Wednesday, May 8, 2019

14>অমরনাথ ধামের কথা।

14>অমরনাথ ধামের কথা

अमरनाथ धाम से जुडी शिव-पार्वती कथा

 Hindi Story of Amarnath Dham : एक बार देवी पार्वती ने देवों के देव महादेव से पूछा, ऐसा क्यों है कि आप अजर हैं, अमर हैं लेकिन मुझे हर जन्म के बाद नए स्वरूप में आकर, फिर से बरसों तप के बाद आपको प्राप्त करना होता है । जब मुझे आपको पाना है तो मेरी तपस्या और इतनी कठिन परीक्षा क्यों? आपके कंठ में पडी़ नरमुंड माला और अमर होने के रहस्य क्या

महादेव ने पहले तो देवी पार्वती के उन सवालों का जवाब देना उचित नहीं समझा, लेकिन पत्नीहठ के कारण कुछ गूढ़ रहस्य उन्हें बताने पडे़। शिव महापुराण में मृत्यु से लेकर अजर-अमर तक के कर्इ प्रसंंग हैं, जिनमें एक साधना से जुडी अमरकथा बडी रोचक है। जिसे भक्तजन अमरत्व की कथा के रूप में जानते हैं।

हर वर्ष हिम के आलय (हिमालय) में अमरनाथ, कैलाश और मानसरोवर तीर्थस्थलों में लाखों श्रद्घालु पहुंचते हैं। सैकडों किमी की पैदल यात्रा करते हैं, क्यों? यह विश्वास यूं ही नहीं उपजा। शिव के प्रिय अधिकमास, अथवा आषाढ़ पूर्णिमा से श्रावण मास तक की पूर्णिमा के बीच अमरनाथ की यात्रा भक्तों को खुद से जुडे रहस्यों के कारण और प्रासंगिक लगती है।

पौराणिक मान्याताओं के अनुसार, अमरनाथ की गुफा ही वह स्थान है जहां भगवान शिव ने पार्वती को अमर होने के गुप्त रहस्य बतलाए थे, उस दौरान उन ‘दो ज्योतियों’ के अलवा तीसरा वहां कोर्इ प्राणी नहीं था । न महादेव का नंदी और नही उनका नाग, न सिर पे गंगा और न ही गनपति, कार्तिकेय….!

सबसे पहले नंदी को पहलगाम पर छोड़ा महादेव ने
गुप्त स्थान की तलाश में महादेव ने अपने वाहन नंदी को सबसे पहले छोड़ा, नंदी जिस जगह पर छूटा, उसे ही पहलगाम कहा जाने लगा। अमरनाथ यात्रा यहीं से शुरू होती है। यहां से थोडा़ आगे चलने पर शिवजी ने अपनी जटाओं से चंद्रमा को अलग कर दिया, जिस जगह ऐसा किया वह चंदनवाडी कहलाती है। इसके बादगंगा जी को पंचतरणी में और कंठाभूषण सर्पों को शेषनाग पर छोड़ दिया, इस प्रकार इस पड़ाव का नाम शेषनाग पड़ा।

अगले पड़ाव पर गणेश छूटे
अमरनाथ यात्रा में पहलगाम के बाद अगला पडा़व है गणेश टॉप, मान्यता है कि इसी स्थान पर महादेव ने पुत्र गणेश को छोड़ा। इस जगह को महागुणा का पर्वत भी कहते हैं। इसके बाद महादेव ने जहां पिस्सू नामक कीडे़ को त्यागा, वह जगह पिस्सू घाटी है।

.. और शुरू हुर्इ शिव-पार्वती की कथा
इस प्रकार महादेव ने अपने पीछे जीवनदायिनी पांचों तत्वों को स्वंय से अलग किया। इसके पश्चात् पार्वती संग एक गुफा में महादेव ने प्रवेश किया। कोर्इ तीसरा प्राणी, यानी कोर्इ कोई व्यक्ति, पशु या पक्षी गुफा के अंदर घुस कथा को न सुन सके इसलिए उन्होंने चारों ओर अग्नि प्रज्जवलित कर दी। फिर महादेव ने जीवन के गूढ़ रहस्य की कथा शुरू कर दी।

कथा सुनते-सुनते सो गर्इं पार्वती, कबूतरों ने सुनी
कहा जाता है कि कथा सुनते-सुनते देवी पार्वती को नींद आ गर्इ, वह सो गर्इं और महादेव को यह पता नहीं चला, वह सुनाते रहे। यह कथा इस समय दो सफेद कबूतर सुन रहे थे और बीच-बीच में गूं-गूं की आवाज निकाल रहे थे। महादेव को लगा कि पार्वती मुझे सुन रही हैं और बीच-बीच में हुंकार भर रही हैं। चूंकि वैसे भी भोले अपने में मग्न थे तो सुनाने के अलावा ध्यान कबूतरों पर नहीं गया।

वे कबूतर अमर हुए और अब गुफा में होते हैं उनके दर्शन
दोनों कबूतर सुनते रहे, जब कथा समाप्त होने पर महादेव का ध्यान पार्वती पर गया तो उन्हें पता चला कि वे तो सो रही हैं। तो कथा सुन कौन रहा था? उनकी दृष्टि तब दो कबूतरों पर पड़ी तो महादेव को क्रोध आ गया। वहीं कबूतर का जोड़ा उनकी शरण में आ गया और बोला, भगवन् हमने आपसे अमरकथा सुनी है। यदि आप हमें मार देंगे तो यह कथा झूठी हो जाएगी, हमें पथ प्रदान करें। इस पर महादेव ने उन्हें वर दिया कि तुम सदैव इस स्थान पर शिव व पार्वती के प्रतीक चिह्न में निवास करोगे। अंतत: कबूतर का यह जोड़ा अमर हो गया और यह गुफा अमरकथा की साक्षी हो गर्इ। इस तरह इस स्थान का नाम अमरनाथ पड़ा।

मान्यता है कि आज इन दो कबूतरों के दर्शन भक्तों को होते हैं। अमरनाथ गुफा में यह भी प्रकृति का ही चमत्कार है कि शिव की पूजा वाले विशेष दिनों में बर्फ के शिवलिंग अपना आकार ले लेते हैं। यहां मौजूद शिवलिंग किसी आश्चर्य से कम नहीं है। पवित्र गुफा में एक ओर मां पार्वती और श्रीगणेश के भी अलग से बर्फ से निर्मित प्रतिरूपों के भी दर्शन किए जा सकते हैं।
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13>সুদর্শন চক্র ।



সুদর্শন চক্র --( RK 12/20)

Sudarshan chakra story : भगवान शिव ने ही दिया था विष्णु को सुदर्शन चक्र, जानिए पुराणों में वर्णित एक रोचक कथा
Sudarshan chakra story in Hindi : भगवान शिव व विष्णु से जुड़ी अनेक कथाएं हमारे धर्म ग्रंथों में मिलती है। ऐसी ही एक रोचक कथा कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी से भी जुड़ी है। इस दिन बैकुंठ चतुर्दशी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु व शिव की पूजा करने का विधान है। पुराणों में इस व्रत से जुड़ी जो कथा है, जो इस प्रकार है।

