्हें राजगद्दी पर बिठा दिया लेकिन कुछ ही काल में गन्धर्वों से युद्ध करते हुये चित्रांगद मारा गया। इस पर भीष्म ने उनके अनुज विचित्रवीर्य को राज्य सौंप दिया। अब भीष्म को विचित्रवीर्य के विवाह की चिन्ता हुई। उन्हीं दिनों काशीराज की तीन कन्याओं, अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका का स्वयंवर होने वाला था। उनके स्वयंवर में जाकर अकेले ही भीष्म ने वहाँ आये समस्त राजाओं को परास्त कर दिया और तीनों कन्याओं का हरण कर के हस्तिनापुर ले आये। बड़ी कन्या अम्बा ने भीष्म को बताया कि वह अपना तन-मन राज शाल्व को अर्पित कर चुकी है। उसकी बात सुन कर भीष्म ने उसे राजा शाल्व के पास भिजवा दिया और अम्बिका और अम्बालिका का विवाह विचित्रवीर्य के साथ करवा दिया।

राजा शाल्व ने अम्बा को ग्रहण नहीं किया अतः वह हस्तिनापुर लौट कर आ गई और भीष्म से बोली, “हे आर्य! आप मुझे हर कर लाये हैं अतएव आप मुझसे विवाह करें।” किन्तु भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा के कारण उसके अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। अम्बा रुष्ट हो कर परशुराम के पास गई और उनसे अपनी व्यथा सुना कर सहायता माँगी। परशुराम ने अम्बा से कहा, “हे देवि! आप चिन्ता न करें, मैं आपका विवाह भीष्म के साथ करवाउँगा।” परशुराम ने भीष्म को बुलावा भेजा किन्तु भीष्म उनके पास नहीं गये। इस पर क्रोधित होकर परशुराम भीष्म के पास पहुँचे और दोनों वीरों में भयानक युद्ध छिड़ गया। दोनों ही अभूतपूर्व योद्धा थे इसलिये हार-जीत का फैसला नहीं हो सका। आखिर देवताओं ने हस्तक्षेप कर के इस युद्ध को बन्द करवा दिया। अम्बा निराश हो कर वन में तपस्या करने चली गई।

विचित्रवीर्य अपनी दोनों रानियों के साथ भोग विलास में रत हो गये किन्तु दोनों ही रानियों से उनकी कोई सन्तान नहीं हुई और वे क्षय रोग से पीड़ित हो कर मृत्यु को प्राप्त हो गये। अब कुल नाश होने के भय से माता सत्यवती ने एक दिन भीष्म से कहा, “पुत्र! इस वंश को नष्ट होने से बचाने के लिये मेरी आज्ञा है कि तुम इन दोनों रानियों से पुत्र उत्पन्न करो।” माता की बात सुन कर भीष्म ने कहा, “माता! मैं अपनी प्रतिज्ञा किसी भी स्थिति में भंग नहीं कर सकता।”

यह सुन कर माता सत्यवती को अत्यन्त दुःख हुआ। तब उन्हें अपने ज्येष्ठ पुत्र वेदव्यास का स्मरण किया।स्मरण करते ही वेदव्यास वहाँ उपस्थित हो गये। सत्यवती उन्हें देख कर बोलीं, “हे पुत्र! तुम्हारे सभी भाई निःसन्तान ही स्वर्गवासी हो गये। अतः मेरे वंश को नाश होने से बचाने के लिये मैं तुम्हें आज्ञा देती हूँ कि तुम नियोग विधि से उनकी पत्नियों से सन्तान उत्पन्न करो।” वेदव्यास उनकी आज्ञा मान कर बोले, “माता! आप उन दोनों रानियों से कह दीजिये कि वो मेरे सामने से निवस्त्र हॉकर गुजरें जिससे की उनको गर्भ धारण होगा।” सबसे पहले बड़ी रानी अम्बिका और फिर छोटी रानी छोटी रानी अम्बालिका गई पर अम्बिका ने उनके तेज से डर कर अपने नेत्र बन्द कर लिये जबकि अम्बालिका वेदव्यास को देख कर भय से पीली पड़ गई। वेदव्यास लौट कर माता से बोले, “माता अम्बिका का बड़ा तेजस्वी पुत्र होगा किन्तु नेत्र बन्द करने के दोष के कारण वह अंधा होगा जबकि अम्बालिका के गर्भ से पाण्डु रोग से ग्रसित पुत्र पैदा होगा ” । यह जानकार इससे माता सत्यवती ने बड़ी रानी अम्बिका को पुनः वेदव्यास के पास जाने का आदेश दिया। इस बार बड़ी रानी ने स्वयं न जा कर अपनी दासी को वेदव्यास के पास भेज दिया। दासी बिना किसी संकोच के वेदव्यास के सामने से गुजरी। इस बार वेदव्यास ने माता सत्यवती के पास आ कर कहा, “माते! इस दासी के गर्भ से वेद-वेदान्त में पारंगत अत्यन्त नीतिवान पुत्र उत्पन्न होगा।” इतना कह कर वेदव्यास तपस्या करने चले गये।

समय आने पर अम्बिका के गर्भ से जन्मांध धृतराष्ट्र, अम्बालिका के गर्भ से पाण्डु रोग से ग्रसित पाण्डु तथा दासी के गर्भ से धर्मात्मा विदुर का जन्म हुआ।

2. कौरवों के जन्म की कथा :

एक बार महर्षि वेदव्यास हस्तिनापुर आए। गांधारी ने उनकी बहुत सेवा की। जिससे प्रसन्न होकर उन्होंने गांधारी को वरदान मांगने को कहा। गांधारी ने अपने पति के समान ही बलवान सौ पुत्र होने का वर मांगा। समय पर गांधारी को गर्भ ठहरा और वह दो वर्ष तक पेट में ही रहा। इससे गांधारी घबरा गई और उसने अपना गर्भ गिरा दिया। उसके पेट से लोहे के समान एक मांस पिण्ड निकला।

महर्षि वेदव्यास ने अपनी योगदृष्टि से यह सब देख लिया और वे तुरंत गांधारी के पास आए। तब गांधारी ने उन्हें वह मांस पिण्ड दिखाया। महर्षि वेदव्यास ने गांधारी से कहा कि तुम जल्दी से सौ कुण्ड बनवाकर उन्हें घी से भर दो और सुरक्षित स्थान में उनकी रक्षा का प्रबंध कर दो तथा इस मांस पिण्ड पर जल छिड़को। जल छिड़कने पर उस मांस पिण्ड के एक सौ एक टुकड़े हो गए। व्यासजी ने कहा कि मांस पिण्डों के इन एक सौ एक टुकड़ों को घी से भरे कुंडों में डाल दो। अब इन कुंडों को दो साल बाद ही खोलना। इतना कहकर महर्षि वेदव्यास तपस्या करने हिमालय पर चले गए। समय आने पर उन्हीं मांस पिण्डों से पहले दुर्योधन और बाद में गांधारी के 99 पुत्र तथा एक कन्या उत्पन्न हुई।

3. पांडवों के जन्म की कथा :

पांचो पांडवो का जन्म भी बिना पिता के वीर्य के हुआ था। एक बार राजा पाण्डु अपनी दोनों पत्नियों – कुन्ती तथा माद्री – के साथ आखेट के लिये वन में गये। वहाँ उन्हें एक मृग का मैथुनरत जोड़ा दृष्टिगत हुआ। पाण्डु ने तत्काल अपने बाण से उस मृग को घायल कर दिया। मरते हुये मृग ने पाण्डु को शाप दिया, “राजन! तुम्हारे समान क्रूर पुरुष इस संसार में कोई भी नहीं होगा। तूने मुझे मैथुन के समय बाण मारा है अतः जब कभी भी तू मैथुनरत होगा तेरी मृत्यु हो जायेगी।”

इस शाप से पाण्डु अत्यन्त दुःखी हुये और अपनी रानियों से बोले, “हे देवियों! अब मैं अपनी समस्त वासनाओं का त्याग कर के इस वन में ही रहूँगा तुम लोग हस्तिनापुर लौट जाओ़” उनके वचनों को सुन कर दोनों रानियों ने दुःखी होकर कहा, “नाथ! हम आपके बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकतीं। आप हमें भी वन में अपने साथ रखने की कृपा कीजिये।” पाण्डु ने उनके अनुरोध को स्वीकार कर के उन्हें वन में अपने साथ रहने की अनुमति दे दी।

इसी दौरान राजा पाण्डु ने अमावस्या के दिन ऋषि-मुनियों को ब्रह्मा जी के दर्शनों के लिये जाते हुये देखा। उन्होंने उन ऋषि-मुनियों से स्वयं को साथ ले जाने का आग्रह किया। उनके इस आग्रह पर ऋषि-मुनियों ने कहा, “राजन्! कोई भी निःसन्तान पुरुष ब्रह्मलोक जाने का अधिकारी नहीं हो सकता अतः हम आपको अपने साथ ले जाने में असमर्थ हैं।”

ऋषि-मुनियों की बात सुन कर पाण्डु अपनी पत्नी से बोले, “हे कुन्ती! मेरा जन्म लेना ही वृथा हो रहा है क्योंकि सन्तानहीन व्यक्ति पितृ-ऋण, ऋषि-ऋण, देव-ऋण तथा मनुष्य-ऋण से मुक्ति नहीं पा सकता क्या तुम पुत्र प्राप्ति के लिये मेरी सहायता कर सकती हो?” कुन्ती बोली, “हे आर्यपुत्र! दुर्वासा ऋषि ने मुझे ऐसा मन्त्र प्रदान किया है जिससे मैं किसी भी देवता का आह्वान करके मनोवांछित वस्तु प्राप्त कर सकती हूँ। आप आज्ञा करें मैं किस देवता को बुलाऊँ।” इस पर पाण्डु ने धर्म को आमन्त्रित करने का आदेश दिया। धर्म ने कुन्ती को पुत्र प्रदान किया जिसका नाम युधिष्ठिर रखा गया। कालान्तर में पाण्डु ने कुन्ती को पुनः दो बार वायुदेव तथा इन्द्रदेव को आमन्त्रित करने की आज्ञा दी। वायुदेव से भीम तथा इन्द्र से अर्जुन की उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् पाण्डु की आज्ञा से कुन्ती ने माद्री को उस मन्त्र की दीक्षा दी। माद्री ने अश्वनीकुमारों को आमन्त्रित किया और नकुल तथा सहदेव का जन्म हुआ।

एक दिन राजा पाण्डु माद्री के साथ वन में सरिता के तट पर भ्रमण कर रहे थे। वातावरण अत्यन्त रमणीक था और शीतल-मन्द-सुगन्धित वायु चल रही थी। सहसा वायु के झोंके से माद्री का वस्त्र उड़ गया। इससे पाण्डु का मन चंचल हो उठा और वे मैथुन मे प्रवृत हुये ही थे कि शापवश उनकी मृत्यु हो गई। माद्री उनके साथ सती हो गई किन्तु पुत्रों के पालन-पोषण के लिये कुन्ती हस्तिनापुर लौट आई।

4. कर्ण के जन्म की कथा :

कर्ण का जन्म कुन्ती को मिले एक वरदान स्वरुप हुआ था। जब वह कुँआरी थी, तब एक बार दुर्वासा ऋषि उसके पिता के महल में पधारे। तब कुन्ती ने पूरे एक वर्ष तक ऋषि की बहुत अच्छे से सेवा की। कुन्ती के सेवाभाव से प्रसन्न होकर उन्होनें अपनी दिव्यदृष्टि से ये देख लिया कि पाण्डु से उसे सन्तान नहीं हो सकती और उसे ये वरदान दिया कि वह किसी भी देवता का स्मरण करके उनसे सन्तान उत्पन्न कर सकती है। एक दिन उत्सुकतावश कुँआरेपन में ही कुन्ती ने सूर्य देव का ध्यान किया। इससे सूर्य देव प्रकट हुए और उसे एक पुत्र दिया जो तेज़ में सूर्य के ही समान था, और वह कवच और कुण्डल लेकर उत्पन्न हुआ था जो जन्म से ही उसके शरीर से चिपके हुए थे। चूंकि वह अभी भी अविवाहित थी इसलिये लोक-लाज के डर से उसने उस पुत्र को एक बक्से में रख कर गंगाजी में बहा दिया।

5. राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुधन के जन्म की कथा :

दशरथ अधेड़ उम्र तक पहुँच गये थे लेकिन उनका वंश सम्हालने के लिए उनका पुत्र रूपी कोई वंशज नहीं था। उन्होंने पुत्र कामना के लिए अश्वमेध यज्ञ तथा पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराने का विचार किया। उनके एक मंत्री सुमन्त्र ने उन्हें सलाह दी कि वह यह यज्ञ अपने दामाद ऋष्यशृंग या साधारण की बोलचाल में शृंगि ऋषि से करवायें। दशरथ के कुल गुरु ब्रह्मर्षि वशिष्ठ थे। वह उनके धर्म गुरु भी थे तथा धार्मिक मंत्री भी। उनके सारे धार्मिक अनुष्ठानों की अध्यक्षता करने का अधिकार केवल धर्म गुरु को ही था। अतः वशिष्ठ की आज्ञा लेकर दशरथ ने शृंगि ऋषि को यज्ञ की अध्यक्षता करने के लिए आमंत्रित किया।

शृंगि ऋषि ने दोनों यज्ञ भलि भांति पूर्ण करवाये तथा पुत्रकामेष्टि यज्ञ के दौरान यज्ञ वेदि से एक आलौकिक यज्ञ पुरुष या प्रजापत्य पुरुष उत्पन्न हुआ तथा दशरथ को स्वर्णपात्र में नैवेद्य का प्रसाद प्रदान करके यह कहा कि अपनी पत्नियों को यह प्रसाद खिला कर वह पुत्र प्राप्ति कर सकते हैं। दशरथ इस बात से अति प्रसन्न हुये और उन्होंने अपनी पट्टरानी कौशल्या को उस प्रसाद का आधा भाग खिला दिया। बचे हुये भाग का आधा भाग (एक चौथाई) दशरथ ने अपनी दूसरी रानी सुमित्रा को दिया। उसके बचे हुये भाग का आधा हिस्सा (एक बटा आठवाँ) उन्होंने कैकेयी को दिया। कुछ सोचकर उन्होंने बचा हुआ आठवाँ भाग भी सुमित्रा को दे दिया। सुमित्रा ने पहला भाग भी यह जानकर नहीं खाया था कि जब तक राजा दशरथ कैकेयी को उसका हिस्सा नहीं दे देते तब तक वह अपना हिस्सा नहीं खायेगी। अब कैकेयी ने अपना हिस्सा पहले खा लिया और तत्पश्चात् सुमित्रा ने अपना हिस्सा खाया। इसी कारण राम (कौशल्या से), भरत (कैकेयी से) तथा लक्ष्मण व शत्रुघ्न (सुमित्रा से) का जन्म हुआ।

6. पवन पुत्र हनुमान के जन्म कि कथा :

पुराणों की कथानुसार हनुमान की माता अंजना संतान सुख से वंचित थी। कई जतन करने के बाद भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी। इस दुःख से पीड़ित अंजना मतंग ऋषि के पास गईं, तब मंतग ऋषि ने उनसे कहा-पप्पा सरोवर के पूर्व में एक नरसिंहा आश्रम है, उसकी दक्षिण दिशा में नारायण पर्वत पर स्वामी तीर्थ है वहां जाकर उसमें स्नान करके, बारह वर्ष तक तप एवं उपवास करना पड़ेगा तब जाकर तुम्हें पुत्र सुख की प्राप्ति होगी।

अंजना ने मतंग ऋषि एवं अपने पति केसरी से आज्ञा लेकर तप किया था बारह वर्ष तक केवल वायु का ही भक्षण किया तब वायु देवता ने अंजना की तपस्या से खुश होकर उसे वरदान दिया जिसके परिणामस्वरूप चैत्र शुक्ल की पूर्णिमा को अंजना को पुत्र की प्राप्ति हुई। वायु के द्वारा उत्पन्न इस पुत्र को ऋषियों ने वायु पुत्र नाम दिया।

7. हनुमान पुत्र मकरध्वज के ज़न्म की कथा :

हनुमान वैसे तो ब्रह्मचारी थे फिर भी वो एक पुत्र के पिता बने थे हालांकि यह पुत्र वीर्य कि जगाह पसीनें कि बूंद से हुआ था। कथा कुछ इस प्रकार है जब हनुमानजी सीता की खोज में लंका पहुंचे और मेघनाद द्वारा पकड़े जाने पर उन्हें रावण के दरबार में प्रस्तुत किया गया। तब रावण ने उनकी पूंछ में आग लगवा दी थी और हनुमान ने जलती हुई पूंछ से लंका जला दी। जलती हुई पूंछ की वजह से हनुमानजी को तीव्र वेदना हो रही थी जिसे शांत करने के लिए वे समुद्र के जल से अपनी पूंछ की अग्नि को शांत करने पहुंचे। उस समय उनके पसीने की एक बूंद पानी में टपकी जिसे एक मछली ने पी लिया था। उसी पसीने की बूंद से वह मछली गर्भवती हो गई और उससे उसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ। जिसका नाम पड़ा मकरध्वज। मकरध्वज भी हनुमानजी के समान ही महान पराक्रमी और तेजस्वी था उसे अहिरावण द्वारा पाताल लोक का द्वार पाल नियुक्त किया गया था। जब अहिरावण श्रीराम और लक्ष्मण को देवी के समक्ष बलि चढ़ाने के लिए अपनी माया के बल पर पाताल ले आया था तब श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराने के लिए हनुमान पाताल लोक पहुंचे और वहां उनकी भेंट मकरध्वज से हुई। तत्पश्चात मकरध्वज ने अपनी उत्पत्ति की कथा हनुमान को सुनाई। हनुमानजी ने अहिरावण का वध कर प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराया और मकरध्वज को पाताल लोक का अधिपति नियुक्त करते हुए उसे धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
8. द्रोणाचार्य के जन्म की कथा :

द्रोणाचार्य कौरव व पाण्डव राजकुमारों के गुरु थे। द्रोणाचार्य का जन्म कैसे हुआ इसका वर्णन महाभारत के आदि पर्व में मिलता है- एक समय गंगा द्वार नामक स्थान पर महर्षि भरद्वाज रहा करते थे। वे बड़े व्रतशील व यशस्वी थे। एक दिन वे महर्षियों को साथ लेकर गंगा स्नान करने गए। वहां उन्होंने देखा कि घृताची नामक अप्सरा स्नान करके जल से निकल रही है। उसे देखकर उनके मन में काम वासना जाग उठी और उनका वीर्य स्खलित होने लगा। तब उन्होंने उस वीर्य को द्रोण नामक यज्ञ पात्र (यज्ञ के लिए उपयोग किया जाने वाला एक प्रकार का बर्तन) में रख दिया। उसी से द्रोणाचार्य का जन्म हुआ। द्रोण ने सारे वेदों का अध्ययन किया। महर्षि भरद्वाज ने पहले ही आग्नेयास्त्र की शिक्षा अग्निवेश्य को दे दी थी। अपने गुरु भरद्वाज की आज्ञा से अग्निवेश्य ने द्रोणाचार्य को आग्नेयास्त्र की शिक्षा दी। द्रोणाचार्य का विवाह शरद्वान की पुत्री कृपी से हुआ था।

9. ऋषि ऋष्यश्रृंग के जन्म की कथा :

ऋषि ऋष्यश्रृंग महात्मा काश्यप (विभाण्डक) के पुत्र थे। महात्मा काश्यप बहुत ही प्रतापी ऋषि थे। उनका वीर्य अमोघ था और तपस्या के कारण अन्त:करण शुद्ध हो गया था। एक बार वे सरोवर में पर स्नान करने गए। वहां उर्वशी अप्सरा को देखकर जल में ही उनका वीर्य स्खलित हो गया। उस वीर्य को जल के साथ एक हिरणी ने पी लिया, जिससे उसे गर्भ रह गया। वास्तव में वह हिरणी एक देवकन्या थी। किसी कारण से ब्रह्माजी उसे श्राप दिया था कि तू हिरण जाति में जन्म लेकर एक मुनि पुत्र को जन्म देगी, तब श्राप से मुक्त हो जाएगी।

इसी श्राप के कारण महामुनि ऋष्यश्रृंग उस मृगी के पुत्र हुए। वे बड़े तपोनिष्ठ थे। उनके सिर पर एक सींग था, इसीलिए उनका नाम ऋष्यश्रृंग प्रसिद्ध हुआ। वाल्मीकि रामायण के अनुसार राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाया था। इस यज्ञ को मुख्य रूप से ऋषि ऋष्यश्रृंग ने संपन्न किया था। इस यज्ञ के फलस्वरूप ही भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न का जन्म हुआ था।

