MYTHOLOGICAL STORIES=পৌরাণিক কাহিনী ·
3>MTL=Post=3***प्रह्लाद नामक असुर***( 1 to 8 )
12-------------प्रह्लाद नामक असुर=+mtl
13--------------ब्रह्मा, विष्णु और महेश का पिता कौन, जानिए.... त्रिदेव के पिता=+mtl
14-------------भगवान विष्णु के लक्ष्मी जी पैर दबाते हुए का क्या अर्थ है?=+mtl
15-------------भगवान विष्णु ने मारा था शुक्राचार्य की माँ को, बदले की भावना में बने दैत्यगुरु!=+mtl
16-------------सती ने सतीत्व से भगवान विष्णु को भी बना दिया पत्थर का बूत==mtl
17-------------तुलसी के दोहो से जुडी महाभारत की अनसुनी कहानिया=+mtl
18--------------तुलसी के पौधों के बारे में चली आ रही परम्पराओ के ये है वैज्ञानिक कारण!=+mtl
19-------------भगवान गणेश को क्यों नही चढ़ाई जाती है तुलसी?=+mtl
12-------------प्रह्लाद नामक असुर=+mtl
13--------------ब्रह्मा, विष्णु और महेश का पिता कौन, जानिए.... त्रिदेव के पिता=+mtl
14-------------भगवान विष्णु के लक्ष्मी जी पैर दबाते हुए का क्या अर्थ है?=+mtl
15-------------भगवान विष्णु ने मारा था शुक्राचार्य की माँ को, बदले की भावना में बने दैत्यगुरु!=+mtl
16-------------सती ने सतीत्व से भगवान विष्णु को भी बना दिया पत्थर का बूत==mtl
17-------------तुलसी के दोहो से जुडी महाभारत की अनसुनी कहानिया=+mtl
18--------------तुलसी के पौधों के बारे में चली आ रही परम्पराओ के ये है वैज्ञानिक कारण!=+mtl
19-------------भगवान गणेश को क्यों नही चढ़ाई जाती है तुलसी?=+mtl
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1>प्रह्लाद नामक असुर
किसी आदि सत्य युग में प्रह्लाद नामक असुर ने अपने अंतर् गुणों द्वारा इन्द्र से उसका राज्य छीन लिया था। तीनों लोक का राज्य उसके हाथ में आ गया था। इन्द्र ने बृहस्पति जी को कहा हे महाराज कृपया बताइये कि किस वस्तु के द्वारा आनन्द प्राप्त हो सकता है। बृहस्पति जी ने उत्तर दिया कि ज्ञान सबसे बड़ा आनन्द का द्वार है। परन्तु इन्द्र को इससे सन्तोष न हुआ। वह तो प्रह्लाद से अपना त्रिलोकों का राज्य चाहता था। फिर उसने पूछा कि क्या इससे बढ़कर कोई वस्तु है। बृहस्पति ने उत्तर दिया पुत्र इससे भी बढ़ कर है, परन्तु वह तुम्हें शुक्राचार्य जो असुरों के पुरोहित है बतायेंगे।
इन्द्र उनके पास गया और उनसे भी वही प्रश्न पूछा। शुक्राचार्य ने भी ब्रह्मज्ञान को सर्वश्रेष्ठ बताया। परन्तु इससे भी इन्द्र संतुष्ट न हुए। वह तो ऐश्वर्या चाहता था। इन्द्र ने कहा क्या इससे भी बड़ी कोई चीज है। शुक्राचार्य ने कहा कि हाँ है इसका पता तुम्हें असुरों के राजा से लगेगा।
इन्द्र एक ब्राह्मण के भेष में प्रह्लाद के पास गया और वही प्रश्न पूछा जो उसने बृहस्पति व शुक्राचार्य से पूछा था। प्रह्लाद ने कहा समय नहीं है क्योंकि सारा समय तीनों लोकों के राज्य करने में व्यतीत हो जाता है, मैं तुम्हें कुछ शिक्षा नहीं दे सकता। ब्राह्मण ने कहा कि वह उनके खाली समय की प्रतीक्षा करेगा और जब वह कहेंगे तभी उनसे शिक्षा लेगा। उसने बहुत समय तक एक आज्ञाकारी शिष्य की तरह उनकी प्रतीक्षा की और जो कुछ प्रह्लाद कहते थे वह बड़ी सावधानी से करता था।
एक दिन फिर ब्राह्मण ने पूछा कि महाराज किस गुण के कारण आप को तीनों लोकों का राज्य मिला।
प्रह्लाद ने कहा मुझे अपने राज्य का कण मात्र भी अभिमान नहीं है। परन्तु जो शुक्राचार्य ने कहा है, मैं उसका पालन करता हूँ और उनके अनुसार चलता हूँ। मैंने क्रोध पर विजय प्राप्त कर ली है। मैं माता-पिता, बड़ों की सेवा करता हूँ। मुझे कोई बुराई नहीं है। मैंने अपनी आत्मा पर विजय प्राप्त कर ली। सब इन्द्रियाँ मेरे वश में हैं। गुरु मुझे परामर्श देते हैं। मैं उनके द्वारा अमृत पान करता हूँ। वह शिक्षा जो उनके मुखसे निकलती है मनुष्य को अमर कर देती है। यही वह बुद्धि है जो मनुष्य को बड़ा बनाती है।
ब्राह्मण ने भक्ति भाव से सब सुना। प्रह्लाद उसकी भक्ति से बड़े प्रसन्न हुए और उससे वर माँगने के लिए कहा।
ब्राह्मण ने कहा महाराज मुझे दान में अपना “शील” दे दो। प्रह्लाद को ब्राह्मण की इस प्रार्थना पर बड़ा आश्चर्य हुआ। परन्तु अपने प्रण के अनुसार उन्होंने अपना शील उसे दे दिया।अब प्रह्लाद दुविधा में पड़ गये पछतावा तो था पर शील के अर्थ का नहीं पता था
एक प्रकाशमयी अलौकिक आकृति उनके शरीर से निकली। प्रह्लाद ने पूछा कि तुम कौन हो। उसने कहा कि मैं तुम्हारा शील हूँ। तुमने मुझे छोड़ दिया है। अब मैं ब्राह्मण के शरीर में निवास करूंगा। इतना कहते ही वह आकृति विलीन हो गई। उस आकृति के अन्तर्ध्यान होते ही दूसरी सत्ता उनके सामने आई प्रह्लाद ने पूछा तुम कौन हो। उसने उत्तर दिया : मैं धर्म हूँ। मैं शील के साथ ही निवास करता हूँ। इसलिए मुझे उनका अनुसरण करना है।
तीसरी आकृति उनके सामने आई। प्रह्लाद ने फिर पूछा कौन हो। उसने कहा मैं सत्य हूँ, मैं धर्म का अनुगामी हूँ। जहाँ धर्म है वही मैं हूँ। उसने भी प्रह्लाद के शरीर का त्याग कर दिया और ब्राह्मण के शरीर में प्रवेश किया। फिर वृत्ति उनके शरीर से प्रकट हुई उसने कहा :जहाँ सत्य है वहीं मैं हूँ। फिर एक आवाज के साथ नई आकृति निकली, उसने कहा मैं आत्म बल हूँ। जहाँ वृत्ति है वहीं मेरा वास है। फिर एक तेजस्वी देवी प्रगट हुई उसने कहा मैं श्री हूँ जहाँ यह सब शक्तियाँ रहती हैं वहीं पर मैं भी वास करती हूँ। हाथ मलते उदास प्रह्लाद ने देवी से पूछा हे देवी यह ब्राह्मण कौन है?
