MYTHOLOGICAL STORIES=পৌরাণিক কাহিনী ·
4>MTL-Story=Post=4***श्रीगणेश के श्राप के कारण***( 1 to 10 )
02>------------श्रीगणेश के श्राप के कारण कृष्ण पर लगा था चोरी का झूठा आरोप!=+mtl
21>------------भगवान गणेश थे बालब्रह्मचारी, फिर कैसे की दो शादिया?=+mtl22>------------कश्यप ऋषि के श्राप के कारण शिवजी ने काटा था बालक गणेश का मस्तक=+mtl
23>------------कुंवारी कन्याओं को शिवलिंग की पूजा क्यों नहीं करनी चाहिए=+mtl
24>------------भगवान शिव के दो नहीं पांच पुत्रो=+mtl
25>------------अर्द्धनारीश्वर रूप के पीछे छुपे इस सत्य को जान आपकी रूह कांप उठेगी!=+mtl
26>------------क्यों चढ़ाते हैं शिवलिंग पर भस्म?=+mtl
27>------------किस बात का शिवजी को हुआ पछतावा कि तोड़ दिया अपना त्रिशूल ?=+mtl
28--------------क्यों काटा था काल भैरव ने ब्रह्मा जी का पांचवा शीश -
29------------जब माता पार्वती ने दिया शिव, विष्णु, नारद, कार्तिकेय और रावण को श्राप -
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1>श्रीगणेश के श्राप के कारण कृष्ण पर लगा था चोरी का झूठा आरोप!
भगवान गणेश का जन्म दिवस गणेश चतुर्थी के से जुडी है ये अद्भुद पौराणिक कथा, भागद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था, इस दिन को विशेष तौर पे महाराष्ट्र में बड़े धूम धाम से मनाया जाता हैं और ये उतसव पुरे दस दिनों तक चलता है( लोकमान्य तिलक ने शुरू करवाया था.).
गणेश चतुर्थी के दिन गणेश को चन्द्रलोक में भोज का निमंत्रण था, गणेश को मोदक प्रिय है और मोदक ही भोजन में था ऐसे में टूट पड़े और इतना ही नही बच्चे खुले लड्डू भी अपने साथ समेट के ले गए. एक दम दबाके लड्डू खाए गणेश को नींद भी आने लगी और निकलते समय ही वो गिर पड़े और पुरे लड्डू बिखर गए, लेकिन ये दिख चन्द्रदेव अपनी हंसी न रोक पाये और जोर जोर से हंस पड़े.
इस पर गणेश क्रोधित हो गए और उन्हें श्राप दे डाला की मुझपे हंसने वाले जो तुझे देखेगा उसपे चोरी का झूठा नाम लग जायेगा और वो बदनाम होगा, अपनी प्रतिष्ठा पर बात आते देख चन्द्रदेव घबरा के गणेश के चरणो में गिर गए और क्षमा याचना करने लगे. कुछ देर बाद गणेश का गुस्सा शांत हुआ लेकिन उन्होंने श्राप को चतुर्थी के दिन जारी रखा, तब से चतुर्थी के दिन चाँद को नही देखा जाता है अगर देख ले तो अनिष्ट हो जाता है.
कृष्ण पर चोरी का झूठा आरोप: द्वापर युग में एक राजा था नाम था, जिनका नाम था सत्राजित उन्होंने सूर्य को प्रसन्न कर स्यमन्तक मणि वरदान में पाली थी. वो मणि रोज आठ भरी सोना देती थी और जन्हा वो रहती थी( जिसके पास) वंहा कोई समस्या नही होती थी.
एक दिन जब कृष्ण खेल रहे थे तो सत्राजित मणि सर पर लगा उनसे मिलने पहुंचे जिसे देख कृष्ण ने कहा की इस मणि के अधिकारी तो राजा उग्रसेन जी है। बात सुन सत्राजित बिना कुछ बोले ही वहाँ से उठ कर चले गए, मणि को अपने घर के मन्दिर में स्थापित कर दिया।
गणेश चतुर्थी का दिन था और कृष्ण अपने महल में खड़े थे और उनकी नजर चन्द्र पे पड़ गई, तब रुक्मणी जी को बड़ी चिंता हुई की मेरे पति किस मुसीबत में पड़ने वाले है. उसी दिन राजा का भाई स्यमन्तक को पहन कर घोड़े पर सवार हो शिकार पे निकला जन्हा एक सिंह ने उसे मार गिराया। मणि भी उसके पेट में चली गई जिसे ऋक्षराज जामवंत ने मारा और वह मणि पाली और अपनी गुफा में चला गया। जामवंत ने उस मणि को अपने बालक को दे दिया जो उसे खिलौना समझ उससे खेलने लगा।
भाई के गायब होने पर राजा ने बिना सोचे कृष्ण जी पर हत्या और चोरी के आरोप फैला दिए। आरोप झुटलाने के लिए श्री कृष्ण वन में गए जन्हा उन्होंने घोड़ा सहित प्रसेनजित को मरा हुआ देखा पर मणि नहीं दिखी। निकट ही सिंह के पंजों के चिन्ह थे, जिनके सहारे आगे बढ़ने पर उन्हें मरे हुए सिंह का शरीर मिला। वहाँ पर रीछ के पैरों के पद-चिन्ह भी मिले जो कि एक गुफा तक गये थे।
तब जामवंत से अठाईस दिन तक युद्ध कर उन्होंने पूर्व राम जन्म का वादा जामवंत से पूरा किया और मणि वापस देकर अपना कलंक हटाया. जामवंत ने अपनी पुत्री जामवंत का हाथ भगवान के हाथ में दिया और शर्मवश राजा सत्राजित ने अपनी पुत्री सत्यभामा का विवहा कृष्ण से कर अपने पाप का प्रायश्चित किया.