10. कृपाचार्य व कृपी के जन्म की कथा :

कृपाचार्य महाभारत के प्रमुख पात्रों में से एक थे। उनके जन्म के संबंध में पूरा वर्णन महाभारत के आदि पर्व में मिलता है। उसके अनुसार- महर्षि गौतम के पुत्र थे शरद्वान। वे बाणों के साथ ही पैदा हुए थे। उनका मन धनुर्वेद में जितना लगता था, उतना पढ़ाई में नहीं लगता था। उन्होंने तपस्या करके सारे अस्त्र-शस्त्र प्राप्त किए। शरद्वान की घोर तपस्या और धनुर्वेद में निपुणता देखकर देवराज इंद्र बहुत भयभीत हो गए। उन्होंने शरद्वान की तपस्या में विघ्न डालने के लिए जानपदी नाम की देवकन्या भेजी। वह शरद्वान के आश्रम में आकर उन्हें लुभाने लगी। उस सुंदरी को देखकर शरद्वान के हाथों से धनुष-बाण गिर गए। वे बड़े संयमी थे तो उन्होंने स्वयं को रोक लिया, लेकिन उनके मन में विकार आ गया था। इसलिए अनजाने में ही उनका शुक्रपात हो गया। वे धनुष, बाण, आश्रम और उस सुंदरी को छोड़कर तुरंत वहां से चल गए।

​उनका वीर्य सरकंडों पर गिरा था, इसलिए वह दो भागों में बंट गया। उससे एक कन्या और एक पुत्र की उत्पत्ति हुई। उसी समय संयोग से राजा शांतनु वहां से गुजरे। उनकी नजर उस बालक व बालिका पर पड़ी। शांतनु ने उन्हें उठा लिया और अपने साथ ले आए। बालक का नाम रखा कृप और बालिका नाम रखा कृपी। जब शरद्वान को यह बात मालूम हुई तो वे राजा शांतनु के पास आए और उन बच्चों के नाम, गोत्र आदि बतलाकर चारों प्रकार के धनुर्वेदों, विविध शास्त्रों और उनके रहस्यों की शिक्षा दी। थोड़े ही दिनों में कृप सभी विषयों में पारंगत हो गए। कृपाचार्य की योग्यता देखते हुए उन्हें कुरुवंश का कुलगुरु नियुक्त किया गया।

11. द्रौपदी व धृष्टद्युम्न के जन्म की कथा :

द्रोणाचार्य और द्रुपद बचपन के मित्र थे। राजा बनने के बाद द्रुपद को अंहकार हो गया। जब द्रोणाचार्य राजा द्रुपद को अपना मित्र समझकर उनसे मिलने गए तो द्रुपद ने उनका बहुत अपमान किया। बाद में द्रोणाचार्य ने पाण्डवों के माध्यम से द्रुपद को पराजित कर अपने अपमान का बदला लिया। राजा द्रुपद अपनी पराजय का बदला लेना चाहते थे था इसलिए उन्होंने ऐसा यज्ञ करने का निर्णय लिया, जिसमें से द्रोणाचार्य का वध करने वाला वीर पुत्र उत्पन्न हो सके। राजा द्रुपद इस यज्ञ को करवाले के लिए कई विद्वान ऋषियों के पास गए, लेकिन किसी ने भी उनकी इच्छा पूरी नहीं की।

अंत में महात्मा याज ने द्रुपद का यज्ञ करवा स्वीकार कर लिया। महात्मा याज ने जब राजा द्रुपद का यज्ञ करवाया तो यज्ञ के अग्निकुण्ड में से एक दिव्य कुमार प्रकट हुआ। इसके बाद उस अग्निकुंड में से एक दिव्य कन्या भी प्रकट हुई। वह अत्यंत ही सुंदर थी। ब्राह्मणों ने उन दोनों का नामकरण किया। वे बोले- यह कुमार बड़ा धृष्ट(ढीट) और असहिष्णु है। इसकी उत्पत्ति अग्निकुंड से हुई है, इसलिए इसका धृष्टद्युम्न होगा। यह कुमारी कृष्ण वर्ण की है इसलिए इसका नाम कृष्णा होगा। द्रुपद की पुत्री होने के कारण कृष्णा ही द्रौपदी के नाम से विख्यात हुई।

12. राधा के जन्म की कथा :

ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार एक बार गोलोक में किसी बात पर राधा और श्रीदामा नामक गोप में विवाद हो गया। इस पर श्रीराधा ने उस गोप को असुर योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया। तब उस गोप ने भी श्रीराधा को यह श्राप दिया कि आपको भी मानव योनि में जन्म लेना पड़ेगा। वहां गोकुल में श्रीहरि के ही अंश महायोगी रायाण नामक एक वैश्य होंगे। आपका छाया रूप उनके साथ रहेगा। भूतल पर लोग आपको रायाण की पत्नी ही समझेंगे, श्रीहरि के साथ कुछ समय आपका विछोह रहेगा।

ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार जब भगवान श्रीकृष्ण के अवतार का समय आया तो उन्होंने राधा से कहा कि तुम शीघ्र ही वृषभानु के घर जन्म लो। श्रीकृष्ण के कहने पर ही राधा व्रज में वृषभानु वैश्य की कन्या हुईं। राधा देवी अयोनिजा थीं, माता के गर्भ से उत्पन्न नहीं हुई। उनकी माता ने गर्भ में वायु को धारण कर रखा था। उन्होंने योगमाया की प्रेरणा से वायु को ही जन्म दिया परंतु वहां स्वेच्छा से श्रीराधा प्रकट हो गईं।

13. राजा सगर के साठ हजार पुत्रों के जन्म की कथा :

रामायण के अनुसार इक्ष्वाकु वंश में सगर नामक प्रसिद्ध राजा हुए। उनकी दो रानियां थीं- केशिनी और सुमति। दीर्घकाल तक संतान जन्म न होने पर राजा अपनी दोनों रानियों के साथ हिमालय पर्वत पर जाकर पुत्र कामना से तपस्या करने लगे। तब महर्षि भृगु ने उन्हें वरदान दिया कि एक रानी को साठ हजार अभिमानी पुत्र प्राप्त तथा दूसरी से एक वंशधर पुत्र होगा।

कालांतर में सुमति ने तूंबी के आकार के एक गर्भ-पिंड को जन्म दिया। राजा उसे फेंक देना चाहते थे किंतु तभी आकाशवाणी हुई कि इस तूंबी में साठ हजार बीज हैं। घी से भरे एक-एक मटके में एक-एक बीज सुरक्षित रखने पर कालांतर में साठ हजार पुत्र प्राप्त होंगे। इसे महादेव का विधान मानकर सगर ने उन्हें वैसे ही सुरक्षित रखा। समय आने पर उन मटकों से साठ हजार पुत्र उत्पन्न हुए। जब राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया तो उन्होंने अपने साठ हजार पुत्रों को उस घोड़े की सुरक्षा में नियुक्त किया।

देवराज इंद्र ने उस घोड़े को छलपूर्वक चुराकर कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया। राजा सगर के साठ हजार पुत्र उस घोड़े को ढूंढते-ढूंढते जब कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे तो उन्हें लगा कि मुनि ने ही यज्ञ का घोड़ा चुराया है। यह सोचकर उन्होंने कपिल मुनि का अपमान कर दिया। ध्यानमग्न कपिल मुनि ने जैसे ही अपनी आंखें खोली राजा सगर के 60 हजार पुत्र वहीं भस्म हो गए।

14. जनक नंदिनी सीता के जन्म की कहानी :

भगवान श्रीराम की पत्नी सीता का जन्म भी माता के गर्भ से नहीं हुआ था। रामायण के अनुसार उनका जन्म भूमि से हुआ था। वाल्मीकि रामायण के बाल काण्ड में राजा जनक महर्षि विश्वामित्र से कहते हैं कि-

अथ मे कृषत: क्षेत्रं लांगलादुत्थिता तत:।
क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता।
भूतलादुत्थिता सा तु व्यवर्धत ममात्मजा।

अर्थात्- एक दिन मैं यज्ञ के लिए भूमि शोधन करते समय खेत में हल चला रहा था। उसी समय हल के अग्र भाग से जोती गई भूमि से एक कन्या प्रकट हुई। सीता (हल द्वारा खींची गई रेखा) से उत्पन्न होने के कारण उसका नाम सीता रखा गया। पृथ्वी से प्रकट हुई वह मेरी कन्या क्रमश: बढ़कर सयानी हुई।

15. मनु व शतरूपा के जन्म की कहानी :

धर्म ग्रंथों के अनुसार मनु व शतरूपा सृष्टि के प्रथम मानव माने जाते हैं। इन्हीं से मानव जाति का आरंभ हुआ। मनु का जन्म भगवान ब्रह्मा के मन से हुआ माना जाता है। मनु का उल्लेख ऋग्वेद काल से ही मानव सृष्टि के आदि प्रवर्तक और समस्त मानव जाति के आदि पिता के रूप में किया जाता रहा है। इन्हें ‘आदि पुरूष’ भी कहा गया है। वैदिक संहिताओं में भी मनु को ऐतिहासिक व्यक्ति माना गया है। ये सर्वप्रथम मानव थे जो मानव जाति के पिता तथा सभी क्षेत्रों में मानव जाति के पथ प्रदर्शक स्वीकृत हैं। मनु का विवाह ब्रह्मा के दाहिने भाग से उत्पन्न शतरूपा से हुआ था।
मनु एक धर्म शास्त्रकार भी थे। धर्मग्रंथों के बाद धर्माचरण की शिक्षा देने के लिये आदिपुरुष स्वयंभुव मनु ने स्मृति की रचना की जो मनुस्मृति के नाम से विख्यात है। उत्तानपाद जिसके घर में ध्रुव पैदा हुआ था, इन्हीं का पुत्र था। मनु स्वायंभुव का ज्येष्ठ पुत्र प्रियव्रत पृथ्वी का प्रथम क्षत्रिय माना जाता है। इनके द्वारा प्रणीत ‘स्वायंभुव शास्त्र’ के अनुसार पिता की संपत्ति में पुत्र और पुत्री का समान अधिकार है। इनको धर्मशास्त्र का और प्राचेतस मनु अर्थशास्त्र का आचार्य माना जाता है। मनुस्मृति ने सनातन धर्म को आचार संहिता से जोड़ा था।

16. राजा पृथु के जन्म की कथा :

पृथु एक सूर्यवंशी राजा थे, जो वेन के पुत्र थे। स्वयंभुव मनु के वंशज राजा अंग का विवाह सुनिथा नामक स्त्री से हुआ था। वेन उनका पुत्र हुआ। वह पूरी धरती का एकमात्र राजा था। सिंहासन पर बैठते ही उसने यज्ञ-कर्मादि बंद कर दिये। तब ऋषियों ने मंत्रपूत कुशों से उसे मार डाला, लेकिन सुनिथा ने अपने पुत्र का शव संभाल कर रखा। राजा के अभाव में पृथ्वी पर पाप कर्म बढऩे लगे। तब ब्राह्मणों ने मृत राजा वेन की भुजाओं का मंथन किया, जिसके फलस्वरूप स्त्री-पुरुष का जोड़ा प्रकट हुआ। पुरुष का नाम पृथु तथा स्त्री का नाम अर्चि हुआ। अर्चि पृथु की पत्नी हुई। पृथु पूरी धरती के एकमात्र राजा हुए। पृथु ने ही उबड़-खाबड़ धरती को जोतने योग्य बनाया। नदियों, पर्वतों, झरनों आदि का निर्माण किया। राजा पृथु के नाम से ही इस धरा का नाम पृथ्वी पड़ा।-
===================================================================

Friday, March 11, 2016

4>|| পৌরাণিক কাহিনী( 20 to 29 )


 MYTHOLOGICAL STORIES=পৌরাণিক কাহিনী · 


                    
4>MTL-Story=Post=4***श्रीगणेश के श्राप के कारण***( 1 to 10 )

  02>------------श्रीगणेश के श्राप के कारण कृष्ण पर लगा था चोरी का झूठा आरोप!=+mtl
21>------------भगवान गणेश थे बालब्रह्मचारी, फिर कैसे की दो शादिया?=+mtl
22>------------कश्यप ऋषि के श्राप के कारण शिवजी ने काटा था बालक गणेश का मस्तक=+mtl
23>------------कुंवारी कन्याओं को शिवलिंग की पूजा क्यों नहीं करनी चाहिए=+mtl
24>------------भगवान शिव के दो नहीं पांच पुत्रो=+mtl
25>------------अर्द्धनारीश्वर रूप के पीछे छुपे इस सत्य को जान आपकी रूह कांप उठेगी!=+mtl
26>------------क्यों चढ़ाते हैं शिवलिंग पर भस्म?=+mtl
27>------------किस बात का शिवजी को हुआ पछतावा कि तोड़ दिया अपना त्रिशूल ?=+mtl
  28--------------क्यों काटा था काल भैरव ने ब्रह्मा जी का पांचवा शीश -


29------------जब माता पार्वती ने दिया शिव, विष्णु, नारद, कार्तिकेय और रावण को श्राप -

    *********************************************************************************

    1>श्रीगणेश के श्राप के कारण कृष्ण पर लगा था चोरी का झूठा आरोप!

    भगवान गणेश का जन्म दिवस गणेश चतुर्थी के से जुडी है ये अद्भुद पौराणिक कथा, भागद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था, इस दिन को विशेष तौर पे महाराष्ट्र में बड़े धूम धाम से मनाया जाता हैं और ये उतसव पुरे दस दिनों तक चलता है( लोकमान्य तिलक ने शुरू करवाया था.).

    गणेश चतुर्थी के दिन गणेश को चन्द्रलोक में भोज का निमंत्रण था, गणेश को मोदक प्रिय है और मोदक ही भोजन में था ऐसे में टूट पड़े और इतना ही नही बच्चे खुले लड्डू भी अपने साथ समेट के ले गए. एक दम दबाके लड्डू खाए गणेश को नींद भी आने लगी और निकलते समय ही वो गिर पड़े और पुरे लड्डू बिखर गए, लेकिन ये दिख चन्द्रदेव अपनी हंसी न रोक पाये और जोर जोर से हंस पड़े.

    इस पर गणेश क्रोधित हो गए और उन्हें श्राप दे डाला की मुझपे हंसने वाले जो तुझे देखेगा उसपे चोरी का झूठा नाम लग जायेगा और वो बदनाम होगा, अपनी प्रतिष्ठा पर बात आते देख चन्द्रदेव घबरा के गणेश के चरणो में गिर गए और क्षमा याचना करने लगे. कुछ देर बाद गणेश का गुस्सा शांत हुआ लेकिन उन्होंने श्राप को चतुर्थी के दिन जारी रखा, तब से चतुर्थी के दिन चाँद को नही देखा जाता है अगर देख ले तो अनिष्ट हो जाता है.

    कृष्ण पर चोरी का झूठा आरोप: द्वापर युग में एक राजा था नाम था, जिनका नाम था सत्राजित उन्होंने सूर्य को प्रसन्न कर स्यमन्तक मणि वरदान में पाली थी. वो मणि रोज आठ भरी सोना देती थी और जन्हा वो रहती थी( जिसके पास) वंहा कोई समस्या नही होती थी.

    एक दिन जब कृष्ण खेल रहे थे तो सत्राजित मणि सर पर लगा उनसे मिलने पहुंचे जिसे देख कृष्ण ने कहा की इस मणि के अधिकारी तो राजा उग्रसेन जी है। बात सुन सत्राजित बिना कुछ बोले ही वहाँ से उठ कर चले गए, मणि को अपने घर के मन्दिर में स्थापित कर दिया।

    गणेश चतुर्थी का दिन था और कृष्ण अपने महल में खड़े थे और उनकी नजर चन्द्र पे पड़ गई, तब रुक्मणी जी को बड़ी चिंता हुई की मेरे पति किस मुसीबत में पड़ने वाले है. उसी दिन राजा का भाई स्यमन्तक को पहन कर घोड़े पर सवार हो शिकार पे निकला जन्हा एक सिंह ने उसे मार गिराया। मणि भी उसके पेट में चली गई जिसे ऋक्षराज जामवंत ने मारा और वह मणि पाली और अपनी गुफा में चला गया। जामवंत ने उस मणि को अपने बालक को दे दिया जो उसे खिलौना समझ उससे खेलने लगा।

    भाई के गायब होने पर राजा ने बिना सोचे कृष्ण जी पर हत्या और चोरी के आरोप फैला दिए। आरोप झुटलाने के लिए श्री कृष्ण वन में गए जन्हा उन्होंने घोड़ा सहित प्रसेनजित को मरा हुआ देखा पर मणि नहीं दिखी। निकट ही सिंह के पंजों के चिन्ह थे, जिनके सहारे आगे बढ़ने पर उन्हें मरे हुए सिंह का शरीर मिला। वहाँ पर रीछ के पैरों के पद-चिन्ह भी मिले जो कि एक गुफा तक गये थे।

    तब जामवंत से अठाईस दिन तक युद्ध कर उन्होंने पूर्व राम जन्म का वादा जामवंत से पूरा किया और मणि वापस देकर अपना कलंक हटाया. जामवंत ने अपनी पुत्री जामवंत का हाथ भगवान के हाथ में दिया और शर्मवश राजा सत्राजित ने अपनी पुत्री सत्यभामा का विवहा कृष्ण से कर अपने पाप का प्रायश्चित किया.

    जब गणेश को ये पता चला तो उन्होंने गणेश चतुर्थी के दिन को भी चन्द्र को श्राप मुक्त कर दिया, इस कारन गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्र को देखने से दोष नही लगता है. गणपति बाप्पा मोरेया.
    ============================================
    2>.==भगवान गणेश थे बालब्रह्मचारी, फिर कैसे की दो शादिया?

    भगवान गणेश बालब्रह्मचारी थे लेकिन बाद में ऐसा क्या हो गया की उन्होंने एक नही दो दो शादिया की? इसके लिए पौराणो के गर्भ में जाना होगा आपको लेकिन हम है न. सति तुलसी का नाम तो अपने सुना ही होगा जो की जालंधर से ब्याही गई और बाद में भगवान विष्णु के छलावे के चलते उन्हें श्राप दे पत्थर का बना दिया.

    इन्ही सति की जब असुरराज जालंधर से शादी नही हुई थी तो उन्होंने एक बार गणेश को देख उन्हें अपने पति रूप में पानी की इच्छा इन्ही बालब्रह्मचारी गणेश से कर दी. बस फिर क्या था भड़क गए गणेश और कर दिया इंकार, इस पर तुलसी ने गणेश को श्राप दिया की जिस ब्रह्मचर्य पे तुम अकड़ रहे हो वो नही रहेगा और तुम्हारी दो दो शादिया होगी, तब गणेश ने भी श्राप दिया की तुम्हारी एक असुर से शादी होगी.

    फिर भी शादी तो अपने से नही होती है, तो सुनिए एक बाद दक्षराज अपनी दो बेटियो की शादी को लेकर चिंतित थे तो नारद ने उन्हें शिव पारवती से अपनी चिंता जताने को कहा. चूँकि नारद सब जानते थे की शिव पारवती के तो पुत्र है, ऐसे में दक्षराज अपनी दोनों बेटियो को बहु रूप में स्वीकार करने की विनती महादेव और सति से करने लगा.

    लेकिन दोनों बेटियो की एक शर्त भी थी की वो शादी एक ही पुरुष से करेगी, ऐसे में महादेव और पारवती संशय में थे. दोनों ने एक तरीका निकला दोनों पुत्रो को शादी के बारे में बिना बताये ही दोनों में एक प्रतिस्पर्धा रखी जिसका इनाम शादी थी, प्रतियोगिता ये थी को जो भाई पुरे ब्रह्माण्ड की परिक्रमा सात बार सबसे पहले कर के आएगा वही जीतेगा.

    कार्तिकेय तुरंत अपने वाहन मोर को तुरंत निकल लिए लेकिन मूषक की सवारी करने वाले गणेश वंही रुके, चूँकि उनका वाहन काफी धीमा था तो उन्होंने बुद्धि का इस्तेमाल किया.