श्री ने कहा यह ब्राह्मण के रूप में इन्द्र था। उसने चतुरता से तुमसे तीनों लोकों का ऐश्वर्य लूट लिया है। जब आपने अपना शील छोड़ दिया तो इसका अर्थ यह है कि आपने अपना धर्म, सत्य, वृत्ति, आत्म बल सभी कुछ दे दिया क्योकि हम सब का बीज - शील है।
इसलिए ‘शील’ संस्कार की वृद्धि करनी चाहिए। मनुष्य को विपन्नता में या मुसीबत में भी अपने शील व आत्मिक गुणों संस्कारो का त्याग नहीं करना चाहिए। शील, विद्या, तप, दान, चरित्र, गुण एवं धर्म कर्तव्य से विहीन व्यक्ति पृथ्वी का भार है। वह मानव नहीं, पशु के समान है। मनुष्य के संस्कार ही उसका साथ सदैव देते हैं जन्मो के इस जीवन चक्र में; शेष सब व्यर्थ स्वपन समान है.
नैतिक सभ्य आचरण, गुणवत्त, आंतरिक संयम, स्वाभाविक रूप से प्रवृत्त, सगुणी प्रकृति व् संस्कारित मनुष्य के बीज गुण, सदाचार व् चरित्रवान आचरण के पालन से चित्त में शान्ति का अनुभव होता है, ऐसे सदाचार को शील कहते हैं. सामान्यतया आचरणमात्र को शील कहते हैं। चाहे वे अच्छे हों, चाहे बुरे, फिर भी रूढ़ि से सदाचार ही शील कहे जाते हैं किन्तु केवल सदाचार का पालन करना ही शील नहीं है, अपितु बुरे आचरण भी शील (दु:शील) हैं अच्छे और बुरे आचरण करने के मूल में जो उन आचरणों को करने को प्रेरणा देने वाली एक प्रकार की भीतरी शक्ति होती है, उसे सु-चेतना कहते हैं। वह चेतना ही वस्तुत: 'शील' है। लोकप्रिय भाषा में इसी शील के भंग होंने से चरित्र भंग होना कहा जाता है. उकसावे के बावजूद जो अपने संयम व् आचरण से अपने को दृढ़ रख सकता हो उसे ही सु-शील व् शील कहा जाता है.
कोई स्थिति या व्यक्ति उकसाए या हमें लालच दे या भय दिखाए यदि सयंम होगा तो हम उसका मुकाबला कर सकते हैं इस शक्ति को ही शील कहा जाता है. इसी शील गुण को तप से बनाया जाता है और जिसके लिए कई जन्मो के कर्म सम्मिलित होते हैं.
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2>ब्रह्मा, विष्णु और महेश का पिता कौन, जानिए.... त्रिदेव के पिता
भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश के संबंध और जनम के सम्बन्ध में हिन्दुओ और हिन्दू धर्म मैं भ्रम की स्थिति है। वे उनको ही सर्वोत्तम और स्वयंभू मानते हैं, लेकिन क्या यह सच है? क्या भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश का कोई पिता नहीं है? वेदों में लिखा है कि जो जन्मा या प्रकट है वह ईश्वर नहीं हो सकता। ईश्वर अजन्मा, अप्रकट, निराकार है।
हिन्दू ग्रन्थ शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म ही सत्य है वही अविकारी परमेश्वर है। जिस समय सृष्टि में अंधकार था। न जल, न अग्नि और न वायु था तब वही तत्सदब्रह्म ही था जिसे श्रुति में सत् कहा गया है। सत् अर्थात अविनाशी परमात्मा।
उस अविनाशी परब्रह्म काल ने कुछ काल के बाद द्वितीय की इच्छा प्रकट की। और उसके भीतर एक से अनेक होने का संकल्प उदित हुआ। तब उस निराकार परमात्मा ने अपनी लीला शक्ति से आकार की कल्पना की, जो मूर्ति रहित परम ब्रह्म है। परम ब्रह्म अर्थात एकाक्षर ब्रह्म। परम अक्षर ब्रह्म। और वह परम ब्रह्म भगवान सदाशिव है।
प्राचीन विद्वान और ग्रन्थ उन्हीं को ईश्वर कहते हैं। एकांकी रहकर स्वेच्छा से सभी ओर व दिशाओ मैं विहार करने वाले उस सदाशिव ने अपने शरीर से शक्ति की सृष्टि की, जो उनके अपने श्रीअंग से कभी अलग होने वाली नहीं थी। सदाशिव की उस पराशक्ति को प्रधान प्रकृति, गुणवती माया, बुद्धितत्व की जननी तथा विकाररहित बताया गया है।
वह शक्ति अम्बिका (पार्वती नहीं) कही गई है। उसको प्रकृति, सर्वेश्वरी, त्रिदेवजननी (ब्रह्मा, विष्णु और महेश की माता), नित्या मूल कारण भी कहते हैं। सदा शिव द्वारा प्रकट की गई उस शक्ति की 8 भुजाएं हैं। परा शक्ति जगत जननी वह देवी नाना प्रकार की गतियों से संपन्न है और अनेक प्रकार के अस्त्र शक्ति धारण करती है।
एकाकिनी होने पर भी माया शक्ति संयोगवशात अनेक हो जाती है। शक्ति की देवी ने ही लक्ष्मी, सावित्री और पार्वती के रूप में जन्म लिया और ब्रह्मा, विष्णु और महेश से विवाह किया था। तीन रूप होकर भी वह अकेली रह गई थी। उस कालरूप सदाशिव की अर्धांगिनी है दुर्गा।
उस काल रूपी ब्रह्म सदाशिव ने एक समय शक्ति के साथ 'शिवलोक' नामक क्षेत्र का निर्माण किया । उस उत्तम क्षेत्र को 'काशी' कहते हैं। वह आज मोक्ष का स्थान है। यहां शक्ति और शिव अर्थात कालरूपी ब्रह्म सदाशिव और दुर्गा यहां पति और पत्नी के रूप में निवास करते हैं।.
इस स्थान काशी पुरी को प्रलयकाल में भी शिव और शिवा ने अपने सान्निध्य से कभी मुक्त नहीं किया था। इस आनंदरूप वन में रमण करते हुए एक समय शिव को यह इच्छा उत्पन्न हुई कि किसी दूसरे पुरुष की सृष्टि करनी चाहिए, जिस पर सृष्टि निर्माण का कार्यभार रखकर हम निर्वाण धारण करें।
ऐसा निश्चय करके शक्ति सहित परमेश्वररूपी शिव ने अपने वामांग पर अमृत मल दिया। फिर वहां से एक पुरुष प्रकट हुआ। शिव ने उस पुरुष से संबोधित होकर कहा, 'वत्स! व्यापक होने के कारण तुम्हारा नाम 'विष्णु' विख्यात होगा।'
इस प्रकार विष्णु के माता और पिता कालरूपी सदाशिव और पराशक्ति दुर्गा हैं।
शिवपुराण के अनुसार ब्रह्माजी अपने पुत्र नारदजी से कहते हैं कि विष्णु को उत्पन्न करने के बाद सदाशिव और शक्ति ने पूर्ववत प्रयत्न करके मुझे (ब्रह्माजी) अपने दाहिने अंग से उत्पन्न किया और तुरंत ही मुझे विष्णु के नाभि कमल में डाल दिया। इस प्रकार उस कमल से पुत्र के रूप में मुझ हिरण्य गर्भ (ब्रह्मा) का जन्म हुआ।
मैंने (ब्रह्मा) उस कमल के सिवाय दूसरे किसी को अपने शरीर का जनक या पिता नहीं जाना। मैं कौन हूं, कहां से आया हूं, मेरा क्या कार्य है, मैं किसका पुत्र होकर उत्पन्न हुआ हूं किसने इस समय मेरा निर्माण किया है? इस प्रकार में संशय में पड़ा हूं.
इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र इन देवताओं में गुण हैं और सदाशिव गुणातीत माने गए हैं। एक बार ब्रह्मा विष्णु दोनों में सर्वोच्चता को लेकर लड़ाई हो गई, तो बीच में काल रूपी एक स्तंभ आकर खड़ा हो गया। तब दोनों ने पूछा- 'प्रभो, सृष्टि आदि 5 कर्तव्यों के लक्षण क्या हैं? यह हम दोनों को बताइए।'
ज्योतिर्लिंग रूप काल ने कहा- 'पुत्रो, तुम दोनों ने तपस्या करके मुझसे सृष्टि और स्थिति नामक दो कृत्य प्राप्त किए हैं। इसी प्रकार मेरे विभूतिस्वरूप रुद्र और महेश्वर ने दो अन्य उत्तम कृत्य संहार और तिरोभाव (अकृत्य) मुझसे प्राप्त किए हैं, परंतु अनुग्रह (कृपा करना) नामक दूसरा कोई कृत्य पा नहीं सकता। रुद्र और महेश्वर दोनों ही अपने कृत्य को भूले नहीं हैं इसलिए मैंने उनके लिए अपनी समानता प्रदान की है।'
सदाशिव कहते हैं- 'ये (रुद्र और महेश) मेरे जैसे ही वाहन रखते हैं, मेरे जैसा वेश धरते हैं और मेरे जैसे ही इनके पास हथियार हैं। वे रूप, वेश, वाहन, आसन और कृत्य में मेरे ही समान हैं।'
काल रूपी सदाशिव कहते हैं कि मैंने पूर्वकाल में अपने स्वरूपभूत मंत्र का उपदेश किया है, जो ओंकार के रूप में प्रसिद्ध है, क्योंकि सर्व प्रथम मेरे मुख से ओंकार अर्थात 'ॐ' प्रकट हुआ। ओंकार वाचक है, मैं वाच्य हूं और यह मंत्र मेरा स्वरूप ही है और यह मैं ही हूं। प्रति दिन ओंकार का स्मरण करने से मेरा ही सदा स्मरण होता है।
मेरे पश्चिमी मुख से अकार का, उत्तरवर्ती मुख से उकार का, दक्षिणवर्ती मुख से मकार का, पूर्ववर्ती मुख से विन्दु का तथा मध्यवर्ती मुख से नाद का प्राकट्य हुआ। यह 5 अवयवों से युक्त ओंकार का विस्तार हुआ।
अब यहां 7 आत्मा हो गईं- ब्रह्म से सदाशिव, सदाशिव से दुर्गा। सदा शिव दुर्गा से विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र, महेश्वर। इससे यह सिद्ध हुआ कि ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और महेश के जन्मदाता कालरूपी सदाशिव और दुर्गा हैं। ये बातें अन्य पुराणों में घुमा-फिराकर लिखी गई हैं और इसी कारण भ्रम की उत्पत्ति होती है।
भ्रम को छोड़कर सभी पुराण और वेदों को पढ़ने की चेष्टा करें तो असल में समझ में आएगा। मनगढ़ंत लोक मान्यता के आधार पर अधिकतर हिन्दू सच को नहीं जानते हैं।
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3>==भगवान विष्णु के लक्ष्मी जी पैर दबाते हुए का क्या अर्थ है?
आप ने कभी सोचा नहीं होगा कि भगवान विष्णु के ज्यादातर चित्र में शेषनाग के ऊपर आराम से लेटे और लक्ष्मीमाँ इनके पैर दबा रही है, कभी सोचा है भगवान विष्णु का यह रूप किस ओर का इशारा कर रहा है। इसके पीछे बहुत गहरा और गंभीर संदेश छिपा हुआ है। और इसको अगर हम अपना ले तो हमारा पारिवारिक और सामाजिक जीवन काफी हद तक अच्छा और ख़ुशी से भर जायेगा। आइए समझते हैं कि भगवान विष्णु का चित्र क्या सिखा रहा है?
सभी को पता है कि इस सृष्टि के तीन प्रमुख भगवान कौन हैं, यह तीन ब्रह्मा, विष्णु और शिव है। ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं, विष्णु इस रचना का संचालन और शिव संहार करते। विष्णु सृष्टि के संचालक है इसलिए हमारी हर जरुरत को पूरा करते हैं, व धर्म को स्थापित भी करते हैं, और धर्म पर अधर्म ज्यादा होने लगता है तो यह अवतार भी लेते हैं। यह क्षीर नामक सागर में रहते हैं, यह सारा संसार भी एक महासागर की तरह है, जिसमें सुख-दु:ख भरपूर है। और ये शेषनाग की शैय्या पर लेटे हुए हैं, गृहस्थी का जीवनकाल भी ऐसा होता है।
जो अपने घर का मुखिया होता है, उसके ऊपर कई सारी जिम्मेदारियां होती हैं, इसीकारण से शेषनाग के कई फन हैं। और फिर भी भगवान विष्णु का चेहरा मुस्कुराता रहता है, तथा यह सिखाता है कि हम चाहे कितनी ही जिम्मेदारियों से घिरे हुए हों, अपना धर्य कभी भी नहीं खोना चाहिए, मन में शांति बनाई रखनी चाहिए और अपना व्यवहार ऐसा रखो कि परिवार का एक भी सदस्य या व्यक्ति आपसे दूर न रह सके। लक्ष्मी जी भगवान विष्णु के पैरों में है और उनकी सेवा कर रही है।
यहां पर दो संदेश दिए गए हैं पहला है जो व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों का संचालन कुशलता पूर्वक करता है, और परिवार को प्रेम के बंधन में बांधे रखता है लक्ष्मी सदा ही उसके पैरों की सेवा में लगी हुई है। एवं दूसरा संदेश इसप्रकार समझो कि हमारे जीवन के अंदर परिवार और कर्तव्य का सबसे पहला स्थान है और लक्ष्मी का आखिरी स्थान, तब जाकर प्रेम में कभी लालच या मोह नहीं आएगा।
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4>=भगवान विष्णु ने मारा था शुक्राचार्य की माँ को, बदले की भावना में बने दैत्यगुरु!
शुक्राचार्य का नाम तो सबने सुना ही होगा, इतना सबको पता है की वो दैत्यों और राक्षसो के गुरु थे लेकिन ये कोई नही जानता होगा की वो कौन थे कान्हा से आये थे. आज उनका पूरा कच्चा चिटठा खोल देते है और आपको बताते है उनके ऋषि से दैत्यगुरु होने की कथा.