पौराणिक कथा

एक बार भगवान विष्णु, शिवजी का पूजन करने के लिए काशी आए। यहां मणिकार्णिका घाट पर स्नान करके उन्होंने एक हजार स्वर्ण कमल फूलों से भगवान शिव की पूजा का संकल्प लिया। अभिषेक के बाद जब भगवान विष्णु पूजन करने लगे तो शिवजी ने उनकी भक्ति की परीक्षा लेने के लिए एक कमल का फूल कम कर दिया। भगवान विष्णु को अपने संकल्प की पूर्ति के लिए एक हजार कमल के फूल चढ़ाने थे।

एक पुष्प की कमी देखकर उन्होंने सोचा कि मेरी आंखें ही कमल के समान हैं इसलिए मुझे कमलनयन और पुण्डरीकाक्ष कहा जाता है। एक कमल के फूल के स्थान पर मैं अपनी आँख ही चढ़ा देता हूं। ऐसा सोचकर भगवान विष्णु जैसे ही अपनी आँख भगवान शिव को चढ़ाने के लिए तैयार हुए, वैसे ही शिवजी प्रकट होकर बोले- हे विष्णु। तुम्हारे समान संसार में कोई दूसरा मेरा भक्त नहीं है।

आज की यह कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी अब से बैंकुठ चतुर्दशी के नाम से जानी जाएगी। इस दिन व्रत पूर्वक जो पहले आपका और बाद में मेरा पूजन करेगा और बैकुंठ लोक की प्राप्ति होगी। तब प्रसन्न होकर शिवजी ने भगवान विष्णु को सुदर्शन चक्र भी प्रदान किया और कहा कि यह चक्र राक्षसों का विनाश करने वाला होगा। तीनों लोकों में इसकी बराबरी करने वाला कोई अस्त्र नहीं होगा।

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12>অর্জুন ,অস্ত্র উঠিয়েছিলেন যুধিষ্ঠিরকে মারবার জন্য।



12>মহাভারতে অর্জুন ,অস্ত্র উঠিয়েছিলেন যুধিষ্ঠিরকে মারবার জন্য। *****


  
महाभारत काल की यह कथा हमें वह समय याद कराती है जब कुरुक्षेत्र युद्ध चल रहा था। यह युद्ध का 17वां दिन था और राजकुमार युधिष्ठिर तथा कर्ण के बीच युद्ध हो रहा था। सभी को इस युद्ध से बेहद उम्मीदें थीं कि तभी शस्त्र विद्या में माहिर रहे कर्ण ने युधिष्ठिर पर एक ज़ोरदार वार किया।

एक के बाद एक करके कर्ण के सभी वार युधिष्ठिर पर भारी पड़ते गए और वह बुरी तरह से घायल हो गया। अब कर्ण के पास एक मौका था कि वह युधिष्ठिर को मारकर पाण्डवों की नींव हिलाकर रख दे, लेकिन उसने यह मौका हाथ से जाने दिया। आखिर क्यों?

कर्ण ने युधिष्ठिर पर सिर्फ इसलिए वार नहीं किया क्योंकि उसने पांडवों की माता कुंती को यह वचन दिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह उनके किसी भी पुत्र को जान से नहीं मारेगा। और यही कारण था कि ना चाहते हुए भी कर्ण ने युधिष्ठिर को जीवित ही जाने दिया।

जब अनुज नकुल तथा सहदेव ने अपने ज्येष्ठ भ्राता राजकुमार युधिष्ठिर की यह हालत देखी तो शीघ्र ही उन्हें तंबू में ले गए, जहां उनकी मरहम-पट्टी के सभी इंतज़ाम किए गए। जब तीनों भाई तंबू में थे तो बाकी दो भाई अर्जुन तथा भीम अभी भी युद्ध में शत्रुओं की सेना से संघर्ष कर रहे थे।

अचानक ही अर्जुन को राजकुमार युधिष्ठिर की अनुपस्थिति का एहसास हुआ और उन्होंने भीम से इस बारे में पूछताछ की। तब भीम ने बताया कि किस तरह से कर्ण तथा युधिष्ठिर के बीच हुए द्वंद युद्ध में भ्राता युधिष्ठिर घायल हो गए, जिसके बाद उन्हें विश्राम करने के लिए ले जाया गया है।

तभी भीम ने अर्जुन से कहा कि वह शत्रुओं को अकेले ही संभाल लेंगे और अर्जुन से आग्रह किया कि वे भ्राता युधिष्ठिर के पास जाएं और उनके स्वास्थ्य का ब्योरा लें। आज्ञानुसार राजकुमार अर्जुन उस तंबू की ओर चले दिए, जहां युधिष्ठिर घायल आवस्था में पीड़ा से जूझ रहे थे।

तंबू में लेटे हुए युधिष्ठिर ने अचानक ही अपने अनुज को अपनी ओर आते हुए देखा। अर्जुन को देख उनकी खुशी का ठिकाना ना रहा। वह समझ गए कि हो ना हो अर्जुन युद्ध में कर्ण पर विजय प्राप्त कर उनके पास खुशखबरी लेकर आ रहे हैं।

वह अंदर ही अंदर बेहद गर्व महसूस कर रहे थे कि उनकी इस हालत के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को उनके अनुज ने दंड दे दिया है और अवश्य ही अर्जुन ने कर्ण को मार दिया होगा। लेकिन युधिष्ठिर सत्य से अनजान थे।

तंबू में प्रवेश करते ही अर्जुन ने ज्येष्ठ भ्राता को प्रणाम किया और उनसे उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछा। लेकिन इससे ज्यादा तो युधिष्ठिर इस बात को सुनने के लिए ज्यादा उत्तेजित हो रहे थे कि अर्जुन ने कर्ण को मारा या नहीं। लेकिन तभी राजकुमार अर्जुन द्वारा वहां आने का असली कारण व्यक्त किया गया।

उन्होंने बताया कि कैसे भीम ने युधिष्ठिर के घायल होने की खबर सुनाई जिसके बाद वह दौड़े-दौड़े उनकी स्थिति का ब्योरा लेने आ गए। अर्जुन के मुख से सच्चाई सुनते ही युधिष्ठिर अपना आपा खो बैठे। वह सच उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचा रहा था।

उन्हें ऐसा महसूस हुआ मानो कोई उनके सम्मान को तीर के समान चीरता हुआ जा रहा हो। वे बेहद क्रोधित हो उठे और बोले, “तुम यहां केवल मेरे घावों के बारे में पूछने आए हो या फिर उन्हें और कुरेदने आए हो? तुम किस प्रकार के अनुज हो जो अब तक अपने ज्येष्ठ भ्राता के अपमान का बदला नहीं ले सके।“

युधिष्ठिर के इन कटु वचनों को सुनकर अर्जुन बेहद शर्मिंदा महसूस कर रहे थे, लेकिन युधिष्ठिर का क्रोध शांत नहीं हो रहा था। वे आगे बोले, “यदि तुम मेरे लिए इतना भी करने में असमर्थ हो तो तुम्हारे इस गांडीव अस्त्र का कोई लाभ नहीं है। उतार कर फेंक दो इसे।“