    माता पिता को एक चौक्की पे बैठाया और उनके सात परिक्रमा कर जीत का दावा किया. उनका तर्क था की माता पिता की तुलना शास्त्रो में ब्रह्माण्ड से की है तो मैं जीत गया, गणेश की बुद्धिमता देख माता पिता प्रसन्न हुए पर जब कार्तिकेय आया तो इसे छल समझ वंहा से नाराज हो चले गए

    तब गणेश को इनाम में शादी मिली जो उनके न चाहने पर भी उन्हें माता पिता की आज्ञा और जीत के तोहफे के रूप में स्वीकार करनी पड़ी सति तुलसी का श्राप भी पूरा हुआ और दक्षराज की समस्या भी. दोनों पत्नियों का नाम ऋद्धि और सिद्धि था, और उनसे शुभ और लाभ नाम के दो पुत्र भी हुए गणेश के, जो आज भी व्यापारियों के लिए प्रथम पूजनीय है.
                                             गणपति बाप्पा मोरया.
    ==============================================

    3>कश्यप ऋषि के श्राप के कारण शिवजी ने काटा था बालक गणेश का मस्तक

    कहते है की इंसान का वर्तमान, उसके पिछले कर्मो पर और भविष्य वर्तमान कर्मों पर आधारित होता है। लेकिन यह बात केवल इंसानो पर ही नहीं अपितु भगवानों पर भी लागू होती है। हमारे पुराणों में अनेक ऐसी कथाएँ है जब भगवान द्वारा अतीत में किये गए अनुचित कार्यों के कारण उन्हें आने वाले समय में कष्ट उठाने पड़े। ऐसी ही एक कहानी भगवान शंकर से सम्बंधित है जब उन्हें कश्यप ऋषि द्वारा दिए गए शाप के कारण अपने ही पुत्र गणेश का मस्तक काटना पड़ा।

    भगवान गणेश का जन्म की कहानी :

    देवी पार्वती ने एक बार शिवजी के गण नन्दी के द्वारा उनकी आज्ञा पालन में त्रुटि के कारण अपने शरीर के उबटन से एक बालक का निर्माण कर उसमें प्राण डाल दिए और कहा कि तुम मेरे पुत्र हो। तुम मेरी ही आज्ञा का पालन करना और किसी की नहीं। देवी पार्वती ने यह भी कहा कि मैं स्नान के लिए जा रही हूं। कोई भी अंदर न आने पाए। थोड़ी देर बाद वहां भगवान शंकर आए और देवी पार्वती के भवन में जाने लगे।

    यह देखकर उस बालक ने विनयपूर्वक उन्हें रोकने का प्रयास किया। बालक का हठ देखकर भगवान शंकर क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने त्रिशूल से उस बालक का सिर काट दिया। देवी पार्वती ने जब यह देखा तो वे बहुत क्रोधित हो गई। उनकी क्रोध की अग्नि से सृष्टि में हाहाकार मच गया। तब सभी देवताओं ने मिलकर उनकी स्तुति की और बालक को पुनर्जीवित करने के लिए कहा।

    तब भगवान शंकर के कहने पर विष्णुजी एक हाथी का सिर काटकर लाए और वह सिर उन्होंने उस बालक के धड़ पर रखकर उसे जीवित कर दिया। तब भगवान शंकर व अन्य देवताओं ने उस गजमुख बालक को अनेक आशीर्वाद दिए। देवताओं ने गणेश, गणपति, विनायक, विघ्नहरता, प्रथम पूज्य आदि कई नामों से उस बालक की स्तुति की। इस प्रकार भगवान गणेश का प्राकट्य हुआ।

    कश्यप ऋषि ने दिया था शिव जी को शाप :

    ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार एक बार नारद जी ने श्री नारायण से पूछा कि प्रभु आप बहुत विद्वान है और सभी वेदों को जानने वाले हैं। मैं आप से ये जानना चाहता हूं कि जो भगवान शंकर सभी परेशानियों को दूर करने वाले माने जाते हैं। उन्होंने क्यों अपने पुत्र गणेश की के मस्तक को काट दिया।

    यह सुनकर श्रीनारायण ने कहा नारद एक समय की बात है। शंकर ने माली और सुुमाली को मारने वाले सूर्य पर बड़े क्रोध में त्रिशूल से प्रहार किया। सूर्य भी शिव के समान तेजस्वी और शक्तिशाली था। इसलिए त्रिशूल की चोट से सूर्य की चेतना नष्ट हो गई। वह तुरंत रथ से नीचे गिर पड़ा। जब कश्यपजी ने देखा कि मेरा पुत्र मरने की अवस्था में हैं। तब वे उसे छाती से लगाकर फूट-फूटकर विलाप करने लगे। उस समय सारे देवताओं में हाहाकार मच गया। वे सभी भयभीत होकर जोर-जोर से रुदन करने लगे। अंधकार छा जाने से सारे जगत में अंधेरा हो गया। तब ब्रह्मा के पौत्र तपस्वी कश्यप जी ने शिव जी को शाप दिया वे बोले जैसा आज तुम्हारे प्रहार के कारण मेरे पुत्र का हाल हो रहा है। ठीक वैसे ही तुम्हारे पुत्र पर भी होगा। तुम्हारे पुत्र का मस्तक कट जाएगा।

    यह सुनकर भोलेनाथ का क्रोध शांत हो गया। उन्होंने सूर्य को फिर से जीवित कर दिया। सूर्य कश्यप जी के सामने खड़े हो गए। जब उन्हें कश्यप जी के शाप के बारे में पता चला तो उन्होंने सभी का त्याग करने का निर्णय लिया। यह सुनकर देवताओं की प्रेरणा से भगवान ब्रह्मा सूर्य के पास पहुंचे और उन्हें उनके काम पर नियुक्त किया।

    ब्रह्मा, शिव और कश्यप आनंद से सूर्य को आशीर्वाद देकर अपने-अपने भवन चले गए। इधर सूर्य भी अपनी राशि पर आरूढ़ हुए। इसके बाद माली और सुमाली को सफेद कोढ़ हो गया, जिससे उनका प्रभाव नष्ट हो गया। तब स्वयं ब्रह्मा ने उन दोनों से कहा-सूर्य के कोप से तुम दोनों का तेज खत्म हो गया है। तुम्हारा शरीर खराब हो गया है। तुम सूर्य की आराधना करो। उन दोनों ने सूर्य की आराधना शुरू की और फिर से निरोगी हो गए।
    =============================================

    4>=कुंवारी कन्याओं को शिवलिंग की पूजा क्यों नहीं करनी चाहिए

    धार्मिक रीति-रिवाज

    धार्मिक रीति-रिवाजों को लोग विशेष महत्ता प्रदान करते हैं.... धर्म शास्त्रों में बताया गया है कि किसी भी धार्मिक कार्य को करते समय उसके नियमों का पालन करना आनिवार्य है। धार्मिक शास्त्रों में उल्लेखित किसी भी बात को अनदेखा करना उस जातक के लिए ही नुकसानदेह है, जो किसी विशेष पूजा से वरदान की अपेक्षा रखता है।

    धार्मिक नियम

    हम इस बात को झुठला नहीं सकते कि नियमों का पालन करने के साथ हमारे धार्मिक शास्त्र अपने भक्तों को कुछ नियमों में विभाजित भी करते हैं। कौन से जातक किस प्रकार के धार्मिक कार्यों का हिस्सा बन सकते हैं एवं किन कार्यों में गलती से भी भाग नहीं ले सकते, इस सबका वर्णन धर्म ग्रंथों में किया गया है।

    भगवान शिव का ‘शिवलिंग’

    ऐसा ही एक नियम भगवान शिव के रूप ‘शिवलिंग’ से जुड़ा है, जिसके संदर्भ में यह माना जाता है कि कुंवारी कन्याएं शिवलिंग को हाथ भी नहीं लगा सकतीं। उनके द्वारा इस शिवलिंग की पूजा का ख्याल करना भी निषेध है। लेकिन ऐसा क्यों?

    कुछ धार्मिक मान्यताएं

    हम जिस गुरु अथवा भगवान को मानते हैं, जिनकी दिन रात आराधना करते हैं, वे स्वयं ही हमें नियमों में क्यों बांधना पसंद करेंगे? लेकिन धार्मिक मान्यताओं को आधार बनाते हुए ऐसा कहा जाता है कि अविवाहित कन्याओं को हमेशा ही शिवलिंग की पूजा से दूर रखना चाहिए।

    कुंवारी कन्याओं के लिए वर्जित है पूजा

    ऐसी मान्यता है कि लिंगम एक साथ योनि (जो देवी शक्ति का प्रतीक है एवं महिला की रचनात्मक ऊर्जा है) का प्रतिनिधित्व करता है। हालांकि शास्त्रों में ऐसा कुछ नहीं लिखा है। शिवपुराण के अनुसार यह एक ज्योति‍ का प्रतीक है।

    क्या है सामाजिक धारणा?

    कुछ सामाजिक धारणाओं के अनुसार शिवलिंग की पूजा सिर्फ पुरुष के द्वारा संपन्न होनी चाहिए न कि नारी के द्वारा। महिलाओं को शिवलिंग की पूजा से दूर ही रखा जाता है, खासतौर पर अविवाहित स्त्री को शिवलिंग पूजा से पूरी तरह से वर्जित रखा जाता है। परन्तु ऐसी मान्यताएं क्यों बनाई गई हैं?

    शिवलिंग के करीब जाने से मनाही

    किंवदंतियों के अनुसार अविवाहित स्त्री को शिवलिंग के करीब जाने की आज्ञा नहीं है। आमतौर पर शिवलिंग की पूजा करने के बाद श्रद्धालु इसके आसपास घूमकर परिक्रमा करने को सही मानते हैं, लेकिन अविवाहित स्त्री को इसके चारों ओर घूमने की भी इजाज़त नहीं दी जाती। ऐसा इसलिए क्योंकि भगवान शिव बेहद गंभीर तपस्या में लीन रहते हैं।

    शिव की तपस्या से है संबंध

    और किसी स्त्री के कारण उनकी तपस्या भंग ना हो जाए, इसका ध्यान रखना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। हमेशा से ही जब भी भगवान शिव की पूजा की जाती है तो विधि-विधान का बहुत खयाल रखा जाता है। केवल मनुष्य जाति ही नहीं, देवता व अप्सराएं भी भगवान शिव की पूजा करते समय बेहद सावधानी से उनकी पूजा करती हैं।

    क्रोधित हो जाते हैं शिव जी

    यह इसलिए कि कहीं देवों के देव महादेव की समाधि भंग न हो जाए। जब शिव की समाधि भंग होती है तो वे क्रोधित हो जाते हैं और अपने रौद्र रूप में प्रकट होते हैं जिसे शांत कर सकना किसी असंभव कार्य के समान है। इसी कारण से महिलाओं को शिव पूजा न करने के लिए कहा गया है।

    लेकिन शिव की पूजा कर सकते हैं

    लेकिन शिवलिंग की पूजा से अविवाहित स्त्रियों को दूर रखने का यह अर्थ नहीं है कि वे भगवान शिव की पूजा नहीं कर सकतीं। बल्कि कुंवारी कन्याएं ही शिव जी की सबसे अधिक आराधना करती हैं। अपने लिए एक अच्छे वर की कामना करते हुए वे पूर्ण विधि-विधान से शिव जी के 16 सोमवार का व्रत रखती हैं।

    शिव के सोमवार व्रत

    व्रत के साथ वे शिव जी की पूर्ण नियमों के साथ पूजा भी करती हैं। और ऐसी मान्यता है कि भक्तों के भोले भगवान शंकर उन्हें वरदान भी देते हैं। एक अच्छे वर के अलावा एक महिला का पति उससे प्रेम करे और अच्छा बर्ताव करे, इसके लिए भी महिलाएं 10 सोमवार का व्रत रखती हैं।

    धार्मिक मान्यताएं

    इसके साथ ही पति-पत्नी का वैवाहिक जीवन सफल बना रहे, इसके लिए महिलाएं शिव तथा माता पार्वती जी की एक साथ पूजा करती हैं। हिन्दू मान्यताओं में दुनिया की सबसे श्रेष्ठ जोड़ी का श्रेय भगवान शिव एवं पार्वती जी को दिया गया है।

    शिव एवं पार्वती

    ऐसी मान्यता प्रसिद्ध है कि इन दोनों के प्रेम तथा स्नेह वाली जोड़ी पूरी दुनिया में और किसी की नहीं है। इसलिए भक्त अपने अच्छे विवाहित जीवन के लिए शिव एवं पार्वती की विधिपूर्वक पूजा करते हैं।

    सफल विवाह के लिए पूजा

    पति-पत्नी का विवाह सफल हो इसके लिए पूजा के साथ कुछ लोग व्रत भी रखते हैं। लेकिन यह व्रत विशेष रूप से केवल सोमवार को ही किया जाए, ऐसी कोई मान्यता नहीं है। यह व्रत किसी भी दिन रखा जा सकता है, लेकिन शिव के भक्त सोमवार को भगवन शिव जी का प्रिय दिन मानकर ही व्रत एवं पूजा करते हैं।

    श्रावण के माह में करें व्रत

    यूं तो वर्ष के सभी सोमवार भगवान शिव की आराधना के लिए माने गए हैं, लेकिन विशेष रूप से श्रावण के माह (सावन का महीना) के सोमवार को अधिक महत्ता प्रदान की गयी है। सावन का महीना जो कि भगवान शिव को सबसे ज्यादा प्रिय है, इस समय भक्त वे सब कुछ करते हैं जिससे शिव जी प्रसन्न होकर उन्हें मनोवांछित वरदान प्रदान कर सकें।

    होगी शिव जी की अपार कृपा

    इसलिए यदि आप भी भगवान शिव से इस समय किसी वरदान की अपेक्षा कर रहे हैं, तो सावन का यह महीना आपके लिए सही समय लेकर आया है। इस महीने कुल 4 सोमवार हैं, जिसमें विधिपूर्वक व्रत एवं पूजा करके शिव जी की कृपा पाई जा सकती है।
    =====================================================

    5>== भगवान शिव के दो नहीं पांच पुत्रो

    भगवान शिव भोलेनाथ है और अपने भक्तो पर अपनी कृपा बनाये रखते है विशेष कर श्रावण मास तो उनका प्रिय है और इस महीने में उन्हें आसानी से मनाया जा सकता है. उन भोलेनाथ के परिवार के बारे में हम आपको इस विशेष माह में बताते है, आ शायद शिव के पुत्रो के बारे में जानते होंगे गणेश और कार्तिकेय पर आपको पता है शिव को इन दो के आलावा भी तीन और पुत्र है.

    पहले गणेश जिन्हे पारवती ने अपने शरीर के मैल से बनाया फिर कार्तिकेय जो की शिव और पारवती के मिलानसे पैदा हुए, तीसरे क्रम का तो हमें पता नहीं पर फिर भी हम आपको बता देते है की उनकी उत्पति कैसे हुई. भष्मासुर का नाम तो आपने सुना ही होगा, शिव से वरदान पा वो शिव पे ही आजमाने चला था तब शिव वंहा से भागे. तब मोहिनी रूप धर विष्णु ने भस्मासुर को अपने ही हाथो मरवाया, उनके इस रूप से शिव भी मोहित हो गए और दोनों ने मिलान किया जिससे अय्यपा या सास्वत पुत्र ने जन्म लिया. इनकी पूजा विशेष कर दक्षिण भारत में होती है वो भी इन्ही दिनों में.

    दूसरा था अंधक जो की भगवान शिव के पसीने से पैदा हुआ था, भगवान शिव तपस्या में रत थे तो उस समय उन्हें सर पे पसीना आया और उसकी बून्द धरती पर गिरी. पसीने की बून्द से एक बालक बना जिसे असुर ले गए उन्होंने ही उसे पाल पोसा, आखिर में दैत्य प्रवर्ति के चलते अंधक ने शिव की अर्धांगिनी पारवती पर कुदृष्टि डाली तो भोलेनाथ ने अपने हाथो से ही उसका वध कर दिया.


    शिव का पांचवा पुत्र भी कुछ ऐसे ही जन्मा उसका जन्म शिव जो की तपस्या रत थे के सीने से निकले प्रकाश के धरती पर पड़ने से हुआ, भगवान शिव ने उसे पृथ्वी को ही पलने के लिए दिया. जब वो पैदा हुआ तो पूरा लाल रंग का था और उसके चार हाथ थे. थोड़ा बड़ा होने के बाद खुरा (भौमा) उसका नाम रखा गया और उसने भगवान शिव की तपस्या कर उनसे वरदान पाया और मंगल गृह बन के सितारा बन रहने लगे जो की मंगल गृह है वो मेष राशि के स्वामी है और लोहे के देवता भी है. शुक्रग्रह के मुकाबले वो कई बड़ी गृह है.
    ============================================
    6>अर्द्धनारीश्वर रूप के पीछे छुपे इस सत्य को जान आपकी रूह कांप उठेगी!

    भगवान की महिमा अपने भक्तो से ही है, भगवान अपने से ज्यादा अपने भक्तो का गुणगान करने से अत्यधिक प्रसन्न होते है. ऐसे ही एक परम भक्त जिनकी महिमा हालाँकि उतनी नही फैली जितनी की होनी चाहिए क्योंकि उनकी भक्ति में थोड़ी सी कमी रह गई थी जिसकी बाद में उन्होंने भरपाई की.

    "शीश गैंग अर्धांग पार्वती..... नंदी भृंगी नृत्य करात है" शिव स्तुति में भृंगी नाम आपने सुना होगा, ये एक पौराणिक कालीन ऋषि थे जो की शिव के परम भक्त थे. लेकिन भक्त कुछ ज्यादा ही कट्टर थे, इतने की शिव की तो आराधना करते लेकिन बाकि भक्तो की भांति पार्वती को नहीं भजते थे.

    उनकी भक्ति अदम्य थी लेकिन वो पार्वती जी को हमेशा ही शिव से अलग समझते थे या यु कहे उनके कुछ नही समझते थे, ये उनका घमंड नही बल्कि शिव और केवल शिव में आसक्ति थी जिसमे उन्हें शिव के आलावा कुछ और दीखता ही नही था. एक बार तो ऐसा हुआ की वो कैलाश पर भगवान शिव की परिक्रमा करने गए लेकिन वो पार्वती की परिक्रमा नही करना चाहते थे.

    इस पार्वती ने ऐतराज जताया और कहा की हम दो जिस्म एक जान है तुम ऐसा नही कर सकते पर कट्टरता देखिये भृंगी ने पार्वती को अनसुना किया और शिव की परिक्रमा लगाने बढे. लेकिन तब पार्वती शिव से सट के बैठ गई, मामले में और नया मोड़ आया भृंगी ने सर्प का रूप धरा और दोनों के बीच से होते हुए शिव की परिक्रमा देनी चाही.

    तब शिव ने पार्वती का साथ दिया और संसार में अर्धनारीश्वर रूप धरा, तब भृंगी क्या करते पर गुस्से में आके उन्होंने चूहे का रूप धरा और शिव और पार्वती को बीच से कुतरने लगे. पर तब शक्ति को क्रोध आया और उन्होंने भृंगी को श्राप दिया की जो शरीर तुम्हे अपनी माँ से मिला है वो तुरंत तुम्हारी देह छोड़ देगा.

    तंत्र साधना के हिसाब से मनुष्य को अपनी देह में हड्डिया और मांसपेशिया पिता की दें होती है जबकि खून और मांस माता की, श्राप के तुरंत प्रभाव से भृंगी ऋषि के शरीर से खून और मांस गिर गया. भृंगी निढाल हो जमीं पे गिर पड़े और हालत ये थे की वो खड़े भी होने की स्थिति में नही थे, तब उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने माँ पार्वती से अपनी भूल की क्षमा मांगी.

    हालाँकि तब पार्वती ने अपना श्राप वापस लेना चाहा पर अपराध बोध से भृंगी ने मना कर दिया, पर उन्हें खड़ा रहने के लिए सहारे स्वरुप एक और (तीसरा) पैर प्रदान किया गया जिसके सहारे वो चल और खड़े हो सके. तो भक्त भृंगी के कारण हुआ था अर्धनारीश्वर रूप का उदय.
    ===========================================

    7>क्यों चढ़ाते हैं शिवलिंग पर भस्म?