जब गणेश को ये पता चला तो उन्होंने गणेश चतुर्थी के दिन को भी चन्द्र को श्राप मुक्त कर दिया, इस कारन गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्र को देखने से दोष नही लगता है. गणपति बाप्पा मोरेया.
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2>.==भगवान गणेश थे बालब्रह्मचारी, फिर कैसे की दो शादिया?
भगवान गणेश बालब्रह्मचारी थे लेकिन बाद में ऐसा क्या हो गया की उन्होंने एक नही दो दो शादिया की? इसके लिए पौराणो के गर्भ में जाना होगा आपको लेकिन हम है न. सति तुलसी का नाम तो अपने सुना ही होगा जो की जालंधर से ब्याही गई और बाद में भगवान विष्णु के छलावे के चलते उन्हें श्राप दे पत्थर का बना दिया.
इन्ही सति की जब असुरराज जालंधर से शादी नही हुई थी तो उन्होंने एक बार गणेश को देख उन्हें अपने पति रूप में पानी की इच्छा इन्ही बालब्रह्मचारी गणेश से कर दी. बस फिर क्या था भड़क गए गणेश और कर दिया इंकार, इस पर तुलसी ने गणेश को श्राप दिया की जिस ब्रह्मचर्य पे तुम अकड़ रहे हो वो नही रहेगा और तुम्हारी दो दो शादिया होगी, तब गणेश ने भी श्राप दिया की तुम्हारी एक असुर से शादी होगी.
फिर भी शादी तो अपने से नही होती है, तो सुनिए एक बाद दक्षराज अपनी दो बेटियो की शादी को लेकर चिंतित थे तो नारद ने उन्हें शिव पारवती से अपनी चिंता जताने को कहा. चूँकि नारद सब जानते थे की शिव पारवती के तो पुत्र है, ऐसे में दक्षराज अपनी दोनों बेटियो को बहु रूप में स्वीकार करने की विनती महादेव और सति से करने लगा.
लेकिन दोनों बेटियो की एक शर्त भी थी की वो शादी एक ही पुरुष से करेगी, ऐसे में महादेव और पारवती संशय में थे. दोनों ने एक तरीका निकला दोनों पुत्रो को शादी के बारे में बिना बताये ही दोनों में एक प्रतिस्पर्धा रखी जिसका इनाम शादी थी, प्रतियोगिता ये थी को जो भाई पुरे ब्रह्माण्ड की परिक्रमा सात बार सबसे पहले कर के आएगा वही जीतेगा.
कार्तिकेय तुरंत अपने वाहन मोर को तुरंत निकल लिए लेकिन मूषक की सवारी करने वाले गणेश वंही रुके, चूँकि उनका वाहन काफी धीमा था तो उन्होंने बुद्धि का इस्तेमाल किया.
माता पिता को एक चौक्की पे बैठाया और उनके सात परिक्रमा कर जीत का दावा किया. उनका तर्क था की माता पिता की तुलना शास्त्रो में ब्रह्माण्ड से की है तो मैं जीत गया, गणेश की बुद्धिमता देख माता पिता प्रसन्न हुए पर जब कार्तिकेय आया तो इसे छल समझ वंहा से नाराज हो चले गए
तब गणेश को इनाम में शादी मिली जो उनके न चाहने पर भी उन्हें माता पिता की आज्ञा और जीत के तोहफे के रूप में स्वीकार करनी पड़ी सति तुलसी का श्राप भी पूरा हुआ और दक्षराज की समस्या भी. दोनों पत्नियों का नाम ऋद्धि और सिद्धि था, और उनसे शुभ और लाभ नाम के दो पुत्र भी हुए गणेश के, जो आज भी व्यापारियों के लिए प्रथम पूजनीय है.
गणपति बाप्पा मोरया.