अपने प्रिय गांडीव अस्त्र की निंदा सुनते ही अर्जुन के मुख पर निराशा वाले भाव पल में ही क्रोध के साथ बदल गए। वह संसार में किसी से भी किसी भी प्रकार की निंदा सुन सकते थे, लेकिन उनके गांडीव के बारे में कोई एक भी अपशब्द बोले, यह उन्हें बर्दाश्त नहीं था।

दरअसल यह अर्जुन द्वारा लिए गए एक वचन का हिस्सा था, जिसके अनुसार कोई भी अपना या पराया व्यक्ति यदि उनके पवित्र एवं प्रिय गांडीव अस्त्र के बारे में बुरे वचन बोलेगा, तो वह उसका सिर कलम कर देंगे। यही कारण था कि युधिष्ठिर द्वारा गांडीव की निंदा करते ही अर्जुन ने अगले ही पल अपना गांडीव उठाया और क्रोध भरी आंखों से युधिष्ठिर को मारने के लिए आगे बढ़े।

तभी श्रीकृष्ण वहां पहुंचे और अर्जुन के इस व्यवहार को देखते ही उन्हें रुकने की आज्ञा दी। श्रीकृष्ण राजकुमार अर्जुन का यह रूप देखकर बेहद अचंभित हुए। वे समझ नहीं पा रहे थे कि आखिरकार ऐसी क्या बात हुई जो अर्जुन अपने ही प्रिय भाई युधिष्ठिर के प्राण लेने को तैयार हो गए।

तत्पश्चात अर्जुन ने उन्हें घटना का सार बताया और फिर श्रीकृष्ण को समझ आया कि आखिर बात क्या थी। उस समय भगवान कृष्ण ने अर्जुन को समझाया और बोले, “हे अर्जुन! मैं तुम्हारे अपने गांडीव के संदर्भ में लिए गए वचन का सम्मान करता हूं। वचनानुसार तुम्हें अपने ही ज्येष्ठ भ्राता को मार देने का पूरा हक है, परन्तु धार्मिक संदर्भों में यह पाप है।“

लेकिन दूसरी ओर अर्जुन भी अपने वचन से मजबूर थे। उनकी मंशा को और गहराई से समझते हुए श्रीकृष्ण बोले, “अर्जुन, यदि तुम्हे अपने वचन को पूरा करना है तो इसका एक अन्य साधन भी है। माना जाता है कि अपने से बड़ों का अनादर करना उन्हें मृत्यु दंड देने के समान होता है। यदि अभी तुम अपने ज्येष्ठ भ्राता का अपमान करो तो तुम्हारा वचन पूरा हो जाएगा।“

श्रीकृष्ण की आज्ञानुसार अर्जुन ने अगले ही पल युधिष्ठिर का तिरस्कार किया। अपने द्वारा किए गए इस अनादर को अर्जुन सहन ना कर सके और इस बार अपने ही प्राण लेने के लिए उन्होंने अपनी तलवार उठा ली। लेकिन भगवान कृष्ण ने उन्हें ऐसा करने नहीं दिया।

उन्होंने अर्जुन को बताया कि कैसे खुद के प्राणों का अंत करना यानी कि आत्मदाह करना शास्त्रों में अधर्म माना जाता है। और पाण्डवों द्वारा अधर्म के मार्ग पर चलना एक बहुत बड़ा पाप एवं अन्याय साबित होगा। इसीलिए उसे धर्म का मार्ग चुनना चाहिए।

इसके साथ ही श्रीकृष्ण ने कहा कि आत्मप्रशंसा, आत्मघात के समकक्ष है। इसलिए तुम दूसरों के सम्मुख अपनी वीरता की खुलकर तारीफ़ करो, जिससे तुम्हारा वचन पूरा हो जाएगा।

श्रीकृष्ण के इन वचनों को सुन धीरे-धीरे राजकुमार अर्जुन का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने खुद के सिर पर रखी उस तलवार को नीचे उतार कर फेंक दिया। इस प्रकार भगवान कृष्ण के निर्देशों से राजकुमार अर्जुन का वचन पूरा हुआ और साथ ही वह किसी भी प्रकार का अधर्म करने से बच गए।-
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11>ভগবানের বাহন কেন পশু ।

11>ভগবানের বাহন কেন পশু

 भगवानों के वाहन पशु ही क्यों होतेहैं?

किसी भी मंदिर में जाइए, किसी भी भगवान को देखिए, उनके साथ एक चीज सामान्य रूप से जुड़ी हुई है, वह है उनके वाहन।
लगभग सभी भगवान के वाहन पशुओं को ही माना गया ত্রিদেবের ধারিত প্রতীক
है। शिव के नंदी से लेकर दुर्गा के शेर तक और विष्णु के गरूढ़ से लेकर इंद्र के ऐरावत हाथी तक। लगभग सारे देवी-देवता पशुओं पर ही सवार हैं।

आखिर क्यों सर्वशक्तिमान भगवानों को पशुओं की सवारी की आवश्यकता पड़ी, जब की वे तो अपनी दिव्यशक्तियों से पलभर में कहीं भी आ-जा सकते हैं? क्यों हर भगवान के साथ कोई पशु जुड़ा हुआ है?

भगवानों के साथ जानवरों को जोडऩे केपीछे कई सारे कारण हैं।

इसमें अध्यात्मिक, वैज्ञानिक और व्यवहारिक कारणों से भारतीय मनीषियों ने भगवानों के वाहनों के रूप पशु-पक्षियों को जोड़ा है। वास्तव में देवताओं के साथ पशुओं कोउनके व्यवहार के अनुरूप जोड़ा गया है।

दूसरा सबसे बड़ा कारण है प्रकृति की रक्षा।

अगर पशुओं को भगवान के साथ नहीं जोड़ा जाता तो शायद पशु के प्रति हिंसा का व्यवहार और ज्यादा होता।

हर भगवान के साथ एक पशु को जोड़ कर भारतीय मनीषियों ने प्रकृति और उसमें रहने वाले जीवों की रक्षा का एक संदेश दिया है। हर पशु किसी न किसी भगवान का प्रतिनिधि है, उनका वाहन है, इसलिए इनकी हिंसा नहीं करनी चाहिए। मूलत: इसके पीछे एक यही संदेश सबसे बड़ा है।

आपको क्या लगता है? गणेश जी ने चूहों को यूं ही चुन लिया? या नंदी शिव की सवारी यूं ही बन गए?