नवग्रहों में शुमार शुक्र ही शुक्राचार्य है, शुक्राचार्य ऋषियों में सर्वश्रेष्ठ भृगु ऋषि के पुत्र है भृगुऋषि जिन्हे धरती के सब ऋषियों ने तीनो देवो (ब्रह्मा विष्णु महेश) में कौन सर्वश्रेष्ठ है जांचने की जिम्मेदारी. ऐसे प्रतापित ऋषि का पुत्र होके भी शुक्राचार्य दैत्यों के गुरु कैसे बन गए?
बाद बहुत पुरानी है भृगु ऋषि की दो पत्निया थी पहली दक्ष की कन्या थी और दूसरी थी ख्याति जिनसे उन्हें पुत्र मिला शुक्राचार्य. शुक्रवार को जन्मे थे भृगु इसलिए उनके नाम पे ही शुक्र का नाम शुक्रवार पड़ा, पिता ने उन्हें ब्रह्मऋषि अंगरीशी के पास शिक्षा के लिए भेजा.
अंगरीशी ब्रह्मा के मानस पुत्रो में सर्वश्रेष्ठ थे, शुक्राचार्य के साथ उनके पुत्र बृहस्पति (जो बाद में देवो के गुरु बने) भी पढ़ते थे. शुक्राचार्य बृहस्पति की तुलना में काफी होशियार थे, लेकिन फिर भी बृहपति को पुत्र होने के चलते ज्यादा अच्छी तरह से शिक्षा नही मिली
ईर्ष्यावश वो वंहा से दीक्षा छोड़ के सनक ऋषियों और गौतम ऋषि से शिक्षा लेने लगे. इस दौरान उन्हें प्रेरणा मिली और जब बृहस्पति देवो के गुरु बने तो ईर्ष्या वष वो दैत्यों के गुरु बने. दैत्य देवो से नित हारते थे इसलिए उन्होंने (शुक्राचार्य) शिव को प्रसन्न कर संजीवनी मन्त्र (मरे हुए को जीवित करने का मन्त्र) हेतु तपस्या में बैठ गए.
लेकिन देवो ने मौके का फायदा उठा के दैत्यों का संघार आरम्भ कर दिया, शुक्राचार्य को तपस्या में जान दैत्य उनकी माता ख्याति की शरण में चले गए. ख्याति ने दैत्यों को शरण दी और जो भी देवता दैत्यों को मारने आता वो उसे मूर्छित कर देती या अपनी शक्ति से लकवाग्रस्त.
ऐसे में दैत्य बलशाली हो गए और धरती पर पाप बढ़ने लगा, धरती पे धर्म की स्थापना के लिए भगवान विष्णु ने शुक्राचार्य की माँ और भृगु ऋषि की पत्नी ख्याति का सुदर्शन चक्र से सर काट दैत्यों के संघार में देवो की और समूचे जगत की मदद की. इस्पे शुक्राचार्य को बेहद खेद हुआ और वो शिव की तपस्या में और कड़ाई से लग गए.
आखिर कार उन्होंने संजीवनी मन्त्र पाया और दैत्यों के राज्य को पुनः स्थापित कर अपनी माँ का बदला लिया, तब से शुक्राचार्य का भगवान विष्णु से छत्तीस का आंकड़ा हो गया और वो उनके शत्रु बन गए. भृगु ऋषि ने भगवान विष्णु को इस्पे श्राप दिया की तुम्हे बार बार पृथ्वी में जाके गर्भ में रह कष्ट भोगना पड़ेगा चूँकि उन्होंने एक स्त्री का वध किया.
उससे पहले भगवान प्रकट हो के ही अवतार लेते थे जैसे की वराह, मतस्य, कुर्मा और नरसिंघ लेकिन उसके बाद उन्होंने परशुराम राम कृष्ण बुद्ध रूप में जन्म लिया तो माँ के पेट में कोख में रहने की पीड़ा झेलनी पड़ी थी. बाद में शुक्राचार्य से बृहस्पति के पुत्र ने संजीवन विधा सिख उनका पतन किया. जय श्री हरी
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5>=सती ने सतीत्व से भगवान विष्णु को भी बना दिया पत्थर का बूत
तुलसी की पुरे भारत भर में पूजा होती है और उन्हें भगवान के भोग में चढ़ाया जाता है पर वो कौन है और उन्हें ये उपमा क्यों मिली जानिए हमारे साथ. तुलसी भगवान शिव और विष्णु की परम भक्त थी एक बार वो गणेश पर मोहित हो गई और उन्होंने उनसे शादी का प्रस्ताव रखा पर गणेश ने ब्रह्मचर्य का हवाला देकर प्रस्ताव ठुकरा दिया तब उन्होंने गणेश को दो शादिया होने का श्राप दिया और गणेश की ऋद्धि सिद्धि से शादी हुई. गणेश ने भी बदले में श्राप दिया की वो राक्षस कुल में जन्म लेगी और राक्षस की माँ बनेगी.
फलस्वरूप राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था। वृंदा बचपन से ही भगवान विष्णु जी की परम भक्त थी। बड़े ही प्रेम से भगवान की पूजा किया करती थी। जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया,जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था। वृंदा सती स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी।
एक बार देवो और दानवों में युद्ध हुआ, जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने जीत के लिए अनुष्ठान किया, और जब उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को ना जीत सके सारे देवता जब हारने लगे तो भगवान विष्णु जी के पास गए।
सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि-वृंदा मेरी परम भक्त है मैं उसके साथ छल नहीं कर सकता पर देवता बोले - भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते हैं। भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा और वृंदा के महल में पहुंच गए जैसे ही सती ने अपने पति को देखा, उन्होंने अनुष्ठान रोक दिया और उनके चरण छू लिए। जैसे ही उनका संकल्प टूटा, युद्ध में देवताओं ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काटकर अलग कर दिया। उनका सिर वृंदा के महल में गिरा जब सती ने देखा कि पति का सिर तो कटा पड़ा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है?
उन्होंने पूछा - आप कौन हैं जिसका स्पर्श मैंने किया,तब भगवान अपने रूप में आ गए पर वे निरुत्तर थे, वृंदा समझ गई। उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया आप (काले सालिग्राम) पत्थर के हो जाओ,भगवान तुंरत पत्थर के हो गए। सभी देवता हाहाकार करने लगे। लक्ष्मी जी रोने लगीं और प्राथना करने लगीं तब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे सती हो गई। उनके बरते शंखचूड़ भी बाद में शिव के हाथो मारे गए.
उनकी राख से एक पौधा निकला तब भगवान विष्णु जी ने कहा- आज से इनका नाम तुलसी है,और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जाएगा और मैं बिना तुलसी जी के प्रसाद स्वीकार नहीं करुंगा। तब से तुलसी जी की पूजा सभी करने लगे और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में किया जाता है। देवउठनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है।
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काल रूपी सदाशिव कहते हैं कि मैंने पूर्वकाल में अपने स्वरूपभूत मंत्र का उपदेश किया है, जो ओंकार के रूप में प्रसिद्ध है, क्योंकि सर्व प्रथम मेरे मुख से ओंकार अर्थात 'ॐ' प्रकट हुआ। ओंकार वाचक है, मैं वाच्य हूं और यह मंत्र मेरा स्वरूप ही है और यह मैं ही हूं। प्रति दिन ओंकार का स्मरण करने से मेरा ही सदा स्मरण होता है।
मेरे पश्चिमी मुख से अकार का, उत्तरवर्ती मुख से उकार का, दक्षिणवर्ती मुख से मकार का, पूर्ववर्ती मुख से विन्दु का तथा मध्यवर्ती मुख से नाद का प्राकट्य हुआ। यह 5 अवयवों से युक्त ओंकार का विस्तार हुआ।
अब यहां 7 आत्मा हो गईं- ब्रह्म से सदाशिव, सदाशिव से दुर्गा। सदा शिव दुर्गा से विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र, महेश्वर। इससे यह सिद्ध हुआ कि ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और महेश के जन्मदाता कालरूपी सदाशिव और दुर्गा हैं। ये बातें अन्य पुराणों में घुमा-फिराकर लिखी गई हैं और इसी कारण भ्रम की उत्पत्ति होती है।
भ्रम को छोड़कर सभी पुराण और वेदों को पढ़ने की चेष्टा करें तो असल में समझ में आएगा। मनगढ़ंत लोक मान्यता के आधार पर अधिकतर हिन्दू सच को नहीं जानते हैं।
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3>==भगवान विष्णु के लक्ष्मी जी पैर दबाते हुए का क्या अर्थ है?