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3>कश्यप ऋषि के श्राप के कारण शिवजी ने काटा था बालक गणेश का मस्तक
कहते है की इंसान का वर्तमान, उसके पिछले कर्मो पर और भविष्य वर्तमान कर्मों पर आधारित होता है। लेकिन यह बात केवल इंसानो पर ही नहीं अपितु भगवानों पर भी लागू होती है। हमारे पुराणों में अनेक ऐसी कथाएँ है जब भगवान द्वारा अतीत में किये गए अनुचित कार्यों के कारण उन्हें आने वाले समय में कष्ट उठाने पड़े। ऐसी ही एक कहानी भगवान शंकर से सम्बंधित है जब उन्हें कश्यप ऋषि द्वारा दिए गए शाप के कारण अपने ही पुत्र गणेश का मस्तक काटना पड़ा।
भगवान गणेश का जन्म की कहानी :
देवी पार्वती ने एक बार शिवजी के गण नन्दी के द्वारा उनकी आज्ञा पालन में त्रुटि के कारण अपने शरीर के उबटन से एक बालक का निर्माण कर उसमें प्राण डाल दिए और कहा कि तुम मेरे पुत्र हो। तुम मेरी ही आज्ञा का पालन करना और किसी की नहीं। देवी पार्वती ने यह भी कहा कि मैं स्नान के लिए जा रही हूं। कोई भी अंदर न आने पाए। थोड़ी देर बाद वहां भगवान शंकर आए और देवी पार्वती के भवन में जाने लगे।
यह देखकर उस बालक ने विनयपूर्वक उन्हें रोकने का प्रयास किया। बालक का हठ देखकर भगवान शंकर क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने त्रिशूल से उस बालक का सिर काट दिया। देवी पार्वती ने जब यह देखा तो वे बहुत क्रोधित हो गई। उनकी क्रोध की अग्नि से सृष्टि में हाहाकार मच गया। तब सभी देवताओं ने मिलकर उनकी स्तुति की और बालक को पुनर्जीवित करने के लिए कहा।
तब भगवान शंकर के कहने पर विष्णुजी एक हाथी का सिर काटकर लाए और वह सिर उन्होंने उस बालक के धड़ पर रखकर उसे जीवित कर दिया। तब भगवान शंकर व अन्य देवताओं ने उस गजमुख बालक को अनेक आशीर्वाद दिए। देवताओं ने गणेश, गणपति, विनायक, विघ्नहरता, प्रथम पूज्य आदि कई नामों से उस बालक की स्तुति की। इस प्रकार भगवान गणेश का प्राकट्य हुआ।
कश्यप ऋषि ने दिया था शिव जी को शाप :
ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार एक बार नारद जी ने श्री नारायण से पूछा कि प्रभु आप बहुत विद्वान है और सभी वेदों को जानने वाले हैं। मैं आप से ये जानना चाहता हूं कि जो भगवान शंकर सभी परेशानियों को दूर करने वाले माने जाते हैं। उन्होंने क्यों अपने पुत्र गणेश की के मस्तक को काट दिया।
यह सुनकर श्रीनारायण ने कहा नारद एक समय की बात है। शंकर ने माली और सुुमाली को मारने वाले सूर्य पर बड़े क्रोध में त्रिशूल से प्रहार किया। सूर्य भी शिव के समान तेजस्वी और शक्तिशाली था। इसलिए त्रिशूल की चोट से सूर्य की चेतना नष्ट हो गई। वह तुरंत रथ से नीचे गिर पड़ा। जब कश्यपजी ने देखा कि मेरा पुत्र मरने की अवस्था में हैं। तब वे उसे छाती से लगाकर फूट-फूटकर विलाप करने लगे। उस समय सारे देवताओं में हाहाकार मच गया। वे सभी भयभीत होकर जोर-जोर से रुदन करने लगे। अंधकार छा जाने से सारे जगत में अंधेरा हो गया। तब ब्रह्मा के पौत्र तपस्वी कश्यप जी ने शिव जी को शाप दिया वे बोले जैसा आज तुम्हारे प्रहार के कारण मेरे पुत्र का हाल हो रहा है। ठीक वैसे ही तुम्हारे पुत्र पर भी होगा। तुम्हारे पुत्र का मस्तक कट जाएगा।
यह सुनकर भोलेनाथ का क्रोध शांत हो गया। उन्होंने सूर्य को फिर से जीवित कर दिया। सूर्य कश्यप जी के सामने खड़े हो गए। जब उन्हें कश्यप जी के शाप के बारे में पता चला तो उन्होंने सभी का त्याग करने का निर्णय लिया। यह सुनकर देवताओं की प्रेरणा से भगवान ब्रह्मा सूर्य के पास पहुंचे और उन्हें उनके काम पर नियुक्त किया।
ब्रह्मा, शिव और कश्यप आनंद से सूर्य को आशीर्वाद देकर अपने-अपने भवन चले गए। इधर सूर्य भी अपनी राशि पर आरूढ़ हुए। इसके बाद माली और सुमाली को सफेद कोढ़ हो गया, जिससे उनका प्रभाव नष्ट हो गया। तब स्वयं ब्रह्मा ने उन दोनों से कहा-सूर्य के कोप से तुम दोनों का तेज खत्म हो गया है। तुम्हारा शरीर खराब हो गया है। तुम सूर्य की आराधना करो। उन दोनों ने सूर्य की आराधना शुरू की और फिर से निरोगी हो गए।
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4>=कुंवारी कन्याओं को शिवलिंग की पूजा क्यों नहीं करनी चाहिए
धार्मिक रीति-रिवाज
धार्मिक रीति-रिवाजों को लोग विशेष महत्ता प्रदान करते हैं.... धर्म शास्त्रों में बताया गया है कि किसी भी धार्मिक कार्य को करते समय उसके नियमों का पालन करना आनिवार्य है। धार्मिक शास्त्रों में उल्लेखित किसी भी बात को अनदेखा करना उस जातक के लिए ही नुकसानदेह है, जो किसी विशेष पूजा से वरदान की अपेक्षा रखता है।
धार्मिक नियम
हम इस बात को झुठला नहीं सकते कि नियमों का पालन करने के साथ हमारे धार्मिक शास्त्र अपने भक्तों को कुछ नियमों में विभाजित भी करते हैं। कौन से जातक किस प्रकार के धार्मिक कार्यों का हिस्सा बन सकते हैं एवं किन कार्यों में गलती से भी भाग नहीं ले सकते, इस सबका वर्णन धर्म ग्रंथों में किया गया है।
भगवान शिव का ‘शिवलिंग’
ऐसा ही एक नियम भगवान शिव के रूप ‘शिवलिंग’ से जुड़ा है, जिसके संदर्भ में यह माना जाता है कि कुंवारी कन्याएं शिवलिंग को हाथ भी नहीं लगा सकतीं। उनके द्वारा इस शिवलिंग की पूजा का ख्याल करना भी निषेध है। लेकिन ऐसा क्यों?