भगवानों ने अपनी सवारी बहुत ही विशेष रूप से चुनी। यहां तक कि उनके वाहन उनकी चारित्रिक विशेषताओं को भी बताते हैं... भगवान गणेश और मूषक गणेश जी का वाहन है मूषक। मूषक शब्द संस्कृत के मूष से बना है जिसका अर्थ है लूटना या चुराना। सांकेतिक रूप से मनुष्य का दिमाग मूषक, चुराने वाले यानी चूहे जैसा ही होताहै। यह स्वार्थ भाव से गिरा होता है। गणेश जी का चूहे पर बैठना इस बातका संकेत है कि उन्होंने स्वार्थ परविजय पाई है और जनकल्याण के भाव को अपने भीतर जागृत किया है।

शिव और नंदी

जैसे शिव भोलेभाले, सीधे चलने वाले लेकिन कभी-कभी भयंकर क्रोध करने वाले देवता हैं तो उनका वाहन हैं नंदी बैल। संकेतों की भाषा में बैल शक्ति, आस्था व भरोसे का प्रतीक होता है। इसके अतिरिक्त भगवान के शिव का चरित्र मोह माया और भौतिक इच्छाओं से परे रहने वाला बताया गयाहै। सांकेतिक भाषा में बैल यानी नंदी इन विशेषताओं को पूरी तरह चरितार्थ करते हैं। इसलिए शिव का वाहन नंदी हैं।

कार्तिकेय और मयूर

कार्तिकेय का वाहन है मयूर। एक कथा के अनुसार यह वाहन उनको भगवान विष्णु से भेंट में मिला था। भगवान विष्णु ने कार्तिकेय की साधक क्षमताओं को देखकर उन्हें यह वाहन दिया था, जिसका सांकेतिक अर्थ था कि अपने चंचल मन रूपी मयूर को कार्तिकेय ने साध लिया है। वहीं एक अन्य कथा में इसे दंभ के नाशक के तौरपर कार्तिकेय के साथ बताया गया है।

मां दुर्गा और उनका शेर

दुर्गा तेज, शक्ति और सामथ्र्य का प्रतीक है तो उनके साथ सिंह है। शेर प्रतीक है क्रूरता, आक्रामकता और शौर्य का। यह तीनों विशेषताएं मां दुर्गा के आचरण में भी देखने को मिलती है। यह भी रोचक है कि शेर की दहाड़ को मां दुर्गा की ध्वनि ही माना जाता है, जिसके आगे संसार की बाकी सभी आवाजें कमजोर लगती हैं।

मां सरस्वती और हंस

हंस संकेतों की भाषा में पवित्रता और जिज्ञासा का प्रतीक है जो कि ज्ञान की देवी मां सरस्वती के लिए सबसे बेहतर वाहन है। मां सरस्वती काहंस पर विराजमान होना यह बताता है कि ज्ञान से ही जिज्ञासा को शांत किया जा सकता है और पवित्रता को जस का तस रखा जा सकता है।

भगवान विष्णु और गरुड़

गरुण प्रतीक हैं दिव्य शक्तियों और अधिकार के। भगवद् गीता में कहा गया है कि भगवान विष्णु में ही सारा संसार समाया है। सुनहरे रंग का बड़ेआकार का यह पक्षी भी इसी ओर संकेत करता है। भगवान विष्णु की दिव्यता और अधिकार क्षमता के लिए यह सबसे सही प्रतीक है।

मां लक्ष्मी और उल्लू

मां लक्ष्मी के वाहन उल्लू को सबसे अजीब चयन माना जाता है। कहा जाता है कि उल्लू ठीक से देख नहीं पाता, लेकिन ऐसा सिर्फ दिन के समय होता है। उल्लू शुभता और धन-संपत्ति के प्रतीक होते हैं।

ऐसे ही बाकी देवताओं के साथ भी पशुओं को उनके व्यवहार और स्वभाव केआधार पर जोड़ा गया।
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10>|| ত্রিদেবের ধারিত প্রতীক।

10>|| ত্রিদেবের ধারিত প্রতীক

।त्रिदेवो द्वारा धारित प्रतीक।

:।त्रिदेवो द्वारा धारित प्रतीक।

प्राकृतिक सत्ता के तीन अंग ब्रह्मा,विष्णु,एवं महेश जो क्रमशः सर्जक,पोषक एवं संहारक का कार्य करते है। उनके द्वारा धारित चिह्नो मेँ रहस्य छिपा है जिनका हमारे जीवन से सीधा सम्बन्ध है और हमेँ वे प्रेरणा प्रदान करते है -

सर्जक (ब्रह्मा) -

कमण्डल एवं माला - कमण्डल का जल हमेँ प्रेरणा देता है कि हमारा हर सर्जन (कार्य) प्राणवान होना चाहिए, संतो एवं महापुरुषो के निर्देशानुसार एवं सत्तचित्त होकर कार्य करने से हमारा हर कार्य अवश्य ही प्राणवान होगा।किसी भी कार्य मेँ एकाग्र होने के लिए लगन एवं सांतत्य की जरुरत होती है जो ब्रह्मा के हाथो मे विद्यमान माला से पूर्ण होती है ।वह हमें जप तप एवं भगवद् भक्ति की प्रेरणा देता है ।

पोषक(विष्णु) -

शंख एवं चक्र - शंखनाद का अर्थ- शुभ विचारो का सर्जक । जो मंगल क्रान्ति का प्रतीक है ।शंख हमेँ प्रेरणा देता है कि हर महानक्रान्तिकारी कार्य के मूल मे मंगल एवं शुभविचार ही होते है। शंखनाद से मन के अधिष्ठाता चन्द्रदेव प्रसन्न होते है , जिससे हमारे मन मेँ विशेष आह्लाद , उत्साह ,एवं सात्विकता का संचार होता है ।शंखनाद कर्त्ता को शंखघोष कान्तिमान एवं शक्तिमान बनाता है। साथ ही वातावरण के हानिकारक परमाणुओ को नष्ट करता है ।उसमेँ सात्विक आन्दोलन पैदा करता है, शंख का जल अमंगल का नाशक एवं पवित्रता वर्धक है जबकि सुदर्शन चक्र गतिसूचक है वह हमेँ प्रेरणा देता है कि हे मानव! यदि तू उन्नति चाहता है तो सत्पथ पर तत्परतापूर्वक आगे बढ भूतकाल को भूलकर नकारात्मकता एवं पलायनवादिता के हीन विचारो को भेदकर आगे बढ़।

संहारक (रुद्र ) -

त्रिशूल एवं डमरु - त्रिशूल संहार का प्रतीक है तो डमरु संगीत का ।

ये हमेँ प्रेरणा देते है कि जिस प्रकार क्रोध का आवाहन करके शिवजी त्रिशूल द्वारा दुष्टों का संहार करते हैँ तथा उल्लास का आव्हान करके डमरु द्वारा भक्तो को आह्लादित करते हैँ, फिर भी दोनो स्थितियो मेँ उनके हृदय मेँ समता एवं शांति निवास करती है।उसी प्रकार हमे भी दुष्ट जनो से लोहा लेने हेतु क्रोध को आव्हान करना पडे उस समय तथा आह्लाद सुख के क्षण आये उस समय भी अपने हृदय को सम एवं शांति बनाये रखना चाहिए ।त्रिशूल यह भी संकेत देता है कि जो तीनो गुणो(सत,रज,तम) पर विजय पाकर त्रिगुणातीत अवस्था को प्राप्त करते हैँ उन्हेँ संसार ताप रुपी शूल कष्ट नहीँ पहुँचा सकते हैँ इस प्रकार त्रिदेव के अस्त्र हमेँ प्रेरणा देते है कि जो मनुष्य अपने जीवन मेँ कोई महान कार्य करना चाहता है उसमेँ सर्जक , पोषक , एवं संहारक प्रतिभा होनी चाहिए।सर्जक प्रतिभान्तर्गत सद् विचारोँ का सर्जन आता है, जबकि पोषक प्रतिभा सद् वृत्ति का पोषण करती है , एवं संहारक प्रतिभा दुर्विचार तथा दुर्गुणो के संहार की योग्यता प्रदान करती है
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9>গরুড় পূরণে 36 নরক।