आप ने कभी सोचा नहीं होगा कि भगवान विष्णु के ज्यादातर चित्र में शेषनाग के ऊपर आराम से लेटे और लक्ष्मीमाँ इनके पैर दबा रही है, कभी सोचा है भगवान विष्णु का यह रूप किस ओर का इशारा कर रहा है। इसके पीछे बहुत गहरा और गंभीर संदेश छिपा हुआ है। और इसको अगर हम अपना ले तो हमारा पारिवारिक और सामाजिक जीवन काफी हद तक अच्छा और ख़ुशी से भर जायेगा। आइए समझते हैं कि भगवान विष्णु का चित्र क्या सिखा रहा है?
सभी को पता है कि इस सृष्टि के तीन प्रमुख भगवान कौन हैं, यह तीन ब्रह्मा, विष्णु और शिव है। ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं, विष्णु इस रचना का संचालन और शिव संहार करते। विष्णु सृष्टि के संचालक है इसलिए हमारी हर जरुरत को पूरा करते हैं, व धर्म को स्थापित भी करते हैं, और धर्म पर अधर्म ज्यादा होने लगता है तो यह अवतार भी लेते हैं। यह क्षीर नामक सागर में रहते हैं, यह सारा संसार भी एक महासागर की तरह है, जिसमें सुख-दु:ख भरपूर है। और ये शेषनाग की शैय्या पर लेटे हुए हैं, गृहस्थी का जीवनकाल भी ऐसा होता है।
जो अपने घर का मुखिया होता है, उसके ऊपर कई सारी जिम्मेदारियां होती हैं, इसीकारण से शेषनाग के कई फन हैं। और फिर भी भगवान विष्णु का चेहरा मुस्कुराता रहता है, तथा यह सिखाता है कि हम चाहे कितनी ही जिम्मेदारियों से घिरे हुए हों, अपना धर्य कभी भी नहीं खोना चाहिए, मन में शांति बनाई रखनी चाहिए और अपना व्यवहार ऐसा रखो कि परिवार का एक भी सदस्य या व्यक्ति आपसे दूर न रह सके। लक्ष्मी जी भगवान विष्णु के पैरों में है और उनकी सेवा कर रही है।
यहां पर दो संदेश दिए गए हैं पहला है जो व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों का संचालन कुशलता पूर्वक करता है, और परिवार को प्रेम के बंधन में बांधे रखता है लक्ष्मी सदा ही उसके पैरों की सेवा में लगी हुई है। एवं दूसरा संदेश इसप्रकार समझो कि हमारे जीवन के अंदर परिवार और कर्तव्य का सबसे पहला स्थान है और लक्ष्मी का आखिरी स्थान, तब जाकर प्रेम में कभी लालच या मोह नहीं आएगा।
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4>=भगवान विष्णु ने मारा था शुक्राचार्य की माँ को, बदले की भावना में बने दैत्यगुरु!
शुक्राचार्य का नाम तो सबने सुना ही होगा, इतना सबको पता है की वो दैत्यों और राक्षसो के गुरु थे लेकिन ये कोई नही जानता होगा की वो कौन थे कान्हा से आये थे. आज उनका पूरा कच्चा चिटठा खोल देते है और आपको बताते है उनके ऋषि से दैत्यगुरु होने की कथा.
नवग्रहों में शुमार शुक्र ही शुक्राचार्य है, शुक्राचार्य ऋषियों में सर्वश्रेष्ठ भृगु ऋषि के पुत्र है भृगुऋषि जिन्हे धरती के सब ऋषियों ने तीनो देवो (ब्रह्मा विष्णु महेश) में कौन सर्वश्रेष्ठ है जांचने की जिम्मेदारी. ऐसे प्रतापित ऋषि का पुत्र होके भी शुक्राचार्य दैत्यों के गुरु कैसे बन गए?
बाद बहुत पुरानी है भृगु ऋषि की दो पत्निया थी पहली दक्ष की कन्या थी और दूसरी थी ख्याति जिनसे उन्हें पुत्र मिला शुक्राचार्य. शुक्रवार को जन्मे थे भृगु इसलिए उनके नाम पे ही शुक्र का नाम शुक्रवार पड़ा, पिता ने उन्हें ब्रह्मऋषि अंगरीशी के पास शिक्षा के लिए भेजा.
अंगरीशी ब्रह्मा के मानस पुत्रो में सर्वश्रेष्ठ थे, शुक्राचार्य के साथ उनके पुत्र बृहस्पति (जो बाद में देवो के गुरु बने) भी पढ़ते थे. शुक्राचार्य बृहस्पति की तुलना में काफी होशियार थे, लेकिन फिर भी बृहपति को पुत्र होने के चलते ज्यादा अच्छी तरह से शिक्षा नही मिली
ईर्ष्यावश वो वंहा से दीक्षा छोड़ के सनक ऋषियों और गौतम ऋषि से शिक्षा लेने लगे. इस दौरान उन्हें प्रेरणा मिली और जब बृहस्पति देवो के गुरु बने तो ईर्ष्या वष वो दैत्यों के गुरु बने. दैत्य देवो से नित हारते थे इसलिए उन्होंने (शुक्राचार्य) शिव को प्रसन्न कर संजीवनी मन्त्र (मरे हुए को जीवित करने का मन्त्र) हेतु तपस्या में बैठ गए.
लेकिन देवो ने मौके का फायदा उठा के दैत्यों का संघार आरम्भ कर दिया, शुक्राचार्य को तपस्या में जान दैत्य उनकी माता ख्याति की शरण में चले गए. ख्याति ने दैत्यों को शरण दी और जो भी देवता दैत्यों को मारने आता वो उसे मूर्छित कर देती या अपनी शक्ति से लकवाग्रस्त.
ऐसे में दैत्य बलशाली हो गए और धरती पर पाप बढ़ने लगा, धरती पे धर्म की स्थापना के लिए भगवान विष्णु ने शुक्राचार्य की माँ और भृगु ऋषि की पत्नी ख्याति का सुदर्शन चक्र से सर काट दैत्यों के संघार में देवो की और समूचे जगत की मदद की. इस्पे शुक्राचार्य को बेहद खेद हुआ और वो शिव की तपस्या में और कड़ाई से लग गए.
आखिर कार उन्होंने संजीवनी मन्त्र पाया और दैत्यों के राज्य को पुनः स्थापित कर अपनी माँ का बदला लिया, तब से शुक्राचार्य का भगवान विष्णु से छत्तीस का आंकड़ा हो गया और वो उनके शत्रु बन गए. भृगु ऋषि ने भगवान विष्णु को इस्पे श्राप दिया की तुम्हे बार बार पृथ्वी में जाके गर्भ में रह कष्ट भोगना पड़ेगा चूँकि उन्होंने एक स्त्री का वध किया.