कुछ धार्मिक मान्यताएं
हम जिस गुरु अथवा भगवान को मानते हैं, जिनकी दिन रात आराधना करते हैं, वे स्वयं ही हमें नियमों में क्यों बांधना पसंद करेंगे? लेकिन धार्मिक मान्यताओं को आधार बनाते हुए ऐसा कहा जाता है कि अविवाहित कन्याओं को हमेशा ही शिवलिंग की पूजा से दूर रखना चाहिए।
कुंवारी कन्याओं के लिए वर्जित है पूजा
ऐसी मान्यता है कि लिंगम एक साथ योनि (जो देवी शक्ति का प्रतीक है एवं महिला की रचनात्मक ऊर्जा है) का प्रतिनिधित्व करता है। हालांकि शास्त्रों में ऐसा कुछ नहीं लिखा है। शिवपुराण के अनुसार यह एक ज्योति का प्रतीक है।
क्या है सामाजिक धारणा?
कुछ सामाजिक धारणाओं के अनुसार शिवलिंग की पूजा सिर्फ पुरुष के द्वारा संपन्न होनी चाहिए न कि नारी के द्वारा। महिलाओं को शिवलिंग की पूजा से दूर ही रखा जाता है, खासतौर पर अविवाहित स्त्री को शिवलिंग पूजा से पूरी तरह से वर्जित रखा जाता है। परन्तु ऐसी मान्यताएं क्यों बनाई गई हैं?
शिवलिंग के करीब जाने से मनाही
किंवदंतियों के अनुसार अविवाहित स्त्री को शिवलिंग के करीब जाने की आज्ञा नहीं है। आमतौर पर शिवलिंग की पूजा करने के बाद श्रद्धालु इसके आसपास घूमकर परिक्रमा करने को सही मानते हैं, लेकिन अविवाहित स्त्री को इसके चारों ओर घूमने की भी इजाज़त नहीं दी जाती। ऐसा इसलिए क्योंकि भगवान शिव बेहद गंभीर तपस्या में लीन रहते हैं।
शिव की तपस्या से है संबंध
और किसी स्त्री के कारण उनकी तपस्या भंग ना हो जाए, इसका ध्यान रखना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। हमेशा से ही जब भी भगवान शिव की पूजा की जाती है तो विधि-विधान का बहुत खयाल रखा जाता है। केवल मनुष्य जाति ही नहीं, देवता व अप्सराएं भी भगवान शिव की पूजा करते समय बेहद सावधानी से उनकी पूजा करती हैं।
क्रोधित हो जाते हैं शिव जी
यह इसलिए कि कहीं देवों के देव महादेव की समाधि भंग न हो जाए। जब शिव की समाधि भंग होती है तो वे क्रोधित हो जाते हैं और अपने रौद्र रूप में प्रकट होते हैं जिसे शांत कर सकना किसी असंभव कार्य के समान है। इसी कारण से महिलाओं को शिव पूजा न करने के लिए कहा गया है।
लेकिन शिव की पूजा कर सकते हैं
लेकिन शिवलिंग की पूजा से अविवाहित स्त्रियों को दूर रखने का यह अर्थ नहीं है कि वे भगवान शिव की पूजा नहीं कर सकतीं। बल्कि कुंवारी कन्याएं ही शिव जी की सबसे अधिक आराधना करती हैं। अपने लिए एक अच्छे वर की कामना करते हुए वे पूर्ण विधि-विधान से शिव जी के 16 सोमवार का व्रत रखती हैं।
शिव के सोमवार व्रत
व्रत के साथ वे शिव जी की पूर्ण नियमों के साथ पूजा भी करती हैं। और ऐसी मान्यता है कि भक्तों के भोले भगवान शंकर उन्हें वरदान भी देते हैं। एक अच्छे वर के अलावा एक महिला का पति उससे प्रेम करे और अच्छा बर्ताव करे, इसके लिए भी महिलाएं 10 सोमवार का व्रत रखती हैं।
धार्मिक मान्यताएं
इसके साथ ही पति-पत्नी का वैवाहिक जीवन सफल बना रहे, इसके लिए महिलाएं शिव तथा माता पार्वती जी की एक साथ पूजा करती हैं। हिन्दू मान्यताओं में दुनिया की सबसे श्रेष्ठ जोड़ी का श्रेय भगवान शिव एवं पार्वती जी को दिया गया है।
शिव एवं पार्वती
ऐसी मान्यता प्रसिद्ध है कि इन दोनों के प्रेम तथा स्नेह वाली जोड़ी पूरी दुनिया में और किसी की नहीं है। इसलिए भक्त अपने अच्छे विवाहित जीवन के लिए शिव एवं पार्वती की विधिपूर्वक पूजा करते हैं।
सफल विवाह के लिए पूजा
पति-पत्नी का विवाह सफल हो इसके लिए पूजा के साथ कुछ लोग व्रत भी रखते हैं। लेकिन यह व्रत विशेष रूप से केवल सोमवार को ही किया जाए, ऐसी कोई मान्यता नहीं है। यह व्रत किसी भी दिन रखा जा सकता है, लेकिन शिव के भक्त सोमवार को भगवन शिव जी का प्रिय दिन मानकर ही व्रत एवं पूजा करते हैं।