9>গরুড় পূরণে বর্ণিত ( 36 ) ছত্রিশ নরক


गरुड़ पुराण 36 नरकों

जय श्री विष्णु
गरुड़ पुराण के छत्तीस नरकों का विवरण :
गरुड़ पुराणः ये हैं 36 नर्क, जानिए किसमें कैसे दी जाती है सजा.
हिंदू धर्म ग्रंथों में लिखी अनेक कथाओं में स्वर्ग और नर्क के बारे में बताया गया है। पुराणों के अनुसार स्वर्ग वह
स्थान होता है जहां देवता रहते हैं और अच्छे कर्म करने वाले इंसान की आत्मा को भी वहां स्थान मिलता है,
इसके विपरीत बुरे काम करने वाले लोगों को नर्क भेजा जाता है, जहां उन्हें सजा के तौर पर गर्म तेल में तला
जाता है और अंगारों पर सुलाया जाता है।

हिंदू धर्म के पौराणिक ग्रंथों ने 36 तरह के मुख्य नर्कों का वर्णन किया गया है। अलग-अलग कर्मों के लिए

इन नर्कों में सजा का प्रावधान भी माना गया है। गरूड़ पुराण, अग्रिपुराण, कठोपनिषद जैसे प्रामाणिक ग्रंथों में
इसका उल्लेख मिलता है। आज हम आपको उन नर्कों के बारे में संक्षिप्त रूप से बता रहे हैं-
1. महावीचि // 2. कुंभीपाक // 3. रौरव //4. मंजूष //5. अप्रतिष्ठ // 6. विलेपक // 7. महाप्रभ
8. जयंती // 9. शाल्मलि // 10. महारौरव // 11. तामिस्र12. महातामिस्र // 13. असिपत्रवन
14. करम्भ बालुका // 15. काकोल // 16. कुड्मल // 17. महाभीम //18. महावट // 19. तिलपाक
20. तैलपाक //21. वज्रकपाट //22. निरुच्छवास // 23. अंगारोपच्य // 24. महापायी // 25. महाज्वाल
26. क्रकच //27. गुड़पाक //28. क्षुरधार // 29. अम्बरीष // 30. वज्रकुठार // 31. परिताप
32. काल सूत्र //33. कश्मल // 34. उग्रगंध // 35. दुर्धर //36. वज्रमहापीड
1. महावीचि- यह नर्क पूरी तरह रक्त यानी खून से भरा है और इसमें लोहे के बड़े-बड़े कांटे हैं। जो लोग गाय की हत्या करते हैं, उन्हें इस नर्क में यातना भुगतनी पड़ती है।
2. कुंभीपाक- इस नर्क की जमीन गरम बालू और अंगारों से भरी है। जो लोग किसी की भूमि हड़पते हैं या ब्राह्मण की हत्या करते हैं। उन्हें इस नर्क में आना पड़ता है।
3. रौरव- यहां लोहे के जलते हुए तीर होते हैं। जो लोग झूठी गवाही देते हैं उन्हें इन तीरों से बींधा जाता है।
4. मंजूष- यह जलते हुए लोहे जैसी धरती वाला नर्क है। यहां उनको सजा मिलती है, जो दूसरों को निरपराध बंदी बनाते हैं या कैद में रखते हैं।
5. अप्रतिष्ठ- यह पीब, मूत्र और उल्टी से भरा नर्क है। यहां वे लोग यातना पाते हैं, जो ब्राह्मणों को पीड़ा देते हैं या सताते हैं।
6. विलेपक- यह लाख की आग से जलने वाला नर्क है। यहां उन ब्राह्मणों को जलाया जाता है, जो शराब पीते हैं।
7. महाप्रभ- इस नर्क में एक बहुत बड़ा लोहे का नुकीला तीर है। जो लोग पति-पत्नी में फूट डालते हैं, पति-पत्नी के रिश्ते तुड़वाते हैं वे यहां इस तीर में पिरोए जाते हैं।
8. जयंती- यहां जीवात्माओं को लोहे की बड़ी चट्टान के नीचे दबाकर सजा दी जाती है। जो लोग पराई औरतों के साथ संभोग करते हैं, वे यहां लाए जाते हैं।
9. शाल्मलि- यह जलते हुए कांटों से भरा नर्क है। जो औरत कई पुरुषों से संभोग करती है व जो व्यक्ति हमेशा झूठ व कड़वा बोलता है, दूसरों के धन और स्त्री पर नजर डालता है। पुत्रवधू, पुत्री, बहन आदि से शारीरिक संबंध बनाता है व वृद्ध की हत्या करता है, ऐसे लोगों को यहां लाया जाता है।
10. महारौरव- इस नर्क में चारों तरफ आग ही आग होती है। जैसे किसी भट्टी में होती है। जो लोग दूसरों के घर, खेत, खलिहान या गोदाम में आग लगाते हैं, उन्हें यहां जलाया जाता है।
11. तामिस्र- इस नर्क में लोहे की पट्टियों और मुग्दरों से पिटाई की जाती है। यहां चोरों को यातना मिलती है।
12. महातामिस्र- इस नर्क में जौंके भरी हुई हैं, जो इंसान का रक्त चूसती हैं। माता, पिता और मित्र की हत्या करने वाले को इस नर्क में जाना पड़ता है।
13. असिपत्रवन- यह नर्क एक जंगल की तरह है, जिसके पेड़ों पर पत्तों की जगह तीखी तलवारें और खड्ग हैं। मित्रों से दगा करने वाला इंसान इस नर्क में गिराया जाता है।
14. करम्भ बालुका- यह नर्क एक कुएं की तरह है, जिसमें गर्म बालू रेत और अंगारे भरे हुए हैं। जो लोग दूसरे जीवों को जलाते हैं, वे इस कुएं में गिराए जाते हैं।
15. काकोल- यह पीब और कीड़ों से भरा नर्क है। जो लोग छुप-छुप कर अकेले ही मिठाई खाते हैं, दूसरों को नहीं देते, वे इस नर्क में लाए जाते हैं।
16. कुड्मल- यह मूत्र, पीब और विष्ठा (उल्टी) से भरा है। जो लोग दैनिक जीवन में पंचयज्ञों ( ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, मनुष्य यज्ञ) का अनुष्ठान नहीं करते वे इस नर्क में आते हैं।
17. महाभीम- यह नर्क बदबूदार मांस और रक्त से भरा है। जो लोग ऐसी चीजें खाते हैं, जिनका शास्त्रों ने निषेध बताया है, वो लोग इस नर्क में गिरते हैं।
18. महावट- इस नर्क में मुर्दे और कीड़े भरे हैं, जो लोग अपनी लड़कियों को बेचते हैं, वे यहां लाए जाते हैं।
19. तिलपाक- यहां दूसरों को सताने, पीड़ा देने वाले लोगों को तिल की तरह पेरा जाता है। जैसे तिल का तेल निकाला जाता है, ठीक उसी तरह।
20. तैलपाक- इस नर्क में खौलता हुआ तेल भरा है। जो लोग मित्रों या शरणागतों की हत्या करते हैं, वे यहां इस तेल में तले जाते हैं।
21. वज्रकपाट- यहां वज्रों की पूरी श्रंखला बनी है। जो लोग दूध बेचने का व्यवसाय करते हैं, वे यहां प्रताड़ना पाते हैं।
22. निरुच्छवास- इस नर्क में अंधेरा है, यहां वायु नहीं होती। जो लोग दिए जा रहे दान में विघ्न डालते हैं वे यहां फेंके जाते हैं।
23. अंगारोपच्य- यह नर्क अंगारों से भरा है। जो लोग दान देने का वादा करके भी दान देने से मुकर जाते हैं। वे यहां जलाए जाते हैं।
24. महापायी- यह नर्क हर तरह की गंदगी से भरा है। हमेशा असत्य बोलने वाले यहां औंधे मुंह गिराए जाते हैं।
25. महाज्वाल- इस नर्क में हर तरफ आग है। जो लोग हमेशा ही पाप में लगे रहते हैं वे इसमें जलाए जाते हैं।
26. गुड़पाक- यहां चारों ओर गरम गुड़ के कुंड हैं। जो लोग समाज में वर्ण संकरता फैलाते हैं, वे इस गुड़ में पकाए जाते हैं।
27. क्रकच- इस नर्क में तीखे आरे लगे हैं। जो लोग ऐसी महिलाओं से संभोग करते हैं, जिसके लिए शास्त्रों ने निषेध किया है, वे लोग इन्हीं आरों से चीरे जाते हैं।
28. क्षुरधार- यह नर्क तीखे उस्तरों से भरा है। ब्राह्मणों की भूमि हड़पने वाले यहां काटे जाते हैं।
29. अम्बरीष- यहां प्रलय अग्रि के समान आग जलती है। जो लोग सोने की चोरी करते हैं, वे इस आग में जलाए जाते हैं।
30. वज्रकुठार- यह नर्क वज्रों से भरा है। जो लोग पेड़ काटते हैं वे यहां लंबे समय तक वज्रों से पीटे जाते हैं।
31. परिताप- यह नर्क भी आग से जल रहा है। जो लोग दूसरों को जहर देते हैं या मधु (शहद) की चोरी करते हैं, वे यहां जलाए जाते हैं।
32. काल सूत्र- यह वज्र के समान सूत से बना है। जो लोग दूसरों की खेती नष्ट करते हैं। वे यहां सजा पाते हैं।
33. कश्मल- यह नर्क नाक और मुंह की गंदगी से भरा होता है। जो लोग मांसाहार में ज्यादा रुचि रखते हैं, वे यहां गिराए जाते हैं।
34. उग्रगंध- यह लार, मूत्र, विष्ठा और अन्य गंदगियों से भरा नर्क है। जो लोग पितरों को पिंडदान नहीं करते, वे यहां लाए जाते हैं।
35. दुर्धर- यह नर्क जौक और बिच्छुओं से भरा है। सूदखोर और ब्याज का धंधा करने वाले इस नर्क में भेजे जाते हैं।
36. वज्रमहापीड- यहां लोहे के भारी वज्र से मारा जाता है। जो लोग सोने की चोरी करते हैं, किसी प्राणी की हत्या कर उसे खाते हैं, दूसरों के आसन, शय्या और वस्त्र चुराते हैं, जो दूसरों के फल चुराते हैं, धर्म को नहीं मानते ऐसे सारे लोग यहां लाए जाते हैं।