उससे पहले भगवान प्रकट हो के ही अवतार लेते थे जैसे की वराह, मतस्य, कुर्मा और नरसिंघ लेकिन उसके बाद उन्होंने परशुराम राम कृष्ण बुद्ध रूप में जन्म लिया तो माँ के पेट में कोख में रहने की पीड़ा झेलनी पड़ी थी. बाद में शुक्राचार्य से बृहस्पति के पुत्र ने संजीवन विधा सिख उनका पतन किया. जय श्री हरी
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5>=सती ने सतीत्व से भगवान विष्णु को भी बना दिया पत्थर का बूत
तुलसी की पुरे भारत भर में पूजा होती है और उन्हें भगवान के भोग में चढ़ाया जाता है पर वो कौन है और उन्हें ये उपमा क्यों मिली जानिए हमारे साथ. तुलसी भगवान शिव और विष्णु की परम भक्त थी एक बार वो गणेश पर मोहित हो गई और उन्होंने उनसे शादी का प्रस्ताव रखा पर गणेश ने ब्रह्मचर्य का हवाला देकर प्रस्ताव ठुकरा दिया तब उन्होंने गणेश को दो शादिया होने का श्राप दिया और गणेश की ऋद्धि सिद्धि से शादी हुई. गणेश ने भी बदले में श्राप दिया की वो राक्षस कुल में जन्म लेगी और राक्षस की माँ बनेगी.
फलस्वरूप राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था। वृंदा बचपन से ही भगवान विष्णु जी की परम भक्त थी। बड़े ही प्रेम से भगवान की पूजा किया करती थी। जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया,जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था। वृंदा सती स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी।
एक बार देवो और दानवों में युद्ध हुआ, जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने जीत के लिए अनुष्ठान किया, और जब उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को ना जीत सके सारे देवता जब हारने लगे तो भगवान विष्णु जी के पास गए।
सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि-वृंदा मेरी परम भक्त है मैं उसके साथ छल नहीं कर सकता पर देवता बोले - भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते हैं। भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा और वृंदा के महल में पहुंच गए जैसे ही सती ने अपने पति को देखा, उन्होंने अनुष्ठान रोक दिया और उनके चरण छू लिए। जैसे ही उनका संकल्प टूटा, युद्ध में देवताओं ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काटकर अलग कर दिया। उनका सिर वृंदा के महल में गिरा जब सती ने देखा कि पति का सिर तो कटा पड़ा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है?
उन्होंने पूछा - आप कौन हैं जिसका स्पर्श मैंने किया,तब भगवान अपने रूप में आ गए पर वे निरुत्तर थे, वृंदा समझ गई। उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया आप (काले सालिग्राम) पत्थर के हो जाओ,भगवान तुंरत पत्थर के हो गए। सभी देवता हाहाकार करने लगे। लक्ष्मी जी रोने लगीं और प्राथना करने लगीं तब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे सती हो गई। उनके बरते शंखचूड़ भी बाद में शिव के हाथो मारे गए.
उनकी राख से एक पौधा निकला तब भगवान विष्णु जी ने कहा- आज से इनका नाम तुलसी है,और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जाएगा और मैं बिना तुलसी जी के प्रसाद स्वीकार नहीं करुंगा। तब से तुलसी जी की पूजा सभी करने लगे और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में किया जाता है। देवउठनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है।
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6>=तुलसी के दोहो से जुडी महाभारत की अनसुनी कहानिया
तुलसी नर का क्या बड़ा समय बड़ा बलवान, काबा लूटी गोपिया वही अर्जुन वाही बाण" इस दोहे से जुडी कहानी का अनुवाद हम करते है आप के लिए जो एक प्रेरक प्रसंग है.
महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया था, मथुरा नगरी पर मुस्लिम काल यमन ने हमला कर दिया था. जरासंध वध के बाद सुरक्षित लग रही मथुरा अब फिर खतरे में थी. वरदान पाये हुए काल यमन को कृष्ण बलराम मार नहीं सकते थे इसलिए वो बार बार बड़ी सेना लेके आक्रमण करता था. एक बार कृष्ण युद्ध में घायल हो गए तब अर्जुन ने उनसे मिलाने का फैसला किया. जब अर्जुन रस्ते में थे तो उन्हें नारद मुनि मिले और उन्होंने कहा की, जा रहे हो अर्जुन पर कृष्ण के घावों को छूना मत नहो तो तुम्हारी शक्ति क्षीण हो जाएगी.
अर्जुन दुविधा में कृष्ण के पास पहुंचा, कृष्ण ने अर्जुन को अपने सिरहाने बैठने बोला पर अर्जुन हिचकिचा रहा था. भगवान ने अर्जुन का संशय समझ लिया और सीधे अर्जुन से कहा की कोई बात नहीं अर्जुन तुम में घाव हाथ से मत चुना पर तुम्हानी कमान से तो इसे छू कर देख ही सकते हो. अर्जुन को बात समझ में आ गई और उसने कृष्णा के घाव देखने के लिए अपनी कमान का इस्तेमाल किया और जायजा लिया. अर्जुन ने गुस्से में युद्ध में उतरने की इच्छा जाहिर की तो कृष्ण ने मना कर दिया, और बताया की कैसे वर प्राप्त कालयमन उसके लिए खतरा हो सकता है.
कृष्ण ने अर्जुन से कहा की में घायल हूँ और मुझसे मिलने के लिए गोपिया आ रही है, तुम इतना करना की यमनो से उनकी रक्षा करना. अर्जुन ने घमंड में हाँ बोला और दहाड़ा उसे अपने बल पर घमंड हो चूका था. जब अगले दिन गोपिया कृष्ण से मिलने आई तो यमन लुटेरो ने उन्हें लुटने के लिए घेर लिया. अर्जुन तैनात था पर उसके लाख चाहने पर भी वो उनका कुछ ना बिगाड़ सका.
कमान घावों पर लगाने से वो मन्त्र भूल गया और निशक्त हो गया, लुटेरो ने गोपियों को लूट लिया. अर्जुन शर्मिंदा था, कृष्णा से नजर मिलाने की उसकी हिम्मत नहीं हुई. उसे भी समझ में आ गया की महाभारत के युद्ध में ताकत मेरी नहीं समय की थी. समय ही व्यक्ति को सर्वश्रेष्ठ और कमजोर बनता है. तुलसीदास अंतर्यामी थे इस कारण उन्हें ये कथा मालूम थी जिसपे उन्होंने ये दोहा लिखा जो बहुत सम्मानित हुआ
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7>=तुलसी के पौधों के बारे में चली आ रही परम्पराओ के ये है वैज्ञानिक कारण!
तुलसी के पौधे के बारे में ढेरो परम्पराए (मैिथस) चली आ रही है जिन्हे हम सही मान कर आज भी जारी रखे हुए है, जैसे की तुलसी को दांतो से मत चबाओ, रविवार के दिन तुलसी से पूछ के तोड़ो या द्वादशी के दिन तुलसी मत तोड़ो फ्ला फ्ला.. लेकिन क्या असल में इसके कोई मायने है?