    शिवजी के पूजन में भस्म अर्पित करने का विशेष महत्व है। बारह ज्योर्तिलिंग में से एक उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन भस्म आरती विशेष रूप से की जाती है। यह प्राचीन परंपरा है। आइए जानते है शिवपुराण के अनुसार शिवलिंग पर भस्म क्यों अर्पित की जाती है…


    शिवजी का रूप है निराला

    भगवान शिव अद्भुत व अविनाशी हैं। भगवान शिव जितने सरल हैं, उतने ही रहस्यमयी भी हैं। भोलेनाथ का रहन-सहन, आवास, गण आदि सभी देवताओं से एकदम अलग हैं। शास्त्रों में एक ओर जहां सभी देवी-देवताओं को सुंदर वस्त्र और आभूषणों से सुसज्जित बताया गया है, वहीं दूसरी ओर भगवान शिव का रूप निराला ही बताया गया है। शिवजी सदैव मृगचर्म (हिरण की खाल) धारण किए रहते हैं और शरीर पर भस्म (राख) लगाए रहते हैं।

    भस्म का रहस्य

    शिवजी का प्रमुख वस्त्र भस्म यानी राख है, क्योंकि उनका पूरा शरीर भस्म से ढंका रहता है। शिवपुराण के अनुसार भस्म सृष्टि का सार है, एक दिन संपूर्ण सृष्टि इसी राख के रूप में परिवर्तित हो जानी है। ऐसा माना जाता है कि चारों युग (त्रेता युग, सत युग, द्वापर युग और कलियुग) के बाद इस सृष्टि का विनाश हो जाता है और पुन: सृष्टि की रचना ब्रह्माजी द्वारा की जाती है। यह क्रिया अनवरत चलती रहती है। इस सृष्टि के सार भस्म यानी राख को शिवजी सदैव धारण किए रहते हैं। इसका यही अर्थ है कि एक दिन यह संपूर्ण सृष्टि शिवजी में विलीन हो जानी है।

    ऐसे तैयार की जाती है भस्म

    शिवपुराण के लिए अनुसार भस्म तैयार करने के लिए कपिला गाय के गोबर से बने कंडे, शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलतास और बेर के वृक्ष की लकडिय़ों को एक साथ जलाया जाता है। इस दौरान उचित मंत्रोच्चार किए जाते हैं। इन चीजों को जलाने पर जो भस्म प्राप्त होती है, उसे कपड़े से छान लिया जाता है। इस प्रकार तैयार की गई भस्म शिवजी को अर्पित की जाती है।

    भस्म से बढ़ता है आकर्षण

    ऐसा माना जाता है कि इस प्रकार तैयार की गई भस्म को यदि कोई इंसान भी धारण करता है तो वह सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त करता है। शिवपुराण के अनुसार ऐसी भस्म धारण करने से व्यक्ति का आकर्षण बढ़ता है, समाज में मान-सम्मान प्राप्त होता है। अत: शिवजी को अर्पित की गई भस्म का तिलक लगाना चाहिए।

    भस्म से होती है शुद्धि

    जिस प्रकार भस्म यानी राख से कई प्रकार की वस्तुएं शुद्ध और साफ की जाती है, ठीक उसी प्रकार यदि हम भी शिवजी को अर्पित की गई भस्म का तिलक लगाएंगे तो अक्षय पुण्य की प्राप्ति होगी और कई जन्मों के पापों से मुक्ति मिल जाएगी।

    भस्म की विशेषता

    भस्म की यह विशेषता होती है कि यह शरीर के रोम छिद्रों को बंद कर देती है। इसे शरीर पर लगाने से गर्मी में गर्मी और सर्दी में सर्दी नहीं लगती। भस्म, त्वचा संबंधी रोगों में भी दवा का काम भी करती है। शिवजी का निवास कैलाश पर्वत पर बताया गया है, जहां का वातावरण एकदम प्रतिकूल है। इस प्रतिकूल वातावरण को अनुकूल बनाने में भस्म महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भस्म धारण करने वाले शिव संदेश देते हैं कि परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल लेना चाहिए। जहां जैसे हालात बनते हैं, हमें भी स्वयं को उसी के अनुरूप बना लेना चाहिए।

    ============================================================
    8>किस बात का शिवजी को हुआ पछतावा कि तोड़ दिया अपना त्रिशूल ?

    त्रिशूल भगवान शिव का अस्त्र माना जाता है। इससे वे भक्तों की रक्षा तथा दुष्टों को दंड देते हैं। भारत में भगवान शिव का एक मंदिर ऐसा भी है जहां उनके खंडित त्रिशूल के टुकड़े जमीन में गड़े हुए हैं। आमतौर पर खंडित मूर्ति और उसके अस्त्रों का पूजन करना निषिद्ध होता है लेकिन यहां भगवान शिव के दर्शन-पूजन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।
    यह मंदिर जम्मू से करीब 120 किमी की दूरी पर स्थित है। इस इलाके में पटनीटाप के पास सुध महादेव (शुद्ध महादेव) विराजमान हैं। यह शिवजी के अत्यंत प्राचीन मंदिरों में से एक है। यहीं उनके त्रिशूल के तीन टुकड़े हैं।
    पास ही मानतलाई नामक स्थान है जिसे पार्वती की जन्मभूमि माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार, मंदिर लगभग 2,800 साल पुराना है। मंदिर में प्राचीन शिवलिंग और शिवपरिवार विराजमान हैं।
    कहा जाता है कि मानतलाई से मां पार्वती भगवान शिव का पूजन करने आती थीं। यहां सुधांत नामक एक राक्षस भी शिवजी का पूजन करने आता था। एक दिन जब देवी पार्वती शिव का ध्यान कर रही थीं तब सुधांत उनसे वार्ता करने के लिए आ गया।
    जब उन्होंने नेत्र खोले तो सामने सुधांत को देखकर घबरा गईं। वे जोर-जोर से चिल्लाने लगीं। तब उनकी आवाज सुनकर शिवजी ने कैलाश पर्वत से त्रिशूल फेंका। त्रिशूल का प्रहार सुधांत की छाती पर हुआ। त्रिशूल फेंकने के बाद शिव को पश्चाताप हुआ क्योंकि सुधांत उनका भक्त था।
    उन्होंने उसे पुनः जीवनदान देने का फैसला किया लेकिन सुधांत शिव के हाथों से ही मोक्ष पाना चाहता था। उसने शिव को विनम्रता से मना कर दिया।
    शिव ने उसका आग्रह स्वीकार कर लिया और यह वरदान दिया कि यह स्थान उसके नाम से प्रसिद्ध होगा। उन्होंने अपने त्रिशूल के तीन टुकड़े कर जमीन में गाड़ दिए। मंदिर के एक स्थान के बारे में कहा जाता है कि वहां सुधांत की अस्थियां रखी हुई हैं।
    त्रिशूल के टुकड़ों पर एक प्राचीन लिपि लिखी हुई है। माना जाता है कि इसे अनेक विद्वानों ने पढ़ने का प्रयास किया लेकिन अभी तक इस लिपि को पढ़ने में सफलता नहीं मिली है।
    ========================================================
    9>क्यों काटा था काल भैरव ने ब्रह्मा जी का पांचवा शीश -
    Kaal Bhairav Story in Hindi :शिव की क्रोधाग्नि का विग्रह रूप कहे जाने वाले कालभैरव का अवतरण मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष की अष्टमी को हुआ। इनकी पूजा से घर में नकारत्मक ऊर्जा, जादू-टोने, भूत-प्रेत आदि का भय नहीं रहता। काल भैरव के प्राकट्य की निम्न कथा स्कंदपुराण के काशी- खंड के 31वें अध्याय में है।
    कथा काल भैरव की
    कथा के अनुसार एक बार देवताओं ने ब्रह्मा और विष्णु जी से बारी-बारी से पूछा कि जगत में सबसे श्रेष्ठ कौन है तो स्वाभाविक ही उन्होंने अपने को श्रेष्ठ बताया। देवताओं ने वेदशास्त्रों से पूछा तो उत्तर आया कि जिनके भीतर चराचर जगत, भूत, भविष्य और वर्तमान समाया हुआ है, अनादि अंनत और अविनाशी तो भगवान रूद्र ही हैं।

    वेद शास्त्रों से शिव के बारे में यह सब सुनकर ब्रह्मा ने अपने पांचवें मुख से शिव के बारे में भला-बुरा कहा। इससे वेद दुखी हुए। इसी समय एक दिव्यज्योति के रूप में भगवान रूद्र प्रकट हुए। ब्रह्मा ने कहा कि हे रूद्र, तुम मेरे ही सिर से पैदा हुए हो।

    अधिक रुदन करने के कारण मैंने ही तुम्हारा नाम ‘रूद्र’ रखा है अतः तुम मेरी सेवा में आ जाओ, ब्रह्मा के इस आचरण पर शिव को भयानक क्रोध आया और उन्होंने भैरव को उत्पन्न करके कहा कि तुम ब्रह्मा पर शासन करो।

    उन दिव्य शक्ति संपन्न भैरव ने अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी अंगुली के नाख़ून से शिव के प्रति अपमान जनक शब्द कहने वाले ब्रह्मा के पांचवे सर को ही काट दिया। शिव के कहने पर भैरव काशी प्रस्थान किये जहां ब्रह्म हत्या से मुक्ति मिली। रूद्र ने इन्हें काशी का कोतवाल नियुक्त किया।

    आज भी ये काशी के कोतवाल के रूप में पूजे जाते हैं। इनका दर्शन किये वगैर विश्वनाथ का दर्शन अधूरा रहता है।

     =====================================================
    10>जब माता पार्वती ने दिया शिव, विष्णु, नारद, कार्तिकेय और रावण को श्राप - 

    Hindi Kahani- Jab Mata Parvti ne diya Shiv, Vishnu, Narad, kartikeya aur Ravan ko shrap : एक बार भगवान शंकर ने माता पार्वती के साथ द्युत (जुआ) खेलने की अभिलाषा प्रकट की। खेल में भगवान शंकर अपना सब कुछ हार गए। हारने के बाद भोलेनाथ अपनी लीला को रचते हुए पत्तो के वस्त्र पहनकर गंगा के तट पर चले गए। कार्तिकेय जी को जब सारी बात पता चली, तो वह माता पार्वती से समस्त वस्तुएँ वापस लेने आए।

    इस बार खेल में पार्वती जी हार गईं तथा कार्तिकेय शंकर जी का सारा सामान लेकर वापस चले गए। अब इधर पार्वती भी चिंतित हो गईं कि सारा सामान भी गया तथा पति भी दूर हो गए। पार्वती जी ने अपनी व्यथा अपने प्रिय पुत्र गणेश को बताई तो मातृ भक्त गणोश जी स्वयं खेल खेलने शंकर भगवान के पास पहुंचे।

    गणेश जी जीत गए तथा लौटकर अपनी जीत का समाचार माता को सुनाया। इस पर पार्वती बोलीं कि उन्हें अपने पिता को साथ लेकर आना चाहिए था। गणेश जी फिर भोलेनाथ की खोज करने निकल पड़े। भोलेनाथ से उनकी भेंट हरिद्वार में हुई। उस समय भोले नाथ भगवान विष्णु व कार्तिकेय के साथ भ्रमण कर रहे थे।

    पार्वती से नाराज भोलेनाथ ने लौटने से मना कर दिया। भोलेनाथ के भक्त रावण ने गणेश जी के वाहन मूषक को बिल्ली का रूप धारण करके डरा दिया। मूषक गणेश जी को छोड़कर भाग गए। इधर भगवान विष्णु ने भोलेनाथ की इच्छा से पासा का रूप धारण कर लिया था। गणेश जी ने माता के उदास होने की बात भोलेनाथ को कह सुनाई।

    इस पर भोलेनाथ बोले,कि हमने नया पासा बनवाया है, अगर तुम्हारी माता पुन: खेल खेलने को सहमत हों, तो मैं वापस चल सकता हूं।

    गणेश जी के आश्वासन पर भोलेनाथ वापस पार्वती के पास पहुंचे तथा खेल खेलने को कहा। इस पर पार्वती हंस पड़ी व बोलीं,अभी पास क्या चीज है, जिससे खेल खेला जाए।
    यह सुनकर भोलेनाथ चुप हो गए। इस पर नारद जी ने अपनी वीणा आदि सामग्री उन्हें दी। इस खेल में भोलेनाथ हर बार जीतने लगे। एक दो पासे फैंकने के बाद गणेश जी समझ गए तथा उन्होंने भगवान विष्णु के पासा रूप धारण करने का रहस्य माता पार्वती को बता दिया। सारी बात सुनकर पार्वती जी को क्रोध आ गया।

    रावण ने माता को समझाने का प्रयास किया, पर उनका क्रोध शांत नहीं हुआ तथा क्रोधवश उन्होंने भोलेनाथ को श्राप दे दिया कि गंगा की धारा का बोझ उनके सिर पर रहेगा। नारद जी को कभी एक स्थान पर न टिकने का अभिषाप मिला। भगवान विष्णु को श्राप दिया कि यही रावण तुम्हारा शत्रु होगा तथा रावण को श्राप दिया कि विष्णु ही तुम्हारा विनाश करेंगे। कार्तिकेय को भी माता पार्वती ने हमेशा बाल रूप में रहने का श्राप दे दिया।-  
    =======================================================================

    3> || পৌরাণিক কাহিনী( 12 to 19 )


     MYTHOLOGICAL STORIES=পৌরাণিক কাহিনী · 


                          
    3>MTL=Post=3***प्रह्लाद नामक असुर***( 1 to 8 )

    12-------------प्रह्लाद नामक असुर=+mtl
    13--------------ब्रह्मा, विष्णु और महेश का पिता कौन, जानिए.... त्रिदेव के पिता=+mtl
    14-------------भगवान विष्णु के लक्ष्मी जी पैर दबाते हुए का क्या अर्थ है?=+mtl
    15-------------भगवान विष्णु ने मारा था शुक्राचार्य की माँ को, बदले की भावना में बने दैत्यगुरु!=+mtl
    16-------------सती ने सतीत्व से भगवान विष्णु को भी बना दिया पत्थर का बूत==mtl
    17-------------तुलसी के दोहो से जुडी महाभारत की अनसुनी कहानिया=+mtl
    18--------------तुलसी के पौधों के बारे में चली आ रही परम्पराओ के ये है वैज्ञानिक कारण!=+mtl
    19-------------भगवान गणेश को क्यों नही चढ़ाई जाती है तुलसी?=+mtl
    ========================================================================

    1>प्रह्लाद नामक असुर


    किसी आदि सत्य युग में प्रह्लाद नामक असुर ने अपने अंतर् गुणों द्वारा इन्द्र से उसका राज्य छीन लिया था। तीनों लोक का राज्य उसके हाथ में आ गया था। इन्द्र ने बृहस्पति जी को कहा हे महाराज कृपया बताइये कि किस वस्तु के द्वारा आनन्द प्राप्त हो सकता है। बृहस्पति जी ने उत्तर दिया कि ज्ञान सबसे बड़ा आनन्द का द्वार है। परन्तु इन्द्र को इससे सन्तोष न हुआ। वह तो प्रह्लाद से अपना त्रिलोकों का राज्य चाहता था। फिर उसने पूछा कि क्या इससे बढ़कर कोई वस्तु है। बृहस्पति ने उत्तर दिया पुत्र इससे भी बढ़ कर है, परन्तु वह तुम्हें शुक्राचार्य जो असुरों के पुरोहित है बतायेंगे।
    इन्द्र उनके पास गया और उनसे भी वही प्रश्न पूछा। शुक्राचार्य ने भी ब्रह्मज्ञान को सर्वश्रेष्ठ बताया। परन्तु इससे भी इन्द्र संतुष्ट न हुए। वह तो ऐश्वर्या चाहता था। इन्द्र ने कहा क्या इससे भी बड़ी कोई चीज है। शुक्राचार्य ने कहा कि हाँ है इसका पता तुम्हें असुरों के राजा से लगेगा।
    इन्द्र एक ब्राह्मण के भेष में प्रह्लाद के पास गया और वही प्रश्न पूछा जो उसने बृहस्पति व शुक्राचार्य से पूछा था। प्रह्लाद ने कहा समय नहीं है क्योंकि सारा समय तीनों लोकों के राज्य करने में व्यतीत हो जाता है, मैं तुम्हें कुछ शिक्षा नहीं दे सकता। ब्राह्मण ने कहा कि वह उनके खाली समय की प्रतीक्षा करेगा और जब वह कहेंगे तभी उनसे शिक्षा लेगा। उसने बहुत समय तक एक आज्ञाकारी शिष्य की तरह उनकी प्रतीक्षा की और जो कुछ प्रह्लाद कहते थे वह बड़ी सावधानी से करता था।
    एक दिन फिर ब्राह्मण ने पूछा कि महाराज किस गुण के कारण आप को तीनों लोकों का राज्य मिला।

    प्रह्लाद ने कहा मुझे अपने राज्य का कण मात्र भी अभिमान नहीं है। परन्तु जो शुक्राचार्य ने कहा है, मैं उसका पालन करता हूँ और उनके अनुसार चलता हूँ। मैंने क्रोध पर विजय प्राप्त कर ली है। मैं माता-पिता, बड़ों की सेवा करता हूँ। मुझे कोई बुराई नहीं है। मैंने अपनी आत्मा पर विजय प्राप्त कर ली। सब इन्द्रियाँ मेरे वश में हैं। गुरु मुझे परामर्श देते हैं। मैं उनके द्वारा अमृत पान करता हूँ। वह शिक्षा जो उनके मुखसे निकलती है मनुष्य को अमर कर देती है। यही वह बुद्धि है जो मनुष्य को बड़ा बनाती है।
    ब्राह्मण ने भक्ति भाव से सब सुना। प्रह्लाद उसकी भक्ति से बड़े प्रसन्न हुए और उससे वर माँगने के लिए कहा।
    ब्राह्मण ने कहा महाराज मुझे दान में अपना “शील” दे दो। प्रह्लाद को ब्राह्मण की इस प्रार्थना पर बड़ा आश्चर्य हुआ। परन्तु अपने प्रण के अनुसार उन्होंने अपना शील उसे दे दिया।अब प्रह्लाद दुविधा में पड़ गये पछतावा तो था पर शील के अर्थ का नहीं पता था

    एक प्रकाशमयी अलौकिक आकृति उनके शरीर से निकली। प्रह्लाद ने पूछा कि तुम कौन हो। उसने कहा कि मैं तुम्हारा शील हूँ। तुमने मुझे छोड़ दिया है। अब मैं ब्राह्मण के शरीर में निवास करूंगा। इतना कहते ही वह आकृति विलीन हो गई। उस आकृति के अन्तर्ध्यान होते ही दूसरी सत्ता उनके सामने आई प्रह्लाद ने पूछा तुम कौन हो। उसने उत्तर दिया : मैं धर्म हूँ। मैं शील के साथ ही निवास करता हूँ। इसलिए मुझे उनका अनुसरण करना है।
    तीसरी आकृति उनके सामने आई। प्रह्लाद ने फिर पूछा कौन हो। उसने कहा मैं सत्य हूँ, मैं धर्म का अनुगामी हूँ। जहाँ धर्म है वही मैं हूँ। उसने भी प्रह्लाद के शरीर का त्याग कर दिया और ब्राह्मण के शरीर में प्रवेश किया। फिर वृत्ति उनके शरीर से प्रकट हुई उसने कहा :जहाँ सत्य है वहीं मैं हूँ। फिर एक आवाज के साथ नई आकृति निकली, उसने कहा मैं आत्म बल हूँ। जहाँ वृत्ति है वहीं मेरा वास है। फिर एक तेजस्वी देवी प्रगट हुई उसने कहा मैं श्री हूँ जहाँ यह सब शक्तियाँ रहती हैं वहीं पर मैं भी वास करती हूँ। हाथ मलते उदास प्रह्लाद ने देवी से पूछा हे देवी यह ब्राह्मण कौन है?