➡ : उन कामों के बारे में जानिए, जिन्हें करने से नर्क जाना पड़ता है।
1. जो कुएं, तालाब, प्याऊ और मार्ग आदि को हानि पहुंचाते हैं, ऐसे दुष्ट नरक में जाते हैं।
2. आत्महत्या, स्त्री हत्या, गर्भ हत्या, ब्रह्म हत्या, गौ हत्या करने वाला, झूठी गवाही देने वाला, कन्या को बेचने वाला, झूठ बोलने वाले लोग नर्क में जाते हैं।
3. जो लोग भगवान शिव और विष्णु का चिंतन नहीं करते, उन्हें नर्क में जाना पड़ता है।
4. ऋषियों, सतियों और वेदों की निंदा करने वाले लोग सदैव नर्क में ही जाते हैं।
5. भूख-प्यास से थक कर जो भिखारी किसी के घर जाता हो और उसे वहां से अपमानित होकर लौटना पड़े, तो ऐसे याचक (मांगने वाला) का अपमान करने वाले नरक में जाते हैं।
6. जो शराब, मांस, गीत, जुआं आदि व्यसनों में ही दिन-रात लगे रहते हैं, ऐसे लोगों को नरक ही प्राप्त होता है।
7. जो अपनी पत्नी, बच्चों, नौकरों और मेहमानों को खिलाए बिना ही खाते हैं और पितरों तथा देवताओं की पूजा छोड़ देते हैं, ऐसे लोग नरक में जाते हैं।
8. दूसरों का धन हड़पने वाले, दूसरों के गुणों में दोष देखने वाले तथा दूसरों से ईष्र्या करने वाले नरक में जाते हैं।
9. जो अनाथ, गरीब, रोगी, बूढ़े और दयनीय लोगों पर दया नहीं करता, वह नरक में जाता है।
10. ब्राह्मण होकर शराब व मांस का सेवन करने वाला, ब्राह्मण की जीविका नष्ट करने वाला और दूसरों की संपत्ति का हरण करने वाला, ये सभी नर्क को ही प्राप्त होते हैं।

➡ :इन नरकों से बचने का एक मात्र हरि नाम ही सहारा है. हरि नाम जितना ले सकते हैं लें प्रेम से बोलिए ''जय श्री हरी'' ''जय श्री कृष्ण''
जय जय श्री राधे...:-)
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8>গরুড় পুরাণ-সফলতা ( 6 )টি উপায় ।

8>গরুড় পুরাণ অনুসারে জীবনে সফলতা লাভের ছয় ( 6 )টি উপায়


गरुड़ पुराण| सफलता दिला सकते हैं ये 6 उपाय।

गरुड़ पुराण में कई ऐसी बातें बताई गई हैं, जो किसी को भी जीवन में सफलता दिला सकती है। गरुड़ पुराण के एक श्लोक के अनुसार, जिस किसी को भी अपने जीवन में उन्नति की इच्छा हों, उन्हें इन 6 की हमेशा पूजा-अर्चना करनी चाहिए।