आज बात करेंगे इन्ही परम्पराओ के वैज्ञानिक और परुानिक मान्यताओ पे, जो की साबित करती है की क्या सही है और क्यों है? तुलसी को छूने भर और पास से निकलने तक ई मनाही की भी बात होती है वोभी करेंगे, लेकिन सबसे पहले जान ले की तुलसी कौन है और क्यों है?
जालंधर असुर को मरने के लिए सती वृंदा की पूजा तोड़नी जरुरी थी जिसके लिए विष्णु जी जालंधर का रूप धार वृंदा के महल में पहुंचे. जैसे ह वृंदा उठी और उन्हें अपना पति समझ प्रणाम किया उसका सतीत्व भंग हुआ और जालंधर का शिव ने वध किया, लेकिन तब सती वृंदा ने विष्णु जी को पत्थर का कर दिया.
लक्ष्मी जी की विनती के बाद वृंदा ने अपना श्राप वापिस लिया लेकिन तब से विष्णु जी वृंदा के पति के रूप में पत्थर स्वरुप पूजे जाते है, वृंदा सती हुई तो उसकी राख की जगह तुलसी का पौधा उगा जो की आज भी उसी के रूप में और विष्णु पत्नी के रूप में पूजा जाता है, लोग दोनों के विवाह को मान्यता देते है.
अब बात करें परम्पराओ की तो तुलसी के पते में पारा बहुत ज्यादा मात्र में होता है जिसके दांतो से खाने से आपके दांत जल्दी कमजोर होके, काले भी होके टूट जाने का खतरा पैदा हो जाता है. इसलिए इसे निगला जाता है न की चबाया, वंही इसे इतवार को पूछ के तोड़ने और द्वादशी को न तोड़ने के पीछे भी पौराणिक तथ्य है.
तुलसी (वृंदा) के बारे में मान्यता है की वो द्वादशी के दिन उपवास रखती थी, इस लिए उस दिन वो भूखे पेट रहती है ऐसे में उसे परेशान न किया जाये ये सोच है जो की पौराणिक है. वंही इतवार के दिन पूछ के तोड़ने के पीछे शायद इसे बचाये जाने की प्रासंगिकता रही होगी.
महिलाओ के तुलसी न तोड़ने या पास से न गुजरने के पीछे वैज्ञानिक तथ्य है, महिलाओ में मासिकी होने के कारण उनके शरीर में ज्यादा ताप होता है. इसके चलते तुलसी का पौधा सुख कर मुरझा सकता है, इसी कारन महिलाये उस दौरान विशेष कर तुलसी के आसपास भी नही दिखती है.
तुसली एक आयुर्वेदिक औषधि भी है जो की मधुमेह, सरदर्द, अपचय, किडनी पथरी, त्वचा के रोगो, एंटी डैंड्रफ और एंटी कैंसर भी होतीं है. तो आज ही अगर नही है तो घर में लगाये तुलसी का पौधा और गिनते जाइये इसके फायदे...
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8>=भगवान गणेश को क्यों नही चढ़ाई जाती है तुलसी?
भगवान गणेश को उनके पिता महादेव ने अपने ही पुत्र की हत्या के एवज में प्रथम पूजनीय होने का वरदान मिला था, हालाँकि गनेश वध के पीछे एक असुर को मारने का प्रयोजन भी था. तब से उनकी सबसे पहले पूजा होती है बाकि की बाद में लेकिन गणेश को भोग लगते समय उसपे तुलसी नही छढती है जबकि बाकि देवो में तुलसी के बिना भोग नही लगता है.
आप हमेशा से ही इस परंपरा को निभाते आये होंगे या अपने अपने बड़ो को ऐसा करते देखा होगा लेकिन कभी आपने उनसे इसका कारण न पूछा होगा. आज के बाद आप उनसे ये कारण पूछे शायद उन्हें भी न मालूम हो लेकिन आज से आपको पता हो जायेगा.
भगवान गणेश बालब्रह्मचारी थे और उनका शादी का कोई इरादा नही था लेकिन एक दिन वृंदा नाम की एक दक्ष कन्या ने उन्हें देखा और उनपे मोहित हो गई. लगे हाथो ही उसने गणेश जी से विवाह की इच्छा जता दी जिसे गणेश ने अपने ब्रह्मचारी होने के चलते सिरे से ख़ारिज कर दिया, इस पर वृंदा ने गणेश को एक नहीं बल्कि दो शादिया होने का श्राप दे डाला.
लेकिन तब गणेश ने भी उसके ऐसे श्राप पर वृंदा को श्राप दिया की उसकी शादी एक असुर से होगी, तब गणेश की शादी ऋद्धि सिद्दी से हुई और वृंदा की शादी जालंधर नाम के असुर से. जालंधर को मारने के लिए विष्णु ने जी जालंधर का रूप धरा और वृंदा का सतीत्व भंग किया.
तब वृन्दा अपने पति के साथ सती हो गई और उसकी चिता के स्थान पर तुलसी के पौधे उगे जिनसे विष्णु के पत्थर रूपी रूप शालिग्राम का विवाह किया जाता है. तब से वृंदा तुलसी हो गई और वृंदा और गणेश जी के बीच में वैर होने से तुलसी गणेश जी को अर्पित नही होती है ऐसा करने से लम्बोदर रुष्ट हो सकते है.
रुष्ट इसलिए क्योंकि वो तुलसी ही थी जिसने गणेश के ब्रह्मचर्य का व्रत टूटने के लिए श्राप दिया था, श्रीगणेश को दूर्वा यानि घास चढ़ाई जाती है जो की उन्हें एक बूटी के रूप दुर्वासा ने दी थी
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तुलसी नर का क्या बड़ा समय बड़ा बलवान, काबा लूटी गोपिया वही अर्जुन वाही बाण" इस दोहे से जुडी कहानी का अनुवाद हम करते है आप के लिए जो एक प्रेरक प्रसंग है.
महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया था, मथुरा नगरी पर मुस्लिम काल यमन ने हमला कर दिया था. जरासंध वध के बाद सुरक्षित लग रही मथुरा अब फिर खतरे में थी. वरदान पाये हुए काल यमन को कृष्ण बलराम मार नहीं सकते थे इसलिए वो बार बार बड़ी सेना लेके आक्रमण करता था. एक बार कृष्ण युद्ध में घायल हो गए तब अर्जुन ने उनसे मिलाने का फैसला किया. जब अर्जुन रस्ते में थे तो उन्हें नारद मुनि मिले और उन्होंने कहा की, जा रहे हो अर्जुन पर कृष्ण के घावों को छूना मत नहो तो तुम्हारी शक्ति क्षीण हो जाएगी.
अर्जुन दुविधा में कृष्ण के पास पहुंचा, कृष्ण ने अर्जुन को अपने सिरहाने बैठने बोला पर अर्जुन हिचकिचा रहा था. भगवान ने अर्जुन का संशय समझ लिया और सीधे अर्जुन से कहा की कोई बात नहीं अर्जुन तुम में घाव हाथ से मत चुना पर तुम्हानी कमान से तो इसे छू कर देख ही सकते हो. अर्जुन को बात समझ में आ गई और उसने कृष्णा के घाव देखने के लिए अपनी कमान का इस्तेमाल किया और जायजा लिया. अर्जुन ने गुस्से में युद्ध में उतरने की इच्छा जाहिर की तो कृष्ण ने मना कर दिया, और बताया की कैसे वर प्राप्त कालयमन उसके लिए खतरा हो सकता है.