    श्री ने कहा यह ब्राह्मण के रूप में इन्द्र था। उसने चतुरता से तुमसे तीनों लोकों का ऐश्वर्य लूट लिया है। जब आपने अपना शील छोड़ दिया तो इसका अर्थ यह है कि आपने अपना धर्म, सत्य, वृत्ति, आत्म बल सभी कुछ दे दिया क्योकि हम सब का बीज - शील है।
    इसलिए ‘शील’ संस्कार की वृद्धि करनी चाहिए। मनुष्य को विपन्नता में या मुसीबत में भी अपने शील व आत्मिक गुणों संस्कारो का त्याग नहीं करना चाहिए। शील, विद्या, तप, दान, चरित्र, गुण एवं धर्म कर्तव्य से विहीन व्यक्ति पृथ्वी का भार है। वह मानव नहीं, पशु के समान है। मनुष्य के संस्कार ही उसका साथ सदैव देते हैं जन्मो के इस जीवन चक्र में; शेष सब व्यर्थ स्वपन समान है.
    नैतिक सभ्य आचरण, गुणवत्त, आंतरिक संयम, स्वाभाविक रूप से प्रवृत्त, सगुणी प्रकृति व् संस्कारित मनुष्य के बीज गुण, सदाचार व् चरित्रवान आचरण के पालन से चित्त में शान्ति का अनुभव होता है, ऐसे सदाचार को शील कहते हैं. सामान्यतया आचरणमात्र को शील कहते हैं। चाहे वे अच्छे हों, चाहे बुरे, फिर भी रूढ़ि से सदाचार ही शील कहे जाते हैं किन्तु केवल सदाचार का पालन करना ही शील नहीं है, अपितु बुरे आचरण भी शील (दु:शील) हैं अच्छे और बुरे आचरण करने के मूल में जो उन आचरणों को करने को प्रेरणा देने वाली एक प्रकार की भीतरी शक्ति होती है, उसे सु-चेतना कहते हैं। वह चेतना ही वस्तुत: 'शील' है। लोकप्रिय भाषा में इसी शील के भंग होंने से चरित्र भंग होना कहा जाता है. उकसावे के बावजूद जो अपने संयम व् आचरण से अपने को दृढ़ रख सकता हो उसे ही सु-शील व् शील कहा जाता है.
    कोई स्थिति या व्यक्ति उकसाए या हमें लालच दे या भय दिखाए यदि सयंम होगा तो हम उसका मुकाबला कर सकते हैं इस शक्ति को ही शील कहा जाता है. इसी शील गुण को तप से बनाया जाता है और जिसके लिए कई जन्मो के कर्म सम्मिलित होते हैं.

    ==========================
    2>ब्रह्मा, विष्णु और महेश का पिता कौन, जानिए....     त्रिदेव के पिता

    भगवान ब्रह्मा, विष्‍णु और महेश के संबंध और जनम के सम्बन्ध में हिन्दुओ और हिन्दू धर्म मैं भ्रम की स्थिति है। वे उनको ही सर्वोत्तम और स्वयंभू मानते हैं, लेकिन क्या यह सच है? क्या भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश का कोई पिता नहीं है? वेदों में लिखा है कि जो जन्मा या प्रकट है वह ईश्‍वर नहीं हो सकता। ईश्‍वर अजन्मा, अप्रकट, निराकार है।
    हिन्दू ग्रन्थ शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म ही सत्य है वही अविकारी परमेश्‍वर है। जिस समय सृष्टि में अंधकार था। न जल, न अग्नि और न वायु था तब वही तत्सदब्रह्म ही था जिसे श्रुति में सत् कहा गया है। सत् अर्थात अविनाशी परमात्मा।
    उस अविनाशी परब्रह्म काल ने कुछ काल के बाद द्वितीय की इच्छा प्रकट की। और उसके भीतर एक से अनेक होने का संकल्प उदित हुआ। तब उस निराकार परमात्मा ने अपनी लीला शक्ति से आकार की कल्पना की, जो मूर्ति रहित परम ब्रह्म है। परम ब्रह्म अर्थात एकाक्षर ब्रह्म। परम अक्षर ब्रह्म। और वह परम ब्रह्म भगवान सदाशिव है।
    प्राचीन विद्वान और ग्रन्थ उन्हीं को ईश्‍वर कहते हैं। एकांकी रहकर स्वेच्छा से सभी ओर व दिशाओ मैं विहार करने वाले उस सदाशिव ने अपने शरीर से शक्ति की सृष्टि की, जो उनके अपने श्रीअंग से कभी अलग होने वाली नहीं थी। सदाशिव की उस पराशक्ति को प्रधान प्रकृति, गुणवती माया, बुद्धितत्व की जननी तथा विकाररहित बताया गया है।
    वह शक्ति अम्बिका (पार्वती नहीं) कही गई है। उसको प्रकृति, सर्वेश्वरी, त्रिदेवजननी (ब्रह्मा, विष्णु और महेश की माता), नित्या मूल कारण भी कहते हैं। सदा शिव द्वारा प्रकट की गई उस शक्ति की 8 भुजाएं हैं। परा शक्ति जगत जननी वह देवी नाना प्रकार की गतियों से संपन्न है और अनेक प्रकार के अस्त्र शक्ति धारण करती है।

    एकाकिनी होने पर भी माया शक्ति संयोगवशात अनेक हो जाती है। शक्ति की देवी ने ही लक्ष्मी, सावित्री और पार्वती के रूप में जन्म लिया और ब्रह्मा, विष्णु और महेश से विवाह किया था। तीन रूप होकर भी वह अकेली रह गई थी। उस कालरूप सदाशिव की अर्धांगिनी है दुर्गा।

    उस काल रूपी ब्रह्म सदाशिव ने एक समय शक्ति के साथ 'शिवलोक' नामक क्षेत्र का निर्माण किया । उस उत्तम क्षेत्र को 'काशी' कहते हैं। वह आज मोक्ष का स्थान है। यहां शक्ति और शिव अर्थात कालरूपी ब्रह्म सदाशिव और दुर्गा यहां पति और पत्नी के रूप में निवास करते हैं।.

    इस स्थान काशी पुरी को प्रलयकाल में भी शिव और शिवा ने अपने सान्निध्य से कभी मुक्त नहीं किया था। इस आनंदरूप वन में रमण करते हुए एक समय शिव को यह इच्‍छा उत्पन्न हुई ‍कि किसी दूसरे पुरुष की सृष्टि करनी चाहिए, जिस पर सृष्टि निर्माण का कार्यभार रखकर हम निर्वाण धारण करें।

    ऐसा निश्‍चय करके शक्ति सहित परमेश्वररूपी शिव ने अपने वामांग पर अमृत मल दिया। फिर वहां से एक पुरुष प्रकट हुआ। शिव ने उस पुरुष से संबोधित होकर कहा, 'वत्स! व्यापक होने के कारण तुम्हारा नाम 'विष्णु' विख्यात होगा।'
    इस प्रकार विष्णु के माता और पिता कालरूपी सदाशिव और पराशक्ति दुर्गा हैं।

    शिवपुराण के अनुसार ब्रह्माजी अपने पुत्र नारदजी से कहते हैं कि विष्णु को उत्पन्न करने के बाद सदाशिव और शक्ति ने पूर्ववत प्रयत्न करके मुझे (ब्रह्माजी) अपने दाहिने अंग से उत्पन्न किया और तुरंत ही मुझे विष्णु के नाभि कमल में डाल दिया। इस प्रकार उस कमल से पुत्र के रूप में मुझ हिरण्य गर्भ (ब्रह्मा) का जन्म हुआ।

    मैंने (ब्रह्मा) उस कमल के सिवाय दूसरे किसी को अपने शरीर का जनक या पिता नहीं जाना। मैं कौन हूं, कहां से आया हूं, मेरा क्या कार्य है, मैं किसका पुत्र होकर उत्पन्न हुआ हूं किसने इस समय मेरा निर्माण किया है? इस प्रकार में संशय में पड़ा हूं.

    इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र इन देवताओं में गुण हैं और सदाशिव गुणातीत माने गए हैं। एक बार ब्रह्मा विष्‍णु दोनों में सर्वोच्चता को लेकर लड़ाई हो गई, तो बीच में काल रूपी एक स्तंभ आकर खड़ा हो गया। तब दोनों ने पूछा- 'प्रभो, सृष्टि आदि 5 कर्तव्यों के लक्षण क्या हैं? यह हम दोनों को बताइए।'

    ज्योतिर्लिंग रूप काल ने कहा- 'पुत्रो, तुम दोनों ने तपस्या करके मुझसे सृष्टि और स्थिति नामक दो कृत्य प्राप्त किए हैं। इसी प्रकार मेरे विभूतिस्वरूप रुद्र और महेश्वर ने दो अन्य उत्तम कृत्य संहार और तिरोभाव (अकृत्य) मुझसे प्राप्त किए हैं, परंतु अनुग्रह (कृपा करना) नामक दूसरा कोई कृत्य पा नहीं सकता। रुद्र और महेश्वर दोनों ही अपने कृत्य को भूले नहीं हैं इसलिए मैंने उनके लिए अपनी समानता प्रदान की है।'

    सदाशिव कहते हैं- 'ये (रुद्र और महेश) मेरे जैसे ही वाहन रखते हैं, मेरे जैसा वेश धरते हैं और मेरे जैसे ही इनके पास हथियार हैं। वे रूप, वेश, वाहन, आसन और कृत्य में मेरे ही समान हैं।'

    काल रूपी सदाशिव कहते हैं कि मैंने पूर्वकाल में अपने स्वरूपभूत मंत्र का उपदेश किया है, जो ओंकार के रूप में प्रसिद्ध है, क्योंकि सर्व प्रथम मेरे मुख से ओंकार अर्थात 'ॐ' प्रकट हुआ। ओंकार वाचक है, मैं वाच्य हूं और यह मंत्र मेरा स्वरूप ही है और यह मैं ही हूं। प्रति दिन ओंकार का स्मरण करने से मेरा ही सदा स्मरण होता है।

    मेरे पश्चिमी मुख से अकार का, उत्तरवर्ती मुख से उकार का, दक्षिणवर्ती मुख से मकार का, पूर्ववर्ती मुख से विन्दु का तथा मध्यवर्ती मुख से नाद का प्राकट्य हुआ। यह 5 अवयवों से युक्त ओंकार का विस्तार हुआ।

    अब यहां 7 आत्मा हो गईं- ब्रह्म से सदाशिव, सदाशिव से दुर्गा। ‍‍सदा शिव दुर्गा से विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र, महेश्वर। इससे यह सिद्ध हुआ कि ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और महेश के जन्मदाता कालरूपी सदाशिव और दुर्गा हैं। ये बातें अन्य पुराणों में घुमा-फिराकर लिखी गई हैं और इसी कारण भ्रम की उत्पत्ति होती है।


    भ्रम को छोड़कर सभी पुराण और वेदों को पढ़ने की चेष्टा करें तो असल में समझ में आएगा। मनगढ़ंत लोक मान्यता के आधार पर अधिकतर हिन्दू सच को नहीं जानते हैं।
    ====================================================

    3>==भगवान विष्णु के लक्ष्मी जी पैर दबाते हुए का क्या अर्थ है?


    आप ने कभी सोचा नहीं होगा कि भगवान विष्णु के ज्यादातर चित्र में शेषनाग के ऊपर आराम से लेटे और लक्ष्मीमाँ इनके पैर दबा रही है, कभी सोचा है भगवान विष्णु का यह रूप किस ओर का इशारा कर रहा है। इसके पीछे बहुत गहरा और गंभीर संदेश छिपा हुआ है। और इसको अगर हम अपना ले तो हमारा पारिवारिक और सामाजिक जीवन काफी हद तक अच्छा और ख़ुशी से भर जायेगा। आइए समझते हैं कि भगवान विष्णु का चित्र क्या सिखा रहा है?

    सभी को पता है कि इस सृष्टि के तीन प्रमुख भगवान कौन हैं, यह तीन ब्रह्मा, विष्णु और शिव है। ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं, विष्णु इस रचना का संचालन और शिव संहार करते। विष्णु सृष्टि के संचालक है इसलिए हमारी हर जरुरत को पूरा करते हैं, व धर्म को स्थापित भी करते हैं, और धर्म पर अधर्म ज्यादा होने लगता है तो यह अवतार भी लेते हैं। यह क्षीर नामक सागर में रहते हैं, यह सारा संसार भी एक महासागर की तरह है, जिसमें सुख-दु:ख भरपूर है। और ये शेषनाग की शैय्या पर लेटे हुए हैं, गृहस्थी का जीवनकाल भी ऐसा होता है।

    जो अपने घर का मुखिया होता है, उसके ऊपर कई सारी जिम्मेदारियां होती हैं, इसीकारण से शेषनाग के कई फन हैं। और फिर भी भगवान विष्णु का चेहरा मुस्कुराता रहता है, तथा यह सिखाता है कि हम चाहे कितनी ही जिम्मेदारियों से घिरे हुए हों, अपना धर्य कभी भी नहीं खोना चाहिए, मन में शांति बनाई रखनी चाहिए और अपना व्यवहार ऐसा रखो कि परिवार का एक भी सदस्य या व्यक्ति आपसे दूर न रह सके। लक्ष्मी जी भगवान विष्णु के पैरों में है और उनकी सेवा कर रही है।

    यहां पर दो संदेश दिए गए हैं पहला है जो व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों का संचालन कुशलता पूर्वक करता है, और परिवार को प्रेम के बंधन में बांधे रखता है लक्ष्मी सदा ही उसके पैरों की सेवा में लगी हुई है। एवं दूसरा संदेश इसप्रकार समझो कि हमारे जीवन के अंदर परिवार और कर्तव्य का सबसे पहला स्थान है और लक्ष्मी का आखिरी स्थान, तब जाकर प्रेम में कभी लालच या मोह नहीं आएगा।

    ==============================================================

    4>=भगवान विष्णु ने मारा था शुक्राचार्य की माँ को, बदले की भावना में बने दैत्यगुरु!

    शुक्राचार्य का नाम तो सबने सुना ही होगा, इतना सबको पता है की वो दैत्यों और राक्षसो के गुरु थे लेकिन ये कोई नही जानता होगा की वो कौन थे कान्हा से आये थे. आज उनका पूरा कच्चा चिटठा खोल देते है और आपको बताते है उनके ऋषि से दैत्यगुरु होने की कथा.

    नवग्रहों में शुमार शुक्र ही शुक्राचार्य है, शुक्राचार्य ऋषियों में सर्वश्रेष्ठ भृगु ऋषि के पुत्र है भृगुऋषि जिन्हे धरती के सब ऋषियों ने तीनो देवो (ब्रह्मा विष्णु महेश) में कौन सर्वश्रेष्ठ है जांचने की जिम्मेदारी. ऐसे प्रतापित ऋषि का पुत्र होके भी शुक्राचार्य दैत्यों के गुरु कैसे बन गए?

    बाद बहुत पुरानी है भृगु ऋषि की दो पत्निया थी पहली दक्ष की कन्या थी और दूसरी थी ख्याति जिनसे उन्हें पुत्र मिला शुक्राचार्य. शुक्रवार को जन्मे थे भृगु इसलिए उनके नाम पे ही शुक्र का नाम शुक्रवार पड़ा, पिता ने उन्हें ब्रह्मऋषि अंगरीशी के पास शिक्षा के लिए भेजा.

    अंगरीशी ब्रह्मा के मानस पुत्रो में सर्वश्रेष्ठ थे, शुक्राचार्य के साथ उनके पुत्र बृहस्पति (जो बाद में देवो के गुरु बने) भी पढ़ते थे. शुक्राचार्य बृहस्पति की तुलना में काफी होशियार थे, लेकिन फिर भी बृहपति को पुत्र होने के चलते ज्यादा अच्छी तरह से शिक्षा नही मिली

    ईर्ष्यावश वो वंहा से दीक्षा छोड़ के सनक ऋषियों और गौतम ऋषि से शिक्षा लेने लगे. इस दौरान उन्हें प्रेरणा मिली और जब बृहस्पति देवो के गुरु बने तो ईर्ष्या वष वो दैत्यों के गुरु बने. दैत्य देवो से नित हारते थे इसलिए उन्होंने (शुक्राचार्य) शिव को प्रसन्न कर संजीवनी मन्त्र (मरे हुए को जीवित करने का मन्त्र) हेतु तपस्या में बैठ गए.

    लेकिन देवो ने मौके का फायदा उठा के दैत्यों का संघार आरम्भ कर दिया, शुक्राचार्य को तपस्या में जान दैत्य उनकी माता ख्याति की शरण में चले गए. ख्याति ने दैत्यों को शरण दी और जो भी देवता दैत्यों को मारने आता वो उसे मूर्छित कर देती या अपनी शक्ति से लकवाग्रस्त.

    ऐसे में दैत्य बलशाली हो गए और धरती पर पाप बढ़ने लगा, धरती पे धर्म की स्थापना के लिए भगवान विष्णु ने शुक्राचार्य की माँ और भृगु ऋषि की पत्नी ख्याति का सुदर्शन चक्र से सर काट दैत्यों के संघार में देवो की और समूचे जगत की मदद की. इस्पे शुक्राचार्य को बेहद खेद हुआ और वो शिव की तपस्या में और कड़ाई से लग गए.

    आखिर कार उन्होंने संजीवनी मन्त्र पाया और दैत्यों के राज्य को पुनः स्थापित कर अपनी माँ का बदला लिया, तब से शुक्राचार्य का भगवान विष्णु से छत्तीस का आंकड़ा हो गया और वो उनके शत्रु बन गए. भृगु ऋषि ने भगवान विष्णु को इस्पे श्राप दिया की तुम्हे बार बार पृथ्वी में जाके गर्भ में रह कष्ट भोगना पड़ेगा चूँकि उन्होंने एक स्त्री का वध किया.

    उससे पहले भगवान प्रकट हो के ही अवतार लेते थे जैसे की वराह, मतस्य, कुर्मा और नरसिंघ लेकिन उसके बाद उन्होंने परशुराम राम कृष्ण बुद्ध रूप में जन्म लिया तो माँ के पेट में कोख में रहने की पीड़ा झेलनी पड़ी थी. बाद में शुक्राचार्य से बृहस्पति के पुत्र ने संजीवन विधा सिख उनका पतन किया. जय श्री हरी
    ==========================================================

    5>=सती ने सतीत्व से भगवान विष्णु को भी बना दिया पत्थर का बूत


    तुलसी की पुरे भारत भर में पूजा होती है और उन्हें भगवान के भोग में चढ़ाया जाता है पर वो कौन है और उन्हें ये उपमा क्यों मिली जानिए हमारे साथ. तुलसी भगवान शिव और विष्णु की परम भक्त थी एक बार वो गणेश पर मोहित हो गई और उन्होंने उनसे शादी का प्रस्ताव रखा पर गणेश ने ब्रह्मचर्य का हवाला देकर प्रस्ताव ठुकरा दिया तब उन्होंने गणेश को दो शादिया होने का श्राप दिया और गणेश की ऋद्धि सिद्धि से शादी हुई. गणेश ने भी बदले में श्राप दिया की वो राक्षस कुल में जन्म लेगी और राक्षस की माँ बनेगी.

    फलस्वरूप राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था। वृंदा बचपन से ही भगवान विष्णु जी की परम भक्त थी। बड़े ही प्रेम से भगवान की पूजा किया करती थी। जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया,जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था। वृंदा सती स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी।

    एक बार देवो और दानवों में युद्ध हुआ, जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने जीत के लिए अनुष्ठान किया, और जब उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को ना जीत सके सारे देवता जब हारने लगे तो भगवान विष्णु जी के पास गए।

    सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि-वृंदा मेरी परम भक्त है मैं उसके साथ छल नहीं कर सकता पर देवता बोले - भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते हैं। भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा और वृंदा के महल में पहुंच गए जैसे ही सती ने अपने पति को देखा, उन्होंने अनुष्ठान रोक दिया और उनके चरण छू लिए। जैसे ही उनका संकल्प टूटा, युद्ध में देवताओं ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काटकर अलग कर दिया। उनका सिर वृंदा के महल में गिरा जब सती ने देखा कि पति का सिर तो कटा पड़ा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है?

    उन्होंने पूछा - आप कौन हैं जिसका स्पर्श मैंने किया,तब भगवान अपने रूप में आ गए पर वे निरुत्तर थे, वृंदा समझ गई। उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया आप (काले सालिग्राम) पत्थर के हो जाओ,भगवान तुंरत पत्थर के हो गए। सभी देवता हाहाकार करने लगे। लक्ष्मी जी रोने लगीं और प्राथना करने लगीं तब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे सती हो गई। उनके बरते शंखचूड़ भी बाद में शिव के हाथो मारे गए.

    उनकी राख से एक पौधा निकला तब भगवान विष्णु जी ने कहा- आज से इनका नाम तुलसी है,और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जाएगा और मैं बिना तुलसी जी के प्रसाद स्वीकार नहीं करुंगा। तब से तुलसी जी की पूजा सभी करने लगे और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में किया जाता है। देवउठनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है।

    ====================================================
    6>=तुलसी के दोहो से जुडी महाभारत की अनसुनी कहानिया

    तुलसी नर का क्या बड़ा समय बड़ा बलवान, काबा लूटी गोपिया वही अर्जुन वाही बाण" इस दोहे से जुडी कहानी का अनुवाद हम करते है आप के लिए जो एक प्रेरक प्रसंग है.

    महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया था, मथुरा नगरी पर मुस्लिम काल यमन ने हमला कर दिया था. जरासंध वध के बाद सुरक्षित लग रही मथुरा अब फिर खतरे में थी. वरदान पाये हुए काल यमन को कृष्ण बलराम मार नहीं सकते थे इसलिए वो बार बार बड़ी सेना लेके आक्रमण करता था. एक बार कृष्ण युद्ध में घायल हो गए तब अर्जुन ने उनसे मिलाने का फैसला किया. जब अर्जुन रस्ते में थे तो उन्हें नारद मुनि मिले और उन्होंने कहा की, जा रहे हो अर्जुन पर कृष्ण के घावों को छूना मत नहो तो तुम्हारी शक्ति क्षीण हो जाएगी.

    अर्जुन दुविधा में कृष्ण के पास पहुंचा, कृष्ण ने अर्जुन को अपने सिरहाने बैठने बोला पर अर्जुन हिचकिचा रहा था. भगवान ने अर्जुन का संशय समझ लिया और सीधे अर्जुन से कहा की कोई बात नहीं अर्जुन तुम में घाव हाथ से मत चुना पर तुम्हानी कमान से तो इसे छू कर देख ही सकते हो. अर्जुन को बात समझ में आ गई और उसने कृष्णा के घाव देखने के लिए अपनी कमान का इस्तेमाल किया और जायजा लिया. अर्जुन ने गुस्से में युद्ध में उतरने की इच्छा जाहिर की तो कृष्ण ने मना कर दिया, और बताया की कैसे वर प्राप्त कालयमन उसके लिए खतरा हो सकता है.

    कृष्ण ने अर्जुन से कहा की में घायल हूँ और मुझसे मिलने के लिए गोपिया आ रही है, तुम इतना करना की यमनो से उनकी रक्षा करना. अर्जुन ने घमंड में हाँ बोला और दहाड़ा उसे अपने बल पर घमंड हो चूका था. जब अगले दिन गोपिया कृष्ण से मिलने आई तो यमन लुटेरो ने उन्हें लुटने के लिए घेर लिया. अर्जुन तैनात था पर उसके लाख चाहने पर भी वो उनका कुछ ना बिगाड़ सका.

    कमान घावों पर लगाने से वो मन्त्र भूल गया और निशक्त हो गया, लुटेरो ने गोपियों को लूट लिया. अर्जुन शर्मिंदा था, कृष्णा से नजर मिलाने की उसकी हिम्मत नहीं हुई. उसे भी समझ में आ गया की महाभारत के युद्ध में ताकत मेरी नहीं समय की थी. समय ही व्यक्ति को सर्वश्रेष्ठ और कमजोर बनता है. तुलसीदास अंतर्यामी थे इस कारण उन्हें ये कथा मालूम थी जिसपे उन्होंने ये दोहा लिखा जो बहुत सम्मानित हुआ
    ===============================================

    7>=तुलसी के पौधों के बारे में चली आ रही परम्पराओ के ये है वैज्ञानिक कारण!

    तुलसी के पौधे के बारे में ढेरो परम्पराए (मैिथस) चली आ रही है जिन्हे हम सही मान कर आज भी जारी रखे हुए है, जैसे की तुलसी को दांतो से मत चबाओ, रविवार के दिन तुलसी से पूछ के तोड़ो या द्वादशी के दिन तुलसी मत तोड़ो फ्ला फ्ला.. लेकिन क्या असल में इसके कोई मायने है?

    आज बात करेंगे इन्ही परम्पराओ के वैज्ञानिक और परुानिक मान्यताओ पे, जो की साबित करती है की क्या सही है और क्यों है? तुलसी को छूने भर और पास से निकलने तक ई मनाही की भी बात होती है वोभी करेंगे, लेकिन सबसे पहले जान ले की तुलसी कौन है और क्यों है?

    जालंधर असुर को मरने के लिए सती वृंदा की पूजा तोड़नी जरुरी थी जिसके लिए विष्णु जी जालंधर का रूप धार वृंदा के महल में पहुंचे. जैसे ह वृंदा उठी और उन्हें अपना पति समझ प्रणाम किया उसका सतीत्व भंग हुआ और जालंधर का शिव ने वध किया, लेकिन तब सती वृंदा ने विष्णु जी को पत्थर का कर दिया.

    लक्ष्मी जी की विनती के बाद वृंदा ने अपना श्राप वापिस लिया लेकिन तब से विष्णु जी वृंदा के पति के रूप में पत्थर स्वरुप पूजे जाते है, वृंदा सती हुई तो उसकी राख की जगह तुलसी का पौधा उगा जो की आज भी उसी के रूप में और विष्णु पत्नी के रूप में पूजा जाता है, लोग दोनों के विवाह को मान्यता देते है.

    अब बात करें परम्पराओ की तो तुलसी के पते में पारा बहुत ज्यादा मात्र में होता है जिसके दांतो से खाने से आपके दांत जल्दी कमजोर होके, काले भी होके टूट जाने का खतरा पैदा हो जाता है. इसलिए इसे निगला जाता है न की चबाया, वंही इसे इतवार को पूछ के तोड़ने और द्वादशी को न तोड़ने के पीछे भी पौराणिक तथ्य है.
    तुलसी (वृंदा) के बारे में मान्यता है की वो द्वादशी के दिन उपवास रखती थी, इस लिए उस दिन वो भूखे पेट रहती है ऐसे में उसे परेशान न किया जाये ये सोच है जो की पौराणिक है. वंही इतवार के दिन पूछ के तोड़ने के पीछे शायद इसे बचाये जाने की प्रासंगिकता रही होगी.

    महिलाओ के तुलसी न तोड़ने या पास से न गुजरने के पीछे वैज्ञानिक तथ्य है, महिलाओ में मासिकी होने के कारण उनके शरीर में ज्यादा ताप होता है. इसके चलते तुलसी का पौधा सुख कर मुरझा सकता है, इसी कारन महिलाये उस दौरान विशेष कर तुलसी के आसपास भी नही दिखती है.
    तुसली एक आयुर्वेदिक औषधि भी है जो की मधुमेह, सरदर्द, अपचय, किडनी पथरी, त्वचा के रोगो, एंटी डैंड्रफ और एंटी कैंसर भी होतीं है. तो आज ही अगर नही है तो घर में लगाये तुलसी का पौधा और गिनते जाइये इसके फायदे...
    ===================================

    8>=भगवान गणेश को क्यों नही चढ़ाई जाती है तुलसी?

    भगवान गणेश को उनके पिता महादेव ने अपने ही पुत्र की हत्या के एवज में प्रथम पूजनीय होने का वरदान मिला था, हालाँकि गनेश वध के पीछे एक असुर को मारने का प्रयोजन भी था. तब से उनकी सबसे पहले पूजा होती है बाकि की बाद में लेकिन गणेश को भोग लगते समय उसपे तुलसी नही छढती है जबकि बाकि देवो में तुलसी के बिना भोग नही लगता है.

    आप हमेशा से ही इस परंपरा को निभाते आये होंगे या अपने अपने बड़ो को ऐसा करते देखा होगा लेकिन कभी आपने उनसे इसका कारण न पूछा होगा. आज के बाद आप उनसे ये कारण पूछे शायद उन्हें भी न मालूम हो लेकिन आज से आपको पता हो जायेगा.

    भगवान गणेश बालब्रह्मचारी थे और उनका शादी का कोई इरादा नही था लेकिन एक दिन वृंदा नाम की एक दक्ष कन्या ने उन्हें देखा और उनपे मोहित हो गई. लगे हाथो ही उसने गणेश जी से विवाह की इच्छा जता दी जिसे गणेश ने अपने ब्रह्मचारी होने के चलते सिरे से ख़ारिज कर दिया, इस पर वृंदा ने गणेश को एक नहीं बल्कि दो शादिया होने का श्राप दे डाला.

    लेकिन तब गणेश ने भी उसके ऐसे श्राप पर वृंदा को श्राप दिया की उसकी शादी एक असुर से होगी, तब गणेश की शादी ऋद्धि सिद्दी से हुई और वृंदा की शादी जालंधर नाम के असुर से. जालंधर को मारने के लिए विष्णु ने जी जालंधर का रूप धरा और वृंदा का सतीत्व भंग किया.

    तब वृन्दा अपने पति के साथ सती हो गई और उसकी चिता के स्थान पर तुलसी के पौधे उगे जिनसे विष्णु के पत्थर रूपी रूप शालिग्राम का विवाह किया जाता है. तब से वृंदा तुलसी हो गई और वृंदा और गणेश जी के बीच में वैर होने से तुलसी गणेश जी को अर्पित नही होती है ऐसा करने से लम्बोदर रुष्ट हो सकते है.

    रुष्ट इसलिए क्योंकि वो तुलसी ही थी जिसने गणेश के ब्रह्मचर्य का व्रत टूटने के लिए श्राप दिया था, श्रीगणेश को दूर्वा यानि घास चढ़ाई जाती है जो की उन्हें एक बूटी के रूप दुर्वासा ने दी थी

    =========================================================
      

    Thursday, March 10, 2016

    2> || পৌরাণিক কাহিনী ( 1 to 11 )

     MYTHOLOGICAL STORIES=পৌরাণিক কাহিনী · 

                      
    2>MTL=Post=2***महालक्ष्मीबेलवृक्ष***( 1 to 11 )

    1------------ महालक्ष्मी ने क्यों धरा बेलवृक्ष का रूप?=+mtl
    2-------------धनतेरस से जुडी है एक पौराणिक कलेजा भर आने वाली कहानी!=+mtl
    3------------ বিষ্ণুর মৎস্য অবতার=+mtl
    4-------------पंच कन्याए जिनके स्मरण मात्र से महापातक नष्ट हो जाते है=+mtl
    5------------ उसका नाम शैब्या =एक पतिव्रता ब्राह्मणी=+mtl
    6-------------सावित्री सत्यवान कथा (Savitri Satyavan katha)=+mtl

    7-------------सती अनुसुइया की कहानी (Sati Anasuya Story)=+mtl
    8>-----------तुलसी और शालिग्राम विवाह की कथा
    9>------------लक्ष्मी कहाँ रहती हैं?

    10>क्यों नहीं लेना चाहते थे शुकदेवजी जन्म, क्या हुआ उनके जन्म के बाद?
    11>इस कहानी से समझे जीवन का सही अर्थ...


    ========================================================================

    1> महालक्ष्मी ने क्यों धरा बेलवृक्ष का रूप ?

    शिव ने क्यों माना बिल्ववृक्ष को शिवस्वरूप।

    नारदजी ने एक बार भोलेनाथ की स्तुति कर पूछा – प्रभु आपको प्रसन्न करने के लिए सबसे उत्तम और सुलभ साधन क्या है. हे त्रिलोकीनाथ आप तो निर्विकार और निष्काम हैं, आप सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं. फिर भी मेरी जानने की इच्छा है कि आपको क्या प्रिय है?

    शिवजी बोले-

    नारदजी वैसे तो मुझे भक्त के भाव सबसे प्रिय हैं, फिर भी आपने पूछा है तो बताता हूं.
    मुझे जल के साथ-साथ बिल्वपत्र बहुत प्रिय है. जो अखंड बिल्वपत्र मुझे श्रद्धा से अर्पित करते हैं मैं उन्हें अपने लोक में स्थान देता हूं.

    नारदजी भगवान शंकर औऱ माता पार्वती की वंदना कर अपने लोक को चले गए. उनके जाने के पश्चात पार्वतीजी ने शिवजी से पूछा- हे प्रभु मेरी यह जानने की बड़ी उत्कट इच्छा हो रही है कि आपको बेलपत्र इतने प्रिय क्यों है. कृपा करके मेरी जिज्ञासा शांत करें.

    शिवजी बोले-

     हे शिवे! बिल्व के पत्ते मेरी जटा के समान हैं. उसका त्रिपत्र यानी तीन पत्ते, ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद हैं. शाखाएं समस्त शास्त्र का स्वरूप हैं. बिल्ववृक्ष को आप पृथ्वी का कल्पवृक्ष समझें जो ब्रह्मा-विष्णु-शिवस्वरूप है.

    हे पार्वती! स्वयं महालक्ष्मी ने शैल पर्वत पर बिल्ववृक्ष रूप में जन्म लिया था इस कारण भी बेल का वृक्ष मेरे लिए अतिप्रिय है. महालक्ष्मी ने बिल्व का रूप धरा, यह सुनकर पार्वतीजी कौतूहल में पड़ गईं.

    पार्वतीजी कौतूहल से उपजी जिज्ञासा को रोक न पाई. उन्होंने पूछा- देवी लक्ष्मी ने आखिर बिल्ववृक्ष का रूप क्यों लिया? आप यह कथा विस्तार से कहें.
    भोलेनाथ ने देवी पार्वती को कथा सुनानी शुरू की. हे देवी, सत्ययुग में ज्योतिरूप में मेरे अंश का रामेश्वर लिंग था. ब्रह्मा आदि देवों ने उसका विधिवत पूजन-अर्चन किया था.
    इसका परिणाम यह हुआ कि मेरे अनुग्रह से वाणी देवी सबकी प्रिया हो गईं. वह भगवान विष्णु को सतत प्रिय हो गईं.
    मेरे प्रभाव से भगवान केशव के मन में वाग्देवी के लिए जितनी प्रीति उपजी हुई वह स्वयं लक्ष्मी को नहीं भाई.
    लक्ष्मी देवी का श्रीहरि के प्रति मन में कुछ दुराव पैदा हो गया. वह चिंतित और रूष्ट होकर चुपचाप परम उत्तम श्रीशैल पर्वत पर चली गईं.
    वहां उन्होंने तप करने का निर्णय किया और उत्तम स्थान का चयन करने लगीं.
    महालक्ष्मी ने उत्तम स्थान का निश्चय करके मेरे लिंग विग्रह की उग्र तपस्या प्रारम्भ कर दी. उनकी तपस्या कठोरतम होती जा रही थी.
    हे परमेश्वरी कुछ समय बाद महालक्ष्मी जी ने मेरे लिंग विग्रह से थोड़ा उर्ध्व में एक वृक्ष का रूप धारण कर लिया. अपने पत्तों और पुष्प द्वारा निरंतर मेरा पूजन करने लगीं.
    इस तरह महालक्ष्मी ने कोटि वर्ष ( एक करोड़ वर्ष) तक घोर आराधना की. अंततः उन्हें मेरा अनुग्रह प्राप्त हुआ.
    मैं वहां प्रकट हुआ और देवी से इस घोर तप की आकांक्षा पूछकर वरदान देने को तैयार हुआ.
    महालक्ष्मी ने मांगा कि श्रीहरि के हृदय में मेरे प्रभाव से वाग्देवी के लिए जो स्नेह हुआ है वह समाप्त हो जाए.

    शिवजी बोले-
     मैंने महालक्ष्मी को समझाया कि श्रीहरि के हृदय में आपके अतिरिक्त किसी और के लिए कोई प्रेम नहीं है. वाग्देवी के प्रति उनका प्रेम नहीं अपितु श्रद्धा है.
    यह सुनकर लक्ष्मीजी प्रसन्न हो गईं और पुनः श्रीविष्णु के ह्रदय में स्थित होकर निरंतर उनके साथ विहार करने लगी.
    हे पार्वती! महालक्ष्मी के हृदय का एक बड़ा विकार इस प्रकार दूर हुआ था. इस कारण हरिप्रिया उसी वृक्षरूपं में सर्वदा अतिशय भक्ति से भरकर यत्नपूर्वक मेरी पूजा करने लगी.
    हे पार्वती इसी कारण बिल्व का वृक्ष, उसके पत्ते, फलफूल आदि मुझे बहुत प्रिय है. मैं निर्जन स्थान में बिल्ववृक्ष का आश्रय लेकर रहता हूं.
    बिल्ववृक्ष को सदा सर्वतीर्थमय एवं सर्वदेवमय मानना चाहिए. इसमें तनिक भी संदेह नहीं है. बिल्वपत्र, बिल्वफूल, बिल्ववृक्ष अथवा बिल्वकाष्ठ के चन्दन से जो मेरा पूजन करता है वह भक्त मेरा प्रिय है.
    बिल्ववृक्ष को शिव के समान ही समझो. वह मेरा शरीर है. जो विल्व पर चंदन से मेरा नाम अंकित करके मुझे अर्पण करता है मैं उसे सभी पापों से मुक्त करके अपने लोक में स्थान देता हूं.
    हे देवी उस व्यक्ति को स्वयं लक्ष्मीजी भी नमस्कार करती हैं जो विल्व से मेरा पूजन करते हैं. जो बीलवमुल में प्राण छोड़ता है उसको रूद्र देह प्राप्त होता है.
    मेरी पूजा के लिए बेल के उत्तम पत्तों का ही प्रयोग करना चाहिए
    ============================.
    2>धनतेरस से जुडी है एक पौराणिक कलेजा भर आने वाली कहानी!

    वाली से ठीक दो दिन पहले यानि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है धनतेरस का त्यौहार, इस दिन सोने चांदी की खूब खरीदारी होती है और रात में दिन दान द्वारा धन्वन्तरि की पूजा होती है. लेकिन इस दिन के पीछे की छुपी कहानी जान आप बच सकते है असमय/अकाल मृतरयु से. एक बार यमराज ने अपने गणो से पूछा की तुम लोग मेरे कहने पर जीवो के प्राण हरने का काम करते हो क्या तुम्हे कभी इसमें कुछ अजीब नही लगा या तुम्हे तरस नही आया. इस्पे सब गणो ने अपनी कर्तव्य निष्ठां जताई लेकिन जब यमराज ने पुनः पूछा की संकोच न करो मुझे बताओ तो एक गण ने बताया की महाराज एक बार ऐसा हुआ था की हमारा भी कलेजा भर आया था.
    राजा हिमा को पुत्र हुआ तो आनंद उत्सव हुआ लेकिन जन्म कुंडली के हिसाब से उसकी मृत्यु शादी के चार दिन बाद ही निश्चित थी, इस कारन राजा उसे एक जंगल में यमुना नदी के किनारे एक गुफा में रख आया. लेकिन होनी को कौन टाल सकता था, हंस राजा की बेटी वंहा से वन विहार करती गुजरी और राजकुमार को देख रीझ गई और गन्धर्व विवाह कर लिया.

    दोनों की जोड़ी कामदेव और रति सरीखी थी दोनों में अटूट प्रेम था लेकिन जब चौथे दिन हम राजकुमार के प्राण हरने गए तो हमारा कलेजा पसीज गया. यमराज में सुन द्रवित हो गए लेकिन विधि के विधान को कौन टाल सकता है तब एक यम ने पूछा की प्रभु ऐसी अकाल मृत्यु को टाला नही जा सकता है क्या?
    इस पर यमराज ने कहा की धन तेरस के दिन दिन दान और विधि पूर्वक पूजन होता है धन धन्य को खुला रखा जाता है और रात भर तेल के दिए जलाये जाते है उन मनुष्यो की कभी भी अकाल मृत्यु नही होती है.

    ====================================================
    3> বিষ্ণুর মৎস্য অবতার

    হিন্দু পুরাণে বিষ্ণুর প্রথম অবতার। মৎস্যের উর্ধ্বশরীর চতুর্ভূজ বিষ্ণুর এবং নিম্নাঙ্গ একটি মাছের।
    মৎস্য পুরাণ অনুসারে, প্রাগৈতিহাসিক দ্রাবিড় রাজ্যের বিষ্ণুভক্ত রাজা সত্যব্রত (যিনি পরে মনু নামে পরিচিত হন) একদিন নদীর জলে হাত ধুচ্ছিলেন। এমন সময় একটি ছোটো মাছ তাঁর হাতে চলে আসে এবং তাঁর কাছে প্রাণভিক্ষা চায়। তিনি মাছটিকে একটি পাত্রে রাখেন। কিন্তু মাছটি ক্রমশ বৃদ্ধিপ্রাপ্ত হতে থাকে। তিনি সেটিকে প্রথমে একটি পুষ্করিণীতে, পরে নদীতে এবং শেষে সমুদ্রে ছেড়ে দেন। কিন্তু কোনো ফল হয় না। সেটি এতটাই বৃদ্ধি পায় যে সকল আধারই পূর্ণ হয়ে যায়। শেষে মাছটি বিষ্ণুর রূপে আত্মপ্রকাশ করে সত্যব্রতকে জানান যে সাত দিনের মধ্যে প্রলয় সংঘটিত হবে এবং সকল জীবের বিনাশ ঘটবে। তাই সত্যব্রতকে নির্দেশ দেওয়া হয় যে সকল প্রকার ঔষধি, সকল প্রকার বীজ, সপ্তর্ষি, বাসুকি নাগ ও অন্যান্য প্রাণীদের সঙ্গে নিতে।
    প্রলয় সংঘটিত হলে মৎস্যরূপী বিষ্ণু পূর্বপ্রতিশ্রুতি অনুসারে পুনরায় আবির্ভূত হন। তিনি সত্যব্রতকে একটি নৌকায় আরোহণ করতে বলেন এবং তাঁর শিঙে বাসুকি নাগকে নৌকার কাছি হিসেবে বাঁধতে বলেন।
    =================================================
     4> पंच कन्याए

               पंच कन्याए जिनके स्मरण मात्र से महापातक नष्ट हो जाते है

    किसी पवित्र उद्देश्य या भावना से किया गया तप, त्याग या संयम ही व्रत-उपवास के रूप में प्रचलित है.संकलप का ही दूसरा नाम व्रत है. पतिव्रत या पत्नीव्रत का पालन करना तमाम व्रत-उपवासों में सर्वोच्च स्तर के माने जाते हैं.ज्ञात और अज्ञात रूप से दुनिया में एसी अनेक स्त्रियां हो चुकी हैं, जिन्होंने पतिव्रता धर्म का पालन किया है.