श्रावण के माह में करें व्रत
यूं तो वर्ष के सभी सोमवार भगवान शिव की आराधना के लिए माने गए हैं, लेकिन विशेष रूप से श्रावण के माह (सावन का महीना) के सोमवार को अधिक महत्ता प्रदान की गयी है। सावन का महीना जो कि भगवान शिव को सबसे ज्यादा प्रिय है, इस समय भक्त वे सब कुछ करते हैं जिससे शिव जी प्रसन्न होकर उन्हें मनोवांछित वरदान प्रदान कर सकें।
होगी शिव जी की अपार कृपा
इसलिए यदि आप भी भगवान शिव से इस समय किसी वरदान की अपेक्षा कर रहे हैं, तो सावन का यह महीना आपके लिए सही समय लेकर आया है। इस महीने कुल 4 सोमवार हैं, जिसमें विधिपूर्वक व्रत एवं पूजा करके शिव जी की कृपा पाई जा सकती है।
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5>== भगवान शिव के दो नहीं पांच पुत्रो
भगवान शिव भोलेनाथ है और अपने भक्तो पर अपनी कृपा बनाये रखते है विशेष कर श्रावण मास तो उनका प्रिय है और इस महीने में उन्हें आसानी से मनाया जा सकता है. उन भोलेनाथ के परिवार के बारे में हम आपको इस विशेष माह में बताते है, आ शायद शिव के पुत्रो के बारे में जानते होंगे गणेश और कार्तिकेय पर आपको पता है शिव को इन दो के आलावा भी तीन और पुत्र है.
पहले गणेश जिन्हे पारवती ने अपने शरीर के मैल से बनाया फिर कार्तिकेय जो की शिव और पारवती के मिलानसे पैदा हुए, तीसरे क्रम का तो हमें पता नहीं पर फिर भी हम आपको बता देते है की उनकी उत्पति कैसे हुई. भष्मासुर का नाम तो आपने सुना ही होगा, शिव से वरदान पा वो शिव पे ही आजमाने चला था तब शिव वंहा से भागे. तब मोहिनी रूप धर विष्णु ने भस्मासुर को अपने ही हाथो मरवाया, उनके इस रूप से शिव भी मोहित हो गए और दोनों ने मिलान किया जिससे अय्यपा या सास्वत पुत्र ने जन्म लिया. इनकी पूजा विशेष कर दक्षिण भारत में होती है वो भी इन्ही दिनों में.
दूसरा था अंधक जो की भगवान शिव के पसीने से पैदा हुआ था, भगवान शिव तपस्या में रत थे तो उस समय उन्हें सर पे पसीना आया और उसकी बून्द धरती पर गिरी. पसीने की बून्द से एक बालक बना जिसे असुर ले गए उन्होंने ही उसे पाल पोसा, आखिर में दैत्य प्रवर्ति के चलते अंधक ने शिव की अर्धांगिनी पारवती पर कुदृष्टि डाली तो भोलेनाथ ने अपने हाथो से ही उसका वध कर दिया.
शिव का पांचवा पुत्र भी कुछ ऐसे ही जन्मा उसका जन्म शिव जो की तपस्या रत थे के सीने से निकले प्रकाश के धरती पर पड़ने से हुआ, भगवान शिव ने उसे पृथ्वी को ही पलने के लिए दिया. जब वो पैदा हुआ तो पूरा लाल रंग का था और उसके चार हाथ थे. थोड़ा बड़ा होने के बाद खुरा (भौमा) उसका नाम रखा गया और उसने भगवान शिव की तपस्या कर उनसे वरदान पाया और मंगल गृह बन के सितारा बन रहने लगे जो की मंगल गृह है वो मेष राशि के स्वामी है और लोहे के देवता भी है. शुक्रग्रह के मुकाबले वो कई बड़ी गृह है.
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6>अर्द्धनारीश्वर रूप के पीछे छुपे इस सत्य को जान आपकी रूह कांप उठेगी!
भगवान की महिमा अपने भक्तो से ही है, भगवान अपने से ज्यादा अपने भक्तो का गुणगान करने से अत्यधिक प्रसन्न होते है. ऐसे ही एक परम भक्त जिनकी महिमा हालाँकि उतनी नही फैली जितनी की होनी चाहिए क्योंकि उनकी भक्ति में थोड़ी सी कमी रह गई थी जिसकी बाद में उन्होंने भरपाई की.
"शीश गैंग अर्धांग पार्वती..... नंदी भृंगी नृत्य करात है" शिव स्तुति में भृंगी नाम आपने सुना होगा, ये एक पौराणिक कालीन ऋषि थे जो की शिव के परम भक्त थे. लेकिन भक्त कुछ ज्यादा ही कट्टर थे, इतने की शिव की तो आराधना करते लेकिन बाकि भक्तो की भांति पार्वती को नहीं भजते थे.