श्लोक-
"विष्णुरेकादशी गंगा तुलसीविप्रधेवनः।
असारे दुर्गसंसारे षट्पदी मुक्तिदायिनी।।"

हर किसी को सफलता दिला सकते हैं ये 6 उपाय।

1. भगवान विष्णु

गरुड़ पुराण के अनुसार, भगवान विष्णु अपने भक्तों के सभी दुःखों को खत्म करके उनके जीवन में सुख-शांति प्रदान करते हैं। जो मनुष्य रोज अपने दिन की शुरुआत भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करके करता है, उसे अपने काम में सफलता मिलती है। ध्यान रखें भगवान की पूजा करने से पहले स्नान आदि करके शुद्ध हो जाएं।

2. एकादशी-व्रत-

ग्रंथों और पुराणों में एकादशी व्रत को सबसे श्रेष्ठ बताया गया है। पुराणों के अनुसार, जो मनुष्य प्रत्येक एकादशी को पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ व्रत रखता है, उसे निश्चित ही इसका शुभ फल मिलता है। व्रत करने के अलावा एकादशी के दिन जुआ खेलना, शराब पीना, हिंसा करना आदि काम वर्जित हैं। इसलिए, एकादशी पर व्रत करने के साथ ही इन कामों से दूर रहें।

3. गंगा नदी'-

गंगा नदी को सभी नदियों में सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। हर किसी को गंगा नदी को देव तुल्य मान कर, हमेशा उसकी पूजा-अर्चना करनी चाहिए। किसी भी रूप में गंगा का अपमान न करें। इस बातों का ध्यान रखने वाले मनुष्य को निश्चित ही अपने हर काम में सफलता मिलती है।

4. तुलसी-

तुलसी भगवान का ही एक रूप है। तुलसी को अपने घर में लगाना, रोज उसे जल देना और उसकी पूजा करना शुभ माना जाता है। हर किसी को रोज भगवान विष्णु के प्रसाद में तुलसी पत्र रखना चाहिए और विष्णु पूजा के बाद तुलसी पूजा करनी चाहिए।

5. पंडित या ज्ञानी-

पंडितों या ज्ञानी मनुष्य को सम्मान का पात्र समझना चाहिए। कई लोग इनका मजाक उड़ाते हैं, जो कि बहुत ही गलत माना जाता है। जो मनुष्य ज्ञानी लोगों का सम्मान करता है और उनकी बताई बातों का पालन अपने जीवन में करता है, वह हर परेशानी का सामना आसानी से कर लेता है और हर काम में सफल होता है।

6. गाय-

गाय को हिंदू धर्म में पूजनीय माना जाता है। गाय के शरीर के अलग-अलग भागों में सभी देवी-देवताओं का वास माना जाता है। जो मनुष्य गाय को देव तुल्य मान कर उसकी पूजा-अर्चना करता है, उसकी सभी परेशानियों का अंत हो जाता है। साथ ही गाय की पूजा करने और उसे भोजन खिलाने से मनुष्य को अपने जाने-अनजाने किए गए पापों से भी मुक्ति मिल जाती है।

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Tuesday, May 7, 2019

7>|| গান্ধারী সর্বশ্রেষ্ঠ মাতা কেন?

7>গান্ধারী সর্বশ্রেষ্ঠ মাতা কেন?

গান্ধারী, গান্ধার নরেশ পুত্রী। শকুনী গান্ধার দেশের যুবরাজ এবং গান্ধারীর ভাই।
হস্তিনাপুরের বোরো রাজকুমার ধৃতরাষ্ট জন্মান্ধ ছিলেন। ভীষ্ম দেব সহিত সমস্ত কুরু সমাজ
ধৃতরাষ্টের বিবাহ বিষয়ে চিন্তিত ছিলেন। কিন্তু অন্ধ রাজকুমার কে কোন রাজকুমারী ই
বড়মালা দিতে ইচ্ছুক নয়। সেই কারণেই একমাত্র উপায় কোনো রাজকুমারীকে অপহরণ
করে নিয়ে এসে ধৃতরাষ্টের সাথে বিবাহ দেওয়া।

কিন্তু অম্বিকা যিনি ধৃতরাষ্টের মাতা এমন কুকর্মের জন্য নিষেধ করলেন কারণ তিনি নিজে
এমন কৃত কর্মের ফল ভোগ করেছেন।

অতয়েব ভীষ্ম  গান্ধার রাজের কাছে ধৃতরাষ্টের বিবাহের  প্রস্তাব নিয়ে পৌঁছলে গান্ধার রাজ্
সে সম্বন্ধ কঠোর ভাবে প্রত্যাখ্যান করলেন। কুরু রাজ্যের থেকে গান্ধার রাজ্ একটু কম
শক্তি শালী তাই ভীষ্ম দেব গান্ধার রাজকে যুদ্ধের ভয় দেখালেন।
তখন দেশ ভক্ত গান্ধারী কুরু সেনাদের হাত থেকে নিজেদের রাজ্য বাসীর কে বাঁচাতে
নিজের আত্ম বলিদান স্বরূপ বিবাহে সম্মতিই শ্রেষ্ঠ মনে করলেন। এবং বিবাহে নিজের
সম্মতি জানালেন কিন্তু মনে মনে এহেন অপমানের প্রতিশোধ নেবার জন্য নিজের ভাই
শকুনীর সাথে পরামর্শ করে কুরু বংশের ধ্বসংষের প্রতিজ্ঞা করলেন।
সেই প্রতিশোধের আগুনে জ্বলে নিজে হস্তিনাপুর  রাজ্য নিজের চোখে দেখবেন না ,এমন চিন্তা
করে নিজে নিজের চোখে পট্টি বেঁধে রাখলেন।  এমন ভাব দেখালেন যেন যেহেতু তার
স্বামী অন্ধ তাই তিনিও অন্ধ হয়ে দিন কাটাবেন।
এমত অবস্থায় শকুনী ভীষণ ক্রোধে হস্তিনাপুরের সর্বনাশ করবার জন্য প্রতিজ্ঞা করে
গান্ধারীর সাথে হস্তিনাপুর গেলেন।


1>गांधारी =माता गांधारी भरत कुल की सभी माताओ में सर्वश्रेठ थी क्यो ?