    "अहिल्या द्रौपदी सीता तारा मंदोदरी तथा
    पंचकन्या ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशनम्"

    गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या, पांडवों की पत्नी द्रौपदी, प्रभु रामचंद्र की पत्नी सीता, राजा हरिश्चंद्र की पत्नी तारामती व रावण की पत्नी मंदोदरी, इन पांच कन्याओ का जो स्मरण करता है, उसके महापातक नष्ट होते हैं.

    1. अहिल्या - ऋषि गौतम कि पत्नी जिन्हें गौतम ऋषि ने पत्थर बन जाने का श्राप दिया,और भगवान श्री राम ने            अपने चरण के स्पर्श से उन्हें फिर से नारी बना दिया था.

    2. द्रौपदी - राजा द्रुपद की पुत्री तथा पांच पांडवों की पत्नी द्रौपदी को सती के साथ ही पंच कुवांरी कन्याओं में भी        शामिल किया जाता है.

    3. सीता - भगवान श्री रामचंद्र जी की पत्नी सीता,जब प्रभु श्री राम को वनवास हुआ तो वनवासी वस्त्र धारण करके     अपने पति श्री राम के साथ महलों के सब सुख त्यागकर १४ वर्ष वन में रही.

    4. मंदोदरी - मंदोदरी लंकापति रावण की पत्नी थी.हेमा नाम की अप्सरा के गर्भ से मंदोदरी ने जन्म लिया तथा           रावण की प्रधान पटरानी बनी.मंदोदरी ही इन्द्रजीत मेघनाद की माता तथा मयासुर की कन्या थी.रावण को            सदा अच्छी सलाह देती थी.पंच सती में शामिल होने के साथ-साथ इनकी गणना भी पंचकन्याओं में की
         जाती है.

    5. तारामती - सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की पत्नी तारामति,जब राजा हरिश्चन्द्र ने अपना राज्य विश्वामित्र जी को
         दिया तो राजा कंगालो की भांति राज्य से चले गए और अपना दिया हुआ वचन पूरा करने के लिए अपनी
         पत्नी और बेटे को भी बेच दिया.

           पंच महान सती

    इसी तरह "पंच सती" भी है.जिन्हें हिन्दुओं के धार्मिक इतिहास में जिन पांच स्त्रियों को पतिव्रता धर्म का पालन करने वाली सती माना गया है, वे निम्र प्रकार हैं:- अनुसूया, द्रोपदी, सुलक्षणा, सावित्री , मंदोदरी

    1. अनुसूया - पतिव्रता स्त्रियों में अनुसूया का स्थान सबसे ऊँचा है. वे अत्रि-ऋषि की पत्नी थीं. जब सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा में यह विवाद छिड़ा कि सर्वश्रेष्ठ पतिव्रता कौन है? अंत में यही निष्कर्ष निकला कि अत्रि पत्नी अनुसूया ही सर्वश्रेष्ठ पतिव्रता हैं. अनुसूया के सतीत्व की परीक्षा लेने के लिये त्रिदेव अनुसूया के आश्रम में ब्राह्मण बनकर भिक्षा मांगने पंहुचे.त्रिदेव ने अनुसूया से कहा कि जब आप अपने संपूर्ण वस्त्र उतार देंगी तभी हम भिक्षा स्वीकार करेंगे. तब अनुसूया ने अपने सतीत्व के बल पर उक्त तीनों देवों को अबोध बालक बनाकर उन्हें भिक्षा दी. उल्लैख मिलता है कि अनुसूया ने ही सीता को पतिव्रत की शिक्षा दी थी.

    2. द्रौपदी - राजा द्रुपद की पुत्री तथा पांच पांडवों की पत्नी द्रौपदी को सती के साथ ही पंच कन्याओं में भी शामिल किया जाता है.

    3. सुलक्षणा - रावण के परम तेजस्वी पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) की पत्नी सुलक्षणा को पंच सती में गिना जाता है.

    4. सावित्री - ये ऋषि अश्वपति की पुत्री थीं. इनके पति का नाम सत्यवान था. जब सावित्री के पति सत्यवान की असमय ही मृत्यु हो गई तो सावित्री ने अपनी तपस्या के बल पर सत्यवान को पुनर्जीवित कर लिया. सावित्री के इसी तपोबल के कारण इन्हैं पंच सती में शामिल किया गया है.

    5. मंदोदरी - मंदोदरी लंकापति रावण की पत्नी थी. हेमा नाम की अप्सरा के गर्भ से मंदोदरी ने जन्म लिया तथा रावण की प्रधान पटरानी बनी. मंदोदरी ही इन्द्रजीत मेघनाद की माता तथा मयासुर की कन्या थी. रावण को सदा अच्छी सलाह देती थी.पंच सती में शामिल होने के साथ-साथ इनकी गणना भी पंचकन्याओं में की जाती है.

                                              !! जय जय श्री राधाकृष्ण !!

                                  जय गोविंदा जय गोपाला, जय जय श्री राधेकृष्णा !!
                              मुरली मनोहर, कृष्ण कन्हैया ! सब बोलो जय श्री राधेकृष्णा !!

     जीवन में परम सुख़, आनन्द, प्रेम, करुणा और कल्याण के लिये सदैव जपते रहिये !! समस्त मंत्रो का मूलः
       और सभी शास्त्रो और ग्रंथो का सार

                                         हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे !
                                          हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे !
    ========================================================
    5> उसका नाम शैब्या =एक पतिव्रता ब्राह्मणी

    प्राचीन काल की बात है , मध्य देश में अत्यंत शोभायमान नगरी थी !
    उसमे एक पतिव्रता ब्राह्मणी रहती थी , उसका नाम शैब्या था !
    उसका पति पूर्व जन्म के पाप से कोढ़ी हो गया था !
    उसके शरीर में अनेको घाव हो गए थे जो बराबर बहते रहते थे !

    शैब्या अपने पति की सेवा में निरंतर लगी रहती थी , उसके पति के मन में जो भी आता उसे यथा शक्ति पूर्ण करने का प्रयास करने में सलग्न रहती थी और प्रतिदिन देवता की भांति स्नेह से दोष बुद्धि त्याग कर पूजा करती थी !

    एक दिन उसके पति ने सड़क से जाती हुई एक परम सुंदरी वैश्या को देखा , उस पर द्रष्टि पड़ते ही वह अत्यंत मोह के वशीभूत हो गया !

    उसकी चेतना पर कामदेव ने अधिकार कर लिया और तेज साँस लेता हुआ उदास हो गया , पत्नी आई और पूछा स्वामी क्या हुआ बताए ....मै यथा संभव पूरा करने का प्रयास करुँगी , एक मात्र आप ही मेरे गुरु व् प्रियतम है !

    पत्नी के इस प्रकार पूछने पर उसने कहा : प्रिये , उस कार्य को न तुम पूर्ण कर सकती हो न मै ....अतः व्यर्थ की बात करना उचित नहीं !

    पतिव्रता बोली : नाथ मै आपका मनोरथ जानकर विश्वास के साथ उसे सिद्ध कर दूंगी आप आज्ञा दीजिए!

    कोढ़ी ने कहा : साध्वी ...अभी अभी यहाँ से एक परम सुन्दरी वैश्या जा रही थी जो की बड़ी नवयोवना दिख रही थी तथा उसका शरीर सब और से बड़ा मनोरम था , उसे देखने के बाद मेरा मन कामाग्नि से दग्ध हो रहा है यदि तुम्हारी और से उस नवयौवना को प्राप्त कर संकू तो जीवन सफल हो जाए !

    प्रभो ! आप धेर्य रखिए मै यथा संभव प्रयास अवश्य करुँगी !

    यह कह कर पतिव्रता ने मन ही मन कुछ विचार किया और रात्रि के अंतिम भाग में वह गोबर और झाड़ू लेकर वैश्या के घर गयी और उसके उठने से पहले उसके यहाँ झाड़ू लगाकर गोबर से उसका आँगन लिप दिया और तुरंत घर को लौट आई ...ऐसा उसने तिन दिन तक किया !

    उधर वैश्या ने अपनी दसियों से पूछा की यह नित्य हमारा आँगन कोन साफ करता है तो उन्होंने कहा हमें नहीं ज्ञात !

    .....तब एक दिन उसने रात्रि के अंतिम पहर में किसी की आहट सुनी और देखा ....तो उसकी नजरे ब्राह्मणी पर पड़ी.....

    तो उसने कहा : हाय हाय आप क्या करती है ...रहने दीजिए और वैश्या ने उसके पांव पकड़ लिए और पुनः कहा : पतिव्रते !

    आप मेरी आयु , शरीर , संपत्ति , यश , तथा कीर्ति का विनाश करने की चेष्टा क्यों कर रही है ...साध्वी आप जो मांगोगी वह मै सहर्ष दे दूंगी , यह बात मै दृढ निश्चय से कह रही हूँ !

    पतिव्रता ने वैश्या से कहा : मुझे धन आदि की नही अपितु तुम्हारी आवश्यकता है करो तो बताऊ !

    वैश्या बोली : जी निश्चित ही पूर्ण करुँगी आपका कार्य बताए !

    पतिव्रता लजाते लजाते वह कार्य जो उसके पति को प्रिय था कह सुनाया !

    दुर्गन्धयुक्त मनुष्य के साथ संसर्ग का विचार करके उसे बड़ा मन में दुःख हुआ तब भी वह पतिव्रता से बोली .....यदि आप उन्हें यहाँ लें आये तो मै उनका मनोरथ पूर्ण कर दूंगी !

    पतिव्रता ने कहा : ठीक है रात्रि में मै उन्हें ले आउंगी ! और घर पहुँच कर उसने पति को सारी बात बता दी .......वह बोला मै तो चलने अक्षम हूँ ....वह बोली मै आपको पीठ पर उठाकर ले चलूंगी !

    कोढ़ी बोला : देवी जो काम तुमने किया है वह अन्य के लिए अति दुष्कर है !

    उसी नगर में किसी धनि के घर चोरो ने डाका डाला जब यह बात राजा को पता चली तो उन्होंने चोर पकड़ने का सैनिको को आदेश दिया ....सैनिको ने जंगल में एक तपस्वी “ माण्डव्य ऋषि जो की तपस्या में लींन थे उन्हें यह समझके की यह अभिमय कर रहा है चोर समझ के पकडके राजा के सामने लाए राजा ने कहा जो दण्ड चोर का वह इसे दी जाए ........!

    “ मांडव्य ऋषि को नगर के बिच में गड़े एक शूल पर रख दिया ...वह शूल उनके गुदा द्वार से होता हुआ मस्तिष्क के पार हो गया .....इसी बिच वह साध्वी अपने पति को पीठ पर उठा कर वैश्या के यहाँ चली जा रही थी कि उसके पति का शरीर ऋषि से छू गया और उनकी समाधी टूट गयी !

    माण्डव्य ऋषि कुपित होकर बोले : “ जिसने इस समय मुझे गाढ़ वेदना का अनुभव करानेवली अवस्था में पहुचाया , वह सूर्योदय होते ही भस्म हो जाए !”

    माण्डव्य के इतना कहते ही वह कोढ़ी जमीन पर गिर गया !

    यह देख पतिव्रता बोली “ आज से तिन दिनों तक सूर्य का उदय ही ना हो ! और पति को घर लाकर शय्या पर सुलाकर उसका हाथ पकड़े बैठे रही !

    इस प्रकार सूर्य का उदय ही न हुआ ...त्रिलोकी व्यथित हो उठी , सारे देवता इन्द्र को आगे कर ब्रह्मा जी के पास गए और ब्राह्मणी और माण्डव्य ऋषि का वृतांत बताया !!

    तब ब्रह्मा जी देवताओ सहित कई विमानों से उस कोढ़ी के घर पहुचे उनके विमानों की कांति सेकड़ो सूर्य की भांति थी ....!

    ब्रह्माजी ने कहा : माता सम्पूर्ण देवताओ, ब्राह्मणों,गौ,आदि प्राणियों की म्रत्यु होने की सम्भावना है .....ऐसा कार्य आपको क्यों पसंद आया .....? सूर्योदय के प्रति जो तुम्हारा क्रोध है उसे त्याग दो !

    पतिव्रता बोली : एक मात्र पति ही मेरे गुरु है ! इनसे बढ़कर सम्पूर्ण लोको में कोई नही ! सूर्योदय होते ही मुनि के शाप से इनकी म्रत्यु हो जाएगी इस हेतु मैंने सूर्य को शाप दिया है ! ना कि लोभ , क्रोध , मोह , मात्सर्य अथवा काम के वश होकर दिया है !

    ब्रह्माजी बोले : माता ! एक की म्रत्यु से तीनो लोको का हित हो रहा है , ऐसी दशा में तुम्हे बहुत पुन्य होगा !

    पतिव्रता बोली : पति का त्याग करके आपका कल्याणमय सत्यलोक भी अच्छा नहीं लगता !

    ब्रह्माजी ने कहा : सूर्योदय होने पर जब सारी त्रिलोकी स्वास्थ्य हो जाएगी तब तुम्हारे पति के भस्म हो जाने पर भी मै तुम्हारा कल्याण – साधन करूँगा , हमलोगों के आशीर्वाद से यह कोढ़ी ब्राह्मण कामदेव के समान सुन्दर हो जाएगा !

    ब्रह्माजी के यो कहने पर क्षण भर विचार करके उसने हाँ कहकर स्वीकृति दे दी !

    फिर तो तत्काल सूर्योदय हुआ और कोढ़ी राख का ढेर हो गया और पुनः राख से कामदेव के सामान सुन्दर रूप धारण कर ब्राह्मण प्रकट हुआ !

    सभी प्रसन्न हुए स्वर्ग से सूर्य के सामान तेजस्वी विमान आया उसमे दोनों सवार हो देवताओ के साथ चले गए !!
    ================================================
    6>सावित्री सत्यवान कथा (Savitri Satyavan katha)

    Savitri Satyavan Hindi Story : महाभारत एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमे अनेकों पौराणिक, धार्मिक कथा-कहानियों का संग्रह है। ऐसी ही एक कहानी है सावित्री और सत्यवान की, जिसका सर्वप्रथम वर्णन महाभारत के वनपर्व में मिलता है। जब वन में गए युधिष्ठर, मार्कण्डेय मुनि से पूछते है की क्या कोई अन्य नारी भी द्रोपदी की जैसे पतिव्रता हुई है जो पैदा तो राजकुल में हुई है पर पतिव्रत धर्म निभाने के लिए जंगल-जंगल भटक रही है। तब मार्कण्डेय मुनि, युधिष्ठर को कहते है की पहले भी सावित्री नाम की एक नारी इससे भी कठिन पतिव्रत धर्म का पालन कर चुकी है और मुनि, युधिष्ठर को यह कथा सुनाते है।

    मद्रदेश के अश्वपतिनाम का एक बड़ा ही धार्मिक राजा था। जिसकी पुत्री का नाम सावित्री था। सावित्री जब विवाह योग्य हो गई। तब महाराज उसके विवाह के लिए बहुत चिंतित थे। उन्होंने सावित्री से कहा बेटी अब तू विवाह के योग्य हो गयी है। इसलिए स्वयं ही अपने योग्य वर चुनकर उससे विवाह कर लें। धर्मशास्त्र में ऐसी आज्ञा है कि विवाह योग्य हो जाने पर जो पिता कन्यादान नहीं करता, वह पिता निंदनीय है। ऋतुकाल में जो स्त्री से समागम नहीं करता वह पति निंदा का पात्र है। पति के मर जाने पर उस विधवा माता का जो पालन नहीं करता । वह पुत्र निंदनीय है।

    तब सावित्री शीघ्र ही वर की खोज करने के लिए चल दी। वह राजर्षियों के रमणीय तपोवन में गई। कुछ दिन तक वह वर की तलाश में घुमती रही। एक दिन मद्रराज अश्वपति अपनी सभा में बैठे हुए देवर्षि बातें कर रहे थे। उसी समय मंत्रियों के सहित सावित्री समस्त वापस लौटी। तब राजा की सभा में नारदजी भी उपस्थित थे। नारदजी ने जब राजकुमारी के बारे में राजा से पूछा तो राजा ने कहा कि वे अपने वर की तलाश में गई हैं। जब राजकुमारी दरबार पहुंची तो और राजा ने उनसे वर के चुनाव के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि उन्होंने शाल्वदेश के राजा के पुत्र जो जंगल में पले-बढ़े हैं उन्हें पति रूप में स्वीकार किया है।

    उनका नाम सत्यवान है। तब नारदमुनि बोले राजेन्द्र ये तो बहुत खेद की बात है क्योंकि इस वर में एक दोष है तब राजा ने पूछा वो क्या तो उन्होंने कहा जो वर सावित्री ने चुना है उसकी आयु कम है। वह सिर्फ एक वर्ष के बाद मरने वाला है। उसके बाद वह अपना देहत्याग देगा। तब सावित्री ने कहा पिताजी कन्यादान एकबार ही किया जाता है जिसे मैंने एक बार वरण कर लिया है। मैं उसी से विवाह करूंगी आप उसे कन्यादान कर दें। उसके बाद सावित्री के द्वारा चुने हुए वर सत्यवान से धुमधाम और पूरे विधि-विधान से विवाह करवा दिया गया।

    सत्यवान व सावित्री के विवाह को बहुत समय बीत गया। जिस दिन सत्यवान मरने वाला था वह करीब था। सावित्री एक-एक दिन गिनती रहती थी। उसके दिल में नारदजी का वचन सदा ही बना रहता था। जब उसने देखा कि अब इन्हें चौथे दिन मरना है। उसने तीन दिन व्रत धारण किया। जब सत्यवान जंगल में लकड़ी काटने गया तो सावित्री ने उससे कहा कि मैं भी साथ चलुंगी। तब सत्यवान ने सावित्री से कहा तुम व्रत के कारण कमजोर हो रही हो। जंगल का रास्ता बहुत कठिन और परेशानियों भरा है। इसलिए आप यहीं रहें। लेकिन सावित्री नहीं मानी उसने जिद पकड़ ली और सत्यवान के साथ जंगल की ओर चल दी।

    सत्यवान जब लकड़ी काटने लगा तो अचानक उसकी तबीयत बिगडऩे लगी। वह सावित्री से बोला मैं स्वस्थ महसूस नही कर रहा हूं सावित्री मुझमें यहा बैठने की भी हिम्मत नहीं है। तब सावित्री ने सत्यवान का सिर अपनी गोद में रख लिया। फिर वह नारदजी की बात याद करके दिन व समय का विचार करने लगी। इतने में ही उसे वहां एक बहुत भयानक पुरुष दिखाई दिया। जिसके हाथ में पाश था। वे यमराज थे। उन्होंने सावित्री से कहा तू पतिव्रता स्त्री है। इसलिए मैं तुझसे संभाषण कर लूंगा। सावित्री ने कहा आप कौन है तब यमराज ने कहा मैं यमराज हूं। इसके बाद यमराज सत्यवान के शरीर में से प्राण निकालकर उसे पाश में बांधकर दक्षिण दिशा की ओर चल दिए। सावित्री बोली मेरे पतिदेव को जहां भी ले जाया जाएगा मैं भी वहां जाऊंगी। तब यमराज ने उसे समझाते हुए कहा मैं उसके प्राण नहीं लौटा सकता तू मनचाहा वर मांग ले।