उनकी भक्ति अदम्य थी लेकिन वो पार्वती जी को हमेशा ही शिव से अलग समझते थे या यु कहे उनके कुछ नही समझते थे, ये उनका घमंड नही बल्कि शिव और केवल शिव में आसक्ति थी जिसमे उन्हें शिव के आलावा कुछ और दीखता ही नही था. एक बार तो ऐसा हुआ की वो कैलाश पर भगवान शिव की परिक्रमा करने गए लेकिन वो पार्वती की परिक्रमा नही करना चाहते थे.
इस पार्वती ने ऐतराज जताया और कहा की हम दो जिस्म एक जान है तुम ऐसा नही कर सकते पर कट्टरता देखिये भृंगी ने पार्वती को अनसुना किया और शिव की परिक्रमा लगाने बढे. लेकिन तब पार्वती शिव से सट के बैठ गई, मामले में और नया मोड़ आया भृंगी ने सर्प का रूप धरा और दोनों के बीच से होते हुए शिव की परिक्रमा देनी चाही.
तब शिव ने पार्वती का साथ दिया और संसार में अर्धनारीश्वर रूप धरा, तब भृंगी क्या करते पर गुस्से में आके उन्होंने चूहे का रूप धरा और शिव और पार्वती को बीच से कुतरने लगे. पर तब शक्ति को क्रोध आया और उन्होंने भृंगी को श्राप दिया की जो शरीर तुम्हे अपनी माँ से मिला है वो तुरंत तुम्हारी देह छोड़ देगा.
तंत्र साधना के हिसाब से मनुष्य को अपनी देह में हड्डिया और मांसपेशिया पिता की दें होती है जबकि खून और मांस माता की, श्राप के तुरंत प्रभाव से भृंगी ऋषि के शरीर से खून और मांस गिर गया. भृंगी निढाल हो जमीं पे गिर पड़े और हालत ये थे की वो खड़े भी होने की स्थिति में नही थे, तब उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने माँ पार्वती से अपनी भूल की क्षमा मांगी.
हालाँकि तब पार्वती ने अपना श्राप वापस लेना चाहा पर अपराध बोध से भृंगी ने मना कर दिया, पर उन्हें खड़ा रहने के लिए सहारे स्वरुप एक और (तीसरा) पैर प्रदान किया गया जिसके सहारे वो चल और खड़े हो सके. तो भक्त भृंगी के कारण हुआ था अर्धनारीश्वर रूप का उदय.
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7>क्यों चढ़ाते हैं शिवलिंग पर भस्म?
शिवजी के पूजन में भस्म अर्पित करने का विशेष महत्व है। बारह ज्योर्तिलिंग में से एक उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन भस्म आरती विशेष रूप से की जाती है। यह प्राचीन परंपरा है। आइए जानते है शिवपुराण के अनुसार शिवलिंग पर भस्म क्यों अर्पित की जाती है…
शिवजी का रूप है निराला
भगवान शिव अद्भुत व अविनाशी हैं। भगवान शिव जितने सरल हैं, उतने ही रहस्यमयी भी हैं। भोलेनाथ का रहन-सहन, आवास, गण आदि सभी देवताओं से एकदम अलग हैं। शास्त्रों में एक ओर जहां सभी देवी-देवताओं को सुंदर वस्त्र और आभूषणों से सुसज्जित बताया गया है, वहीं दूसरी ओर भगवान शिव का रूप निराला ही बताया गया है। शिवजी सदैव मृगचर्म (हिरण की खाल) धारण किए रहते हैं और शरीर पर भस्म (राख) लगाए रहते हैं।
भस्म का रहस्य
शिवजी का प्रमुख वस्त्र भस्म यानी राख है, क्योंकि उनका पूरा शरीर भस्म से ढंका रहता है। शिवपुराण के अनुसार भस्म सृष्टि का सार है, एक दिन संपूर्ण सृष्टि इसी राख के रूप में परिवर्तित हो जानी है। ऐसा माना जाता है कि चारों युग (त्रेता युग, सत युग, द्वापर युग और कलियुग) के बाद इस सृष्टि का विनाश हो जाता है और पुन: सृष्टि की रचना ब्रह्माजी द्वारा की जाती है। यह क्रिया अनवरत चलती रहती है। इस सृष्टि के सार भस्म यानी राख को शिवजी सदैव धारण किए रहते हैं। इसका यही अर्थ है कि एक दिन यह संपूर्ण सृष्टि शिवजी में विलीन हो जानी है।
ऐसे तैयार की जाती है भस्म
शिवपुराण के लिए अनुसार भस्म तैयार करने के लिए कपिला गाय के गोबर से बने कंडे, शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलतास और बेर के वृक्ष की लकडिय़ों को एक साथ जलाया जाता है। इस दौरान उचित मंत्रोच्चार किए जाते हैं। इन चीजों को जलाने पर जो भस्म प्राप्त होती है, उसे कपड़े से छान लिया जाता है। इस प्रकार तैयार की गई भस्म शिवजी को अर्पित की जाती है।
भस्म से बढ़ता है आकर्षण
ऐसा माना जाता है कि इस प्रकार तैयार की गई भस्म को यदि कोई इंसान भी धारण करता है तो वह सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त करता है। शिवपुराण के अनुसार ऐसी भस्म धारण करने से व्यक्ति का आकर्षण बढ़ता है, समाज में मान-सम्मान प्राप्त होता है। अत: शिवजी को अर्पित की गई भस्म का तिलक लगाना चाहिए।
भस्म से होती है शुद्धि
जिस प्रकार भस्म यानी राख से कई प्रकार की वस्तुएं शुद्ध और साफ की जाती है, ठीक उसी प्रकार यदि हम भी शिवजी को अर्पित की गई भस्म का तिलक लगाएंगे तो अक्षय पुण्य की प्राप्ति होगी और कई जन्मों के पापों से मुक्ति मिल जाएगी।
भस्म की विशेषता
भस्म की यह विशेषता होती है कि यह शरीर के रोम छिद्रों को बंद कर देती है। इसे शरीर पर लगाने से गर्मी में गर्मी और सर्दी में सर्दी नहीं लगती। भस्म, त्वचा संबंधी रोगों में भी दवा का काम भी करती है। शिवजी का निवास कैलाश पर्वत पर बताया गया है, जहां का वातावरण एकदम प्रतिकूल है। इस प्रतिकूल वातावरण को अनुकूल बनाने में भस्म महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भस्म धारण करने वाले शिव संदेश देते हैं कि परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल लेना चाहिए। जहां जैसे हालात बनते हैं, हमें भी स्वयं को उसी के अनुरूप बना लेना चाहिए।
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8>किस बात का शिवजी को हुआ पछतावा कि तोड़ दिया अपना त्रिशूल ?