कृष्ण ने अर्जुन से कहा की में घायल हूँ और मुझसे मिलने के लिए गोपिया आ रही है, तुम इतना करना की यमनो से उनकी रक्षा करना. अर्जुन ने घमंड में हाँ बोला और दहाड़ा उसे अपने बल पर घमंड हो चूका था. जब अगले दिन गोपिया कृष्ण से मिलने आई तो यमन लुटेरो ने उन्हें लुटने के लिए घेर लिया. अर्जुन तैनात था पर उसके लाख चाहने पर भी वो उनका कुछ ना बिगाड़ सका.
कमान घावों पर लगाने से वो मन्त्र भूल गया और निशक्त हो गया, लुटेरो ने गोपियों को लूट लिया. अर्जुन शर्मिंदा था, कृष्णा से नजर मिलाने की उसकी हिम्मत नहीं हुई. उसे भी समझ में आ गया की महाभारत के युद्ध में ताकत मेरी नहीं समय की थी. समय ही व्यक्ति को सर्वश्रेष्ठ और कमजोर बनता है. तुलसीदास अंतर्यामी थे इस कारण उन्हें ये कथा मालूम थी जिसपे उन्होंने ये दोहा लिखा जो बहुत सम्मानित हुआ
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7>=तुलसी के पौधों के बारे में चली आ रही परम्पराओ के ये है वैज्ञानिक कारण!
तुलसी के पौधे के बारे में ढेरो परम्पराए (मैिथस) चली आ रही है जिन्हे हम सही मान कर आज भी जारी रखे हुए है, जैसे की तुलसी को दांतो से मत चबाओ, रविवार के दिन तुलसी से पूछ के तोड़ो या द्वादशी के दिन तुलसी मत तोड़ो फ्ला फ्ला.. लेकिन क्या असल में इसके कोई मायने है?
आज बात करेंगे इन्ही परम्पराओ के वैज्ञानिक और परुानिक मान्यताओ पे, जो की साबित करती है की क्या सही है और क्यों है? तुलसी को छूने भर और पास से निकलने तक ई मनाही की भी बात होती है वोभी करेंगे, लेकिन सबसे पहले जान ले की तुलसी कौन है और क्यों है?
जालंधर असुर को मरने के लिए सती वृंदा की पूजा तोड़नी जरुरी थी जिसके लिए विष्णु जी जालंधर का रूप धार वृंदा के महल में पहुंचे. जैसे ह वृंदा उठी और उन्हें अपना पति समझ प्रणाम किया उसका सतीत्व भंग हुआ और जालंधर का शिव ने वध किया, लेकिन तब सती वृंदा ने विष्णु जी को पत्थर का कर दिया.
लक्ष्मी जी की विनती के बाद वृंदा ने अपना श्राप वापिस लिया लेकिन तब से विष्णु जी वृंदा के पति के रूप में पत्थर स्वरुप पूजे जाते है, वृंदा सती हुई तो उसकी राख की जगह तुलसी का पौधा उगा जो की आज भी उसी के रूप में और विष्णु पत्नी के रूप में पूजा जाता है, लोग दोनों के विवाह को मान्यता देते है.
अब बात करें परम्पराओ की तो तुलसी के पते में पारा बहुत ज्यादा मात्र में होता है जिसके दांतो से खाने से आपके दांत जल्दी कमजोर होके, काले भी होके टूट जाने का खतरा पैदा हो जाता है. इसलिए इसे निगला जाता है न की चबाया, वंही इसे इतवार को पूछ के तोड़ने और द्वादशी को न तोड़ने के पीछे भी पौराणिक तथ्य है.
तुलसी (वृंदा) के बारे में मान्यता है की वो द्वादशी के दिन उपवास रखती थी, इस लिए उस दिन वो भूखे पेट रहती है ऐसे में उसे परेशान न किया जाये ये सोच है जो की पौराणिक है. वंही इतवार के दिन पूछ के तोड़ने के पीछे शायद इसे बचाये जाने की प्रासंगिकता रही होगी.
महिलाओ के तुलसी न तोड़ने या पास से न गुजरने के पीछे वैज्ञानिक तथ्य है, महिलाओ में मासिकी होने के कारण उनके शरीर में ज्यादा ताप होता है. इसके चलते तुलसी का पौधा सुख कर मुरझा सकता है, इसी कारन महिलाये उस दौरान विशेष कर तुलसी के आसपास भी नही दिखती है.
तुसली एक आयुर्वेदिक औषधि भी है जो की मधुमेह, सरदर्द, अपचय, किडनी पथरी, त्वचा के रोगो, एंटी डैंड्रफ और एंटी कैंसर भी होतीं है. तो आज ही अगर नही है तो घर में लगाये तुलसी का पौधा और गिनते जाइये इसके फायदे...
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8>=भगवान गणेश को क्यों नही चढ़ाई जाती है तुलसी?
भगवान गणेश को उनके पिता महादेव ने अपने ही पुत्र की हत्या के एवज में प्रथम पूजनीय होने का वरदान मिला था, हालाँकि गनेश वध के पीछे एक असुर को मारने का प्रयोजन भी था. तब से उनकी सबसे पहले पूजा होती है बाकि की बाद में लेकिन गणेश को भोग लगते समय उसपे तुलसी नही छढती है जबकि बाकि देवो में तुलसी के बिना भोग नही लगता है.
आप हमेशा से ही इस परंपरा को निभाते आये होंगे या अपने अपने बड़ो को ऐसा करते देखा होगा लेकिन कभी आपने उनसे इसका कारण न पूछा होगा. आज के बाद आप उनसे ये कारण पूछे शायद उन्हें भी न मालूम हो लेकिन आज से आपको पता हो जायेगा.
भगवान गणेश बालब्रह्मचारी थे और उनका शादी का कोई इरादा नही था लेकिन एक दिन वृंदा नाम की एक दक्ष कन्या ने उन्हें देखा और उनपे मोहित हो गई. लगे हाथो ही उसने गणेश जी से विवाह की इच्छा जता दी जिसे गणेश ने अपने ब्रह्मचारी होने के चलते सिरे से ख़ारिज कर दिया, इस पर वृंदा ने गणेश को एक नहीं बल्कि दो शादिया होने का श्राप दे डाला.
लेकिन तब गणेश ने भी उसके ऐसे श्राप पर वृंदा को श्राप दिया की उसकी शादी एक असुर से होगी, तब गणेश की शादी ऋद्धि सिद्दी से हुई और वृंदा की शादी जालंधर नाम के असुर से. जालंधर को मारने के लिए विष्णु ने जी जालंधर का रूप धरा और वृंदा का सतीत्व भंग किया.
तब वृन्दा अपने पति के साथ सती हो गई और उसकी चिता के स्थान पर तुलसी के पौधे उगे जिनसे विष्णु के पत्थर रूपी रूप शालिग्राम का विवाह किया जाता है. तब से वृंदा तुलसी हो गई और वृंदा और गणेश जी के बीच में वैर होने से तुलसी गणेश जी को अर्पित नही होती है ऐसा करने से लम्बोदर रुष्ट हो सकते है.
रुष्ट इसलिए क्योंकि वो तुलसी ही थी जिसने गणेश के ब्रह्मचर्य का व्रत टूटने के लिए श्राप दिया था, श्रीगणेश को दूर्वा यानि घास चढ़ाई जाती है जो की उन्हें एक बूटी के रूप दुर्वासा ने दी थी
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