    तब सावित्री ने वर में अपने श्वसुर के आंखे मांग ली। यमराज ने कहा तथास्तु लेकिन वह फिर उनके पीछे चलने लगी। तब यमराज ने उसे फिर समझाया और वर मांगने को कहा उसने दूसरा वर मांगा कि मेरे श्वसुर को उनका राज्य वापस मिल जाए। उसके बाद तीसरा वर मांगा मेरे पिता जिन्हें कोई पुत्र नहीं हैं उन्हें सौ पुत्र हों। यमराज ने फिर कहा सावित्री तुम वापस लौट जाओ चाहो तो मुझसे कोई और वर मांग लो। तब सावित्री ने कहा मुझे सत्यवान से सौ यशस्वी पुत्र हों। यमराज ने कहा तथास्तु। यमराज फिर सत्यवान के प्राणों को अपने पाश में जकड़े आगे बढऩे लगे। सावित्री ने फिर भी हार नहीं मानी तब यमराज ने कहा तुम वापस लौट जाओ तो सावित्री ने कहा मैं कैसे वापस लौट जाऊं । आपने ही मुझे सत्यवान से सौ यशस्वी पुत्र उत्पन्न करने का आर्शीवाद दिया है। तब यमराज ने सत्यवान को पुन: जीवित कर दिया। उसके बाद सावित्री सत्यवान के शव के पास पहुंची और थोड़ी ही देर में सत्यवान के शव में चेतना आ गई।
    ================================================================
    7>सती अनुसुइया की कहानी (Sati Anasuya Story)

    Sati Anasuya Story in Hindi : सती अनुसूईया महर्षि अत्री की पत्नी थी। जो अपने पतिव्रता धर्म के कारण सुविख्यात थी। एक दिन देव ऋषि नारद जी बारी-बारी से विष्णुजी, शिव जी और ब्रह्मा जी की अनुपस्थिति में विष्णु लोक, शिवलोक तथा ब्रह्मलोक पहुंचे। वहां जाकर उन्होंने लक्ष्मी जी, पार्वती जी और सावित्री जी के सामने अनुसुइया के पतिव्रत धर्म की बढ़ चढ़ के प्रशंसा की तथा कहाँ की समस्त सृष्टि में उससे बढ़ कर कोई पतिव्रता नहीं है। नारद जी की बाते सुनकर तीनो देवियाँ सोचने लगी की आखिर अनुसुइया के पतिव्रत धर्म में ऐसी क्या बात है जो उसकी चर्चा स्वर्गलोक तक हो रही है ? तीनो देवीयों को अनुसुइया से ईर्ष्या होने लगी।

    नारद जी के वहां से चले जाने के बाद सावित्री , लक्ष्मी तथा पार्वती एक जगह इक्ट्ठी हुई तथा अनुसूईया के पतिव्रत धर्म को खंडित कराने के बारे में सोचने लगी। उन्होंने निश्चय किया की हम अपने पतियों को वहां भेज कर अनुसूईया का पतिव्रत धर्म खंडित कराएंगे। ब्रह्मा, विष्णु और शिव जब अपने अपने स्थान पर पहुँचे तो तीनों देवियों ने उनसे अनुसूईया का पतिव्रत धर्म खंडित कराने की जिद्द की। तीनों देवों ने बहुत समझाया कि यह पाप हमसे मत करवाओ। परंतु तीनों देवियों ने उनकी एक ना सुनी और अंत में तीनो देवो को इसके लिए राज़ी होना पड़ा।

    तीनों देवो ने साधु वेश धारण किया तथा अत्रि ऋषि के आश्रम पर पहुंचे। उस समय अनुसूईया जी आश्रम पर अकेली थी। साधुवेश में तीन अत्तिथियों को द्वार पर देख कर अनुसूईया ने भोजन ग्रहण करने का आग्रह किया। तीनों साधुओं ने कहा कि हम आपका भोजन अवश्य ग्रहण करेंगे। परंतु एक शर्त पर कि आप हमे निवस्त्र होकर भोजन कराओगी। अनुसूईया ने साधुओं के शाप के भय से तथा अतिथि सेवा से वंचित रहने के पाप के भय से परमात्मा से प्रार्थना की कि हे परमेश्वर ! इन तीनों को छः-छः महीने के बच्चे की आयु के शिशु बनाओ। जिससे मेरा पतिव्रत धर्म भी खण्ड न हो तथा साधुओं को आहार भी प्राप्त हो व अतिथि सेवा न करने का पाप भी न लगे। परमेश्वर की कृपा से तीनों देवता छः-छः महीने के बच्चे बन गए तथा अनुसूईया ने तीनों को निःवस्त्र होकर दूध पिलाया तथा पालने में लेटा दिया।

    जब तीनों देव अपने स्थान पर नहीं लौटे तो देवियां व्याकुल हो गईं। तब नारद ने वहां आकर सारी बात बताई की तीनो देवो को तो अनुसुइया ने अपने सतीत्व से बालक बना दिया है। यह सुनकर तीनों देवियां ने अत्रि ऋषि के आश्रम पर पहुंचकर माता अनुसुइया से माफ़ी मांगी और कहाँ की हमसे ईर्ष्यावश यह गलती हुई है। इनके लाख मना करने पर भी हमने इन्हे यह घृणित कार्य करने भेजा। कृप्या आप इन्हें पुनः उसी अवस्था में कीजिए। आपकी हम आभारी होंगी। इतना सुनकर अत्री ऋषि की पत्नी अनुसूईया ने तीनो बालक को वापस उनके वास्तविक रूप में ला दिया। अत्री ऋषि व अनुसूईया से तीनों भगवानों ने वर मांगने को कहा। तब अनुसूईया ने कहा कि आप तीनों हमारे घर बालक बन कर पुत्र रूप में आएँ। हम निःसंतान हैं। तीनों भगवानों ने तथास्तु कहा तथा अपनी-अपनी पत्नियों के साथ अपने-अपने लोक को प्रस्थान कर गए। कालान्तर में दतात्रोय रूप में भगवान विष्णु का , चन्द्रमा के रूप में ब्रह्मा का तथा दुर्वासा के रूप में भगवान शिव का जन्म अनुसूईया के गर्भ से हुआ।

    ==========================================================
    8>तुलसी और शालिग्राम विवाह की कथा

    एक समय जलंधर नाम का एक पराक्रमी असुर हुआ। इसका विवाह वृंदा नामक कन्या से हुआ। वृंदा भगवान विष्णु की परम भक्त थी। इसके पतिव्रत धर्म के कारण जलंधर अजेय हो गया था। इसने एक युद्ध में भगवान शिव को भी पराजित कर दिया। अपने अजेय होने पर इसे अभिमान हो गया और स्वर्ग की कन्याओं को परेशान करने लगा। दुःखी होकर सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गये और जलंधर के आतंक को समाप्त करने की प्रार्थना करने लगे।

    भगवान विष्णु ने अपनी माया से जलांधर का रूप धारण कर लिया और छल से वृंदा के पतिव्रत धर्म को नष्ट कर दिया। इससे जलंधर की शक्ति क्षीण हो गयी और वह युद्ध में मारा गया। जब वृंदा को भगवान विष्णु के छल का पता चला तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर का बन जाने का शाप दे दिया। देवताओं की प्रार्थना पर वृंदा ने अपना शाप वापस ले लिया। लेकिन भगवान विष्णु वृंदा के साथ हुए छल के कारण लज्जित थे अतः वृंदा के शाप को जिवित रखने के लिए उन्होनें अपना एक रूप पत्थर रूप में प्रकट किया जो शालिग्राम कहलाया।


    भारत में शालिग्राम पत्थर नर्मदा नदी से प्राप्त होता है। भगवान विष्णु ने वृंदा से कहा कि तुम अगले जन्म में तुलसी के रूप में प्रकट होगी और लक्ष्मी से भी अधिक मेरी प्रिय रहोगी। तुम्हारा स्थान मेरे शीश पर होगा। मैं तुम्हारे बिना भोजन ग्रहण नहीं करूंगा। यही कारण है कि भगवान विष्णु के प्रसाद में तुलसी अवश्य रखा जाता है। बिना तुलसी के अर्पित किया गया प्रसाद भगवान विष्णु स्वीकार नहीं करते हैं।

    भगवान विष्णु को दिया शाप वापस लेने के बाद वृंदा जलंधर के साथ सती हो गयी। वृंदा के राख से तुलसी का पौधा निकला। वृंदा की मर्यादा और पवित्रता को बनाये रखने के लिए देवताओं ने भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप का विवाह तुलसी से कराया। इसी घटना को याद रखने के लिए प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देव प्रबोधनी एकादशी के दिन तुलसी का विवाह शालिग्राम के साथ कराया जाता है।
    ===============================================================
    9>लक्ष्मी कहाँ रहती हैं?
    """***""**"**"*"*""*"*
    एक बूढे सेठ थे । वे खानदानी रईस थे, धन-ऐश्वर्य प्रचुर मात्रा में था परंतु लक्ष्मीजी का तो है चंचल स्वभाव । आज यहाँ तो कल वहाँ!!
    सेठ ने एक रात को स्वप्न में देखा कि एक स्त्री उनके घर के दरवाजे से निकलकर बाहर जा रही है।
    उन्होंने पूछा : ‘‘हे देवी आप कौन हैं ? मेरे घर में आप कब आयीं और मेरा घर छोडकर आप क्यों और कहाँ जा रही हैं?
    वह स्त्री बोली : ‘‘मैं तुम्हारे घर की वैभव लक्ष्मी हूँ । कई पीढयों से मैं यहाँ निवास कर रही हूँ किन्तु अब मेरा समय यहाँ पर समाप्त हो गया है इसलिए मैं यह घर छोडकर जा रही हूँ । मैं तुम पर अत्यंत प्रसन्न हूँ क्योंकि जितना समय मैं तुम्हारे पास रही, तुमने मेरा सदुपयोग किया । संतों को घर पर आमंत्रित करके उनकी सेवा की, गरीबों को भोजन कराया, धर्मार्थ कुएँ-तालाब बनवाये, गौशाला व प्याऊ बनवायी । तुमने लोक-कल्याण के कई कार्य किये । अब जाते समय मैं तुम्हें वरदान देना चाहती हूँ । जो चाहे मुझसे माँग लो ।
    सेठ ने कहा : ‘‘मेरी चार बहुएँ है, मैं उनसे सलाह-मशवरा करके आपको बताऊँगा । आप कृपया कल रात को पधारें ।
    सेठ ने चारों बहुओं की सलाह ली ।
    उनमें से एक ने अन्न के गोदाम तो दूसरी ने सोने-चाँदी से तिजोरियाँ भरवाने के लिए कहा ।
    किन्तु सबसे छोटी बहू धार्मिक कुटुंब से आयी थी। बचपन से ही सत्संग में जाया करती थी ।
    उसने कहा : ‘‘पिताजी ! लक्ष्मीजी को जाना है तो जायेंगी ही और जो भी वस्तुएँ हम उनसे माँगेंगे वे भी सदा नहीं टिकेंगी । यदि सोने-चाँदी, रुपये-पैसों के ढेर माँगेगें तो हमारी आनेवाली पीढी के बच्चे अहंकार और आलस में अपना जीवन बिगाड देंगे। इसलिए आप लक्ष्मीजी से कहना कि वे जाना चाहती हैं तो अवश्य जायें किन्तु हमें यह वरदान दें कि हमारे घर में सज्जनों की सेवा-पूजा, हरि-कथा सदा होती रहे तथा हमारे परिवार के सदस्यों में आपसी प्रेम बना रहे क्योंकि परिवार में प्रेम होगा तो विपत्ति के दिन भी आसानी से कट जायेंगे।
    दूसरे दिन रात को लक्ष्मीजी ने स्वप्न में आकर सेठ से पूछा : ‘‘तुमने अपनी बहुओं से सलाह-मशवरा कर लिया? क्या चाहिए तुम्हें ?
    सेठ ने कहा : ‘‘हे माँ लक्ष्मी ! आपको जाना है तो प्रसन्नता से जाइये परंतु मुझे यह वरदान दीजिये कि मेरे घर में हरि-कथा तथा संतो की सेवा होती रहे तथा परिवार के सदस्यों में परस्पर प्रेम बना रहे।
    यह सुनकर लक्ष्मीजी चौंक गयीं और बोलीं : ‘‘यह तुमने क्या माँग लिया। जिस घर में हरि-कथा और संतो की सेवा होती हो तथा परिवार के सदस्यों में परस्पर प्रीति रहे वहाँ तो साक्षात् नारायण का निवास होता है और जहाँ नारायण रहते हैं वहाँ मैं तो उनके चरण दबाती हूँ और मैं चाहकर भी उस घर को छोडकर नहीं जा सकती। यह वरदान माँगकर तुमने मुझे यहाँ रहने के लिए विवश कर दिया है.!
    ==================================================================
    10>क्यों नहीं लेना चाहते थे शुकदेवजी जन्म, क्या हुआ उनके जन्म के बाद?


    भागवत में अब तक आपने अंक 315में आपने पढ़ा....हम हर तरफ से माया से घिरे हैं, घर, परिवार, बच्चे, बीवी, धन, सम्पत्ति, दुकानदारी, व्यवसाय। ये सब माया की तरह ही हैं, जो मौजूद भी हैं लेकिन नित्य नहीं है।माया बांधने का काम करती है। माया का अर्थ है माया, मा का अर्थ है नहीं है, या का अर्थ है यह। यानी माया का पूर्ण अर्थ हुआ यह नहीं है। माया में आदमी इस तरह बंध जाता है कि उसे कुछ भी भान नहीं रहता। बड़े-बड़े विद्वान और ऋषि भी माया के जाल में फंस गए हैं। माया से बचकर रहने से ही जीवन सुखी रह सकता है अब आगे...
    महाभारत में कथा है कि भगवान वेद व्यास की पत्नी गर्भवती थी और शुकदेवजी ही उनके गर्भ में पल रहे थे। शुकदेवजी गर्भ से ही माया रहित थे, वे संसार के मोह में फंसना नहीं चाहते थे, सो बरसों तक गर्भ में पलते रहे। ऋषियों ने बहुत प्रयास किया कि वे संसार में आ जाएं लेकिन वे नहीं माने। उन्होंने कहा जब विष्णु अपनी माया को रोक दें तो ही वे संसार में आएंगे। एक पल से भी कम समय के लिए भगवान विष्णु ने अपनी माया को रोक लिया और शुकदेवजी गर्भ से निकलकर सीधे वन की ओर भागे। जैसे ही माया सक्रिय हुई, वेद व्यासजी पुत्र वियोग से व्यथित होकर उनके पीछे भागने लगे। वे ब्रह्मज्ञान के ज्ञाता होकर भी वे माया से मोहित होकर पुत्र के पीछे दौड़ पड़े।
    दौड़ते-दौड़ते शुकदेवजी एक तालाब के किनारे से गुजरे, वहां कुछ युवतियां नहा रही थीं, शुकदेव को देखकर भी वे विचलित नहीं हुईं और नहाने में लगी रहीं। तभी थोड़ी देर बाद वहीं से वेद व्यास भी गुजरे, तो युवतियां अपने कपड़े संभालने लगीं। वेद व्यास ने आश्चर्य से पूछा कि तुम ये कैसा व्यवहार कर रही हो, एक युवक गुजरा तो तुम्हें कोई लाज महसूस नहीं हुई और मैं वृद्ध हूं, तुम्हारे पिता जैसा हूं, तुम मुझसे लाज कर रही हो, भाग रही हो।
    युवतियों ने जवाब दिया महर्षि आपका पुत्र माया से मुक्त है, उसे संसार से कोई मोह नहीं है, हमें देखकर भी वो अनदेखा कर गया लेकिन आप उसके विपरित हैं, आपमें अभी भी मोह और माया है। आप अपने ब्रह्म तत्व के ज्ञाता पुत्र के पीछे भाग रहे हैं। आप खुद भी परमतत्व के ज्ञाता हैं। वेद व्यास को युवतियों की बात समझ में आ गई। उन्होंने शुकदेव का पीछा करना छोड़ दिया।कथा बताती है कि हम भले ही कितने ही धीर-गंभीर और ज्ञानी क्यों न हों, माया से कब घिर जाएंगे, पता नहीं चलेगा। सबसे पहले माया को समझना जरूरी है।
    =======================================
    11>इस कहानी से समझे जीवन का सही अर्थ...

     भागवत में अब तक आपने अंक 313 पढ़ा...बहुत बड़ी आपत्ति हो तो शिकार के द्वारा अथवा विद्यार्थियों को पढ़ाकर अपनी आपत्ति के दिन काट दे। वैश्य भी आपत्ति के समय शूद्रों की वृत्ति सेवा से अपना जीवन निर्वाह कर ले। गृहस्थ पुरुष अनायास प्राप्त अथवा शास्त्रोक्त रीति से उपार्जित अपने शुद्ध धन से अपने भृत्य, आश्रित प्रजाजन को किसी प्रकार का कष्ट न पहुंचाते हुए न्याय और विधि के साथ ही यज्ञ करें अब आगे...
    प्रभु दर्शन की दृष्टि चाहिए। हम उसके अणु से छोटे अंश सूर्य को देख नहीं सकते तो फिर उसे कैसे देख सकते हैं। अर्जुन ने दर्शन करने चाहे, भगवान ने भी दर्शन देने की तैयारी की, लेकिन वह दर्शन नहीं कर सका, जब तक कि भगवान ने कृपा करके उसको अपनी दृष्टि नहीं दी। इसीलिए भक्त भगवान से कुछ नहीं मांगता, उसकी कृपा उसे वह अहेतु हितैषी अपने आप दे देता है। यह अपने आप मिलने वाली कृपा के लिए भक्त क्या करे, बस समर्पण कर दे। तन्मय हो जाए साधना में।
    साधना किस प्रकार करें? नारद भक्ति सूत्र, शाण्डिल्य भक्ति सूत्र, रामायण में भगवान के द्वारा शबरी को दिए गए नवभक्ति सूत्र भागवतीय सूत्र हैं जो साधना का स्वरूप बताते हैं। ये अपने आप में विषद विषय है। कोई एक आधार ले लिया जाए और चल पड़ा जाए। इन सबमें सरलतम लगता है, नि निरंतर हरिनाम लेना राम नाम लेना। शिव नाम लेना। अपने प्रिय भगवान को सदैव याद करना और याद रखना भक्ति है। इसका फल ही भगवत् दर्शन है। प्रिय को जानने का और तरीका नहीं शास्त्रों की व्याख्या पण्डितों का काम है। 
    श्रद्धा और विश्वास का आधार लिए बिना भक्ति अवतरित नहीं होती। पार्वती और शंकर ही भक्ति सुरसरि धारा को धारण कर सकते हैं। जो भागीरथ तपस्या के बाद ही प्राप्त हो सकती है। जो परम ब्रम्ह की चरणामृत है।अर्थात् भक्ति प्राप्त करके भक्त बनने के लिए पहले श्रद्धा-विश्वास जगाएं। यही शक्ति जागरण है। कुण्डलिनी जागरण, फिर इन्द्रिय निग्रह यम नियम द्वारा तप करके निश्चल निर्विकार बने भक्ति अवतरित होगी और तब भक्त बन भगवान के प्रिय बन उसकी कृपा पाई जा सकेगी और दु:ख का सागर उस कल्याणमय की कृपा से सहज ही पार किया जा सकेगा।
    भागवत गृहस्थी का ग्रंथ है। इसमें लगभग जीवन के हर पक्ष को स्पर्श किया गया है। भगवान उद्धव को गृहस्थी के साथ-साथ वानप्रस्थ और संन्यास के भी धर्म बता रहे हैं। इसी के साथ कथा ग्यारहवें स्कंध के 18वें अध्याय में प्रवेश कर रही है। इन चर्चाओं में भागवत का ही नहीं, जीवन का भी सार सामने आ रहा है।भगवान कहते हैं-उद्धव! यदि गृहस्थ मनुष्य वानप्रस्थ आश्रम में जाना चाहें तो अपनी पत्नी को पुत्रों के हाथ सौंप दे अथवा अपने साथ ही ले ले और फिर शांत चित्त से अपनी आयु का तीसरा भाग वन में ही रहकर व्यतीत करे। 
    भागवत में जो आचरण बताए हैं वे बहुत कठिन हैं, लेकिन देशकाल परिस्थिति के बदलाव के साथ एक बात समझ लें इसका सीधा अर्थ है संयम। वानप्रस्थ को चाहिए कि कौन सा पदार्थ कहां से लाना चाहिए, किस समय लाना चाहिए,कौन-कौन पदार्थ अपने अनुकूल हैं- इन बातों को जानकर अपने जीवन-निर्वाह के लिए स्वयं ही सब प्रकार के कन्दमूल फल आदि ले आवे। देशकाल आदि से अनभिज्ञ लोगों से लाएं हुए अथवा दूसरे समय के संचित पदार्थों को अपने काम में न ले। इसका अर्थ है भोजन संयम बनाए रखें।
     ==========================================