त्रिशूल भगवान शिव का अस्त्र माना जाता है। इससे वे भक्तों की रक्षा तथा दुष्टों को दंड देते हैं। भारत में भगवान शिव का एक मंदिर ऐसा भी है जहां उनके खंडित त्रिशूल के टुकड़े जमीन में गड़े हुए हैं। आमतौर पर खंडित मूर्ति और उसके अस्त्रों का पूजन करना निषिद्ध होता है लेकिन यहां भगवान शिव के दर्शन-पूजन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।
यह मंदिर जम्मू से करीब 120 किमी की दूरी पर स्थित है। इस इलाके में पटनीटाप के पास सुध महादेव (शुद्ध महादेव) विराजमान हैं। यह शिवजी के अत्यंत प्राचीन मंदिरों में से एक है। यहीं उनके त्रिशूल के तीन टुकड़े हैं।
पास ही मानतलाई नामक स्थान है जिसे पार्वती की जन्मभूमि माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार, मंदिर लगभग 2,800 साल पुराना है। मंदिर में प्राचीन शिवलिंग और शिवपरिवार विराजमान हैं।
कहा जाता है कि मानतलाई से मां पार्वती भगवान शिव का पूजन करने आती थीं। यहां सुधांत नामक एक राक्षस भी शिवजी का पूजन करने आता था। एक दिन जब देवी पार्वती शिव का ध्यान कर रही थीं तब सुधांत उनसे वार्ता करने के लिए आ गया।
जब उन्होंने नेत्र खोले तो सामने सुधांत को देखकर घबरा गईं। वे जोर-जोर से चिल्लाने लगीं। तब उनकी आवाज सुनकर शिवजी ने कैलाश पर्वत से त्रिशूल फेंका। त्रिशूल का प्रहार सुधांत की छाती पर हुआ। त्रिशूल फेंकने के बाद शिव को पश्चाताप हुआ क्योंकि सुधांत उनका भक्त था।
उन्होंने उसे पुनः जीवनदान देने का फैसला किया लेकिन सुधांत शिव के हाथों से ही मोक्ष पाना चाहता था। उसने शिव को विनम्रता से मना कर दिया।
शिव ने उसका आग्रह स्वीकार कर लिया और यह वरदान दिया कि यह स्थान उसके नाम से प्रसिद्ध होगा। उन्होंने अपने त्रिशूल के तीन टुकड़े कर जमीन में गाड़ दिए। मंदिर के एक स्थान के बारे में कहा जाता है कि वहां सुधांत की अस्थियां रखी हुई हैं।
त्रिशूल के टुकड़ों पर एक प्राचीन लिपि लिखी हुई है। माना जाता है कि इसे अनेक विद्वानों ने पढ़ने का प्रयास किया लेकिन अभी तक इस लिपि को पढ़ने में सफलता नहीं मिली है।
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9>क्यों काटा था काल भैरव ने ब्रह्मा जी का पांचवा शीश -
Kaal Bhairav Story in Hindi :शिव की क्रोधाग्नि का विग्रह रूप कहे जाने वाले कालभैरव का अवतरण मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष की अष्टमी को हुआ। इनकी पूजा से घर में नकारत्मक ऊर्जा, जादू-टोने, भूत-प्रेत आदि का भय नहीं रहता। काल भैरव के प्राकट्य की निम्न कथा स्कंदपुराण के काशी- खंड के 31वें अध्याय में है।
कथा काल भैरव की
कथा के अनुसार एक बार देवताओं ने ब्रह्मा और विष्णु जी से बारी-बारी से पूछा कि जगत में सबसे श्रेष्ठ कौन है तो स्वाभाविक ही उन्होंने अपने को श्रेष्ठ बताया। देवताओं ने वेदशास्त्रों से पूछा तो उत्तर आया कि जिनके भीतर चराचर जगत, भूत, भविष्य और वर्तमान समाया हुआ है, अनादि अंनत और अविनाशी तो भगवान रूद्र ही हैं।
वेद शास्त्रों से शिव के बारे में यह सब सुनकर ब्रह्मा ने अपने पांचवें मुख से शिव के बारे में भला-बुरा कहा। इससे वेद दुखी हुए। इसी समय एक दिव्यज्योति के रूप में भगवान रूद्र प्रकट हुए। ब्रह्मा ने कहा कि हे रूद्र, तुम मेरे ही सिर से पैदा हुए हो।
अधिक रुदन करने के कारण मैंने ही तुम्हारा नाम ‘रूद्र’ रखा है अतः तुम मेरी सेवा में आ जाओ, ब्रह्मा के इस आचरण पर शिव को भयानक क्रोध आया और उन्होंने भैरव को उत्पन्न करके कहा कि तुम ब्रह्मा पर शासन करो।
उन दिव्य शक्ति संपन्न भैरव ने अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी अंगुली के नाख़ून से शिव के प्रति अपमान जनक शब्द कहने वाले ब्रह्मा के पांचवे सर को ही काट दिया। शिव के कहने पर भैरव काशी प्रस्थान किये जहां ब्रह्म हत्या से मुक्ति मिली। रूद्र ने इन्हें काशी का कोतवाल नियुक्त किया।
आज भी ये काशी के कोतवाल के रूप में पूजे जाते हैं। इनका दर्शन किये वगैर विश्वनाथ का दर्शन अधूरा रहता है।
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10>जब माता पार्वती ने दिया शिव, विष्णु, नारद, कार्तिकेय और रावण को श्राप -
Hindi Kahani- Jab Mata Parvti ne diya Shiv, Vishnu, Narad, kartikeya aur Ravan ko shrap : एक बार भगवान शंकर ने माता पार्वती के साथ द्युत (जुआ) खेलने की अभिलाषा प्रकट की। खेल में भगवान शंकर अपना सब कुछ हार गए। हारने के बाद भोलेनाथ अपनी लीला को रचते हुए पत्तो के वस्त्र पहनकर गंगा के तट पर चले गए। कार्तिकेय जी को जब सारी बात पता चली, तो वह माता पार्वती से समस्त वस्तुएँ वापस लेने आए।
इस बार खेल में पार्वती जी हार गईं तथा कार्तिकेय शंकर जी का सारा सामान लेकर वापस चले गए। अब इधर पार्वती भी चिंतित हो गईं कि सारा सामान भी गया तथा पति भी दूर हो गए। पार्वती जी ने अपनी व्यथा अपने प्रिय पुत्र गणेश को बताई तो मातृ भक्त गणोश जी स्वयं खेल खेलने शंकर भगवान के पास पहुंचे।
गणेश जी जीत गए तथा लौटकर अपनी जीत का समाचार माता को सुनाया। इस पर पार्वती बोलीं कि उन्हें अपने पिता को साथ लेकर आना चाहिए था। गणेश जी फिर भोलेनाथ की खोज करने निकल पड़े। भोलेनाथ से उनकी भेंट हरिद्वार में हुई। उस समय भोले नाथ भगवान विष्णु व कार्तिकेय के साथ भ्रमण कर रहे थे।
पार्वती से नाराज भोलेनाथ ने लौटने से मना कर दिया। भोलेनाथ के भक्त रावण ने गणेश जी के वाहन मूषक को बिल्ली का रूप धारण करके डरा दिया। मूषक गणेश जी को छोड़कर भाग गए। इधर भगवान विष्णु ने भोलेनाथ की इच्छा से पासा का रूप धारण कर लिया था। गणेश जी ने माता के उदास होने की बात भोलेनाथ को कह सुनाई।
इस पर भोलेनाथ बोले,कि हमने नया पासा बनवाया है, अगर तुम्हारी माता पुन: खेल खेलने को सहमत हों, तो मैं वापस चल सकता हूं।
गणेश जी के आश्वासन पर भोलेनाथ वापस पार्वती के पास पहुंचे तथा खेल खेलने को कहा। इस पर पार्वती हंस पड़ी व बोलीं,अभी पास क्या चीज है, जिससे खेल खेला जाए।
यह सुनकर भोलेनाथ चुप हो गए। इस पर नारद जी ने अपनी वीणा आदि सामग्री उन्हें दी। इस खेल में भोलेनाथ हर बार जीतने लगे। एक दो पासे फैंकने के बाद गणेश जी समझ गए तथा उन्होंने भगवान विष्णु के पासा रूप धारण करने का रहस्य माता पार्वती को बता दिया। सारी बात सुनकर पार्वती जी को क्रोध आ गया।
रावण ने माता को समझाने का प्रयास किया, पर उनका क्रोध शांत नहीं हुआ तथा क्रोधवश उन्होंने भोलेनाथ को श्राप दे दिया कि गंगा की धारा का बोझ उनके सिर पर रहेगा। नारद जी को कभी एक स्थान पर न टिकने का अभिषाप मिला। भगवान विष्णु को श्राप दिया कि यही रावण तुम्हारा शत्रु होगा तथा रावण को श्राप दिया कि विष्णु ही तुम्हारा विनाश करेंगे। कार्तिकेय को भी माता पार्वती ने हमेशा बाल रूप में रहने का श्राप दे दिया।-
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