हस्तिनापुर मे माता गांधारी ने अपने पुत्र को हस्तिनापुर का युवराज बनाने के लिए माता कुंती के पुत्र से पहले जन्म देना चाहा परन्तु देवयोग से ये हो ना सका।

अतः उन्होने क्रोध मे अपने गर्भ पर घुसो से मारा और उस समय पुत्र गर्भ से गिर गया पर वह पुत्र हालातों से मुकाबला करके बच गया तथा इस तरह की युद्धजनक परिस्थितियो मे बच निकलने के कारण उसका नाम सुयोधन (दुर्योधन) रखा गया।

उन्होने प्रारंभ मे सुयोधन के मन मे अपनी महत्वकाँशा की परते जमाई परन्तु बाद मे शकुनी के अधार्मिक आचरण को समझ उन्होने कुरू राज्यसभा मे द्रोपद्दि के वस्त्रहरण का विरोध किया।

अब समय के साथ माता गांधारी अधर्म को समझ चुकी थी तथा उन्हे इस बात का भलीभाँति ज्ञान हो गया था कि शकुनी का साथ व अधर्म की नीति उनके पुत्रो के लिए घातक है।

परन्तु धर्म युद्ध के समय जब सुयोधन(दुर्योधन) उनसे विजय का आशीर्वाद माँगने आया तब उन्होने धर्म की रक्षा के लिए उसे विजयश्री का आशीर्वाद नही दिया। ऐसा करके उन्होने धर्म के प्रति अपनी निष्ठा दिखाई।

परंतु माता की अपने पुत्रो के प्रति निष्ठा कभी कम नही होती अतः उन्होने युद्ध के आख़िर मे दुर्योधन को अपने सतीत्व का कवच पहनाकर उसके शरीर को लोहे के समान कठोर बना दिया। इसी पुत्र निष्ठा के अधीन होकर उन्होंने वासुदेव कृष्ण को श्राप भी दिया की "हे वासुदेव कृष्ण ! तुम चाहते तो ये युद्ध टल सकता था,तुम्हारे ही रोष के कारण ये युद्ध हुआ है अतः मैं तुम्हे श्राप देती हू की जिस तरह मैंने अपने सौ पुत्र खोये है उसी तरह तुम्हारे कुल भी नाश हो जायेगा और चाहे तुम मानव हो या भगवान् परन्तु एक साधारण व्याघ्र के हाथो मारे जाओगे। "

परन्तु माता गांधारी भरत कुल की सभी माताओ में सर्वश्रेठ थी क्योकि न केवल उन्होंने धर्म का पालन किया अपितु माता होने का कर्तव्य का भी पूर्ण निर्वहन किया।

आज जब भी इस महासमर की बातें होती है तब धर्म की विजय और अधर्म की पराजय के बारे में बोला जाता है परन्तु इस महासमर में सभी ने कुछ न कुछ खोया है ;और माता गांधारी ने धर्म की विजय के खातिर अपना सबकुछ खोया है |

वे इस युद्ध में धर्म की ओर से खडी एक पराजित योद्धा थी। परन्तु सौ पुत्र खोने के बाद भी धर्म से मुख न मोड़ने के कारण इस गंधार राजकुमारी को इतिहास सदैव याद रखेगा।

6> || অক্ষয় তৃতীয়া ||


 

 6>  || অক্ষয় তৃতীয়া ||
                 <-----©-আদ্যনাথ--->

অক্ষয় অর্থে ক্ষয়প্রাপ্ত হয় না।
চান্দ্র বৈশাখ মাসের শুক্লাতৃতীয়া,
এই দিনটি আমাদের অক্ষয় তৃতীয়া।
যে কোনও শুভ কাজের আদর্শ দিন,
তাই আমাদের প্রিয় অক্ষয় তৃতীয়ার দিন।
হিন্দু ও জৈন  সকলের মান্য বিশেষ দিন।

এমন শুভদিনে জন্মে ছিলেন পরশুরাম
যিনি বিষ্ণুর ষষ্ঠ অবতার।

মহাভারতের রচনা শুরু হয়ে ছিলো এদিন।
মহর্ষি বেদব্যাস বলছেন,
আর  ভগবান গণেশ লিখে চলেছেন,
মহাভারত মহাকাব্য।
যে কাব্য পঞ্চম বেদ হিসেবে স্বীকৃত।

এই দিনেই হয়েছিল সত্য যুগ শেষ আর ত্রেতাযুগের সূচনা।
এই দিনেই ভগীরথ গঙ্গা দেবীকে
এনে ছিলেন মর্ত্যে । এদিনই কুবেরের তপস্যায় তুষ্ট মহাদেব
অতুল ঐশ্বর্য প্রদান করেন কুবেরকে।
এদিনই কুবেরের হয়েছিল লক্ষ্মী লাভ
তাই এদিন বৈভব-লক্ষ্মী পূজায় হয় লাভ।

এইদিন থেকেই পুরীধামে জগন্নাথদেবের
রথযাত্রার রথ নির্মাণ কার্য্য হয় শুরু হয়।

এই পবিত্র তিথিতে সকল শুভকার্যের
অনন্তকাল শুভ অক্ষয় লাভ হয়।
অশুভ কার্যে অশুভ অক্ষয় পাপ হয়।

কেদার-বদ্রী-গঙ্গোত্রী-যমুনোত্রীর
এইদিনেই সকল দুয়ার খোলে।
দীর্ঘ ছয়মাস বন্ধ থাকার পরে।

দ্বার খুললেই হয় দর্শন অক্ষয় প্রদীপের,
যে প্রদীপ জ্বালিয়ে আসা হয়েছিল
দীর্ঘ সেই ছয়মাস আগে,
দুয়ার বন্ধের কালে।

বর্তমানে শহর ও গ্রামে এই তিথিতে
গৃহী সকলে সোনা, রূপার গয়না কেনেন।
ভাবনা এমন এই শুভ তিথিতে
রত্ন বা সোনা ক্রয়ে গৃহে শুভ যোগ হবে,
সাথে শুখ ও সম্পদ বৃদ্ধি হবে।

বিষ্ণু পূরণে পাই
এক অহংকারী কৃপণ ব্রাহ্মণের কাহিনি।

একদিন খিদে,পিপাসায় কাতর এক ব্যক্তি
এলেন ব্রাহ্মণের দ্বারে
জল পিপাসায় অতি ক্লান্ত হয়ে।
ব্রাহ্মণ দরজা বন্ধ করে দিলেন।
কিন্তু ব্রাহ্মণ-পত্নী ছিলেন দয়াবতী অতি,
স্বামীর নিষেধ অমান্য করে তিনি
তৃষ্ণার্ত ব্যক্তিকে অন্ন ও জলদিলেন।

মৃত্যুর পর ব্রাহ্মণের ঠাঁই হয় নরক লোকে।
সেখানে অন্ন-জল বিনা নিদারুণ কষ্টে
ব্রাহ্মণের আত্মার দিন কাটে।
অবশেষে পত্নীর পুণ্যকর্ম স্পর্শে
মুক্তি পেল ব্রাহ্মণের আত্মা।
ব্রাহ্মণের হলো পুনর্জন্ম লাভ ।
তৎপর স্বপ্নাদেশে ব্রাহ্মণ
নিজ কুকর্মের কথা জানালেন।
আর মুক্তির উপায় হেতু
করেন ভক্তিভরে অক্ষয় তৃতীয়ার ব্রত।
পূর্ব জন্মের পাপস্ক্ষালন হল নবজন্মে।

আবার দ্বাপর যুগের মহান কথা,
বাল্যসখা সুদামা গেলেন বৃন্দাবন থেকে
সুদূর দ্বারকায় শ্রীকৃষ্ণের সঙ্গে দেখা করতে
সুরমা এনেছিলেন কাপড়ের পুটুলিতে বেঁধে
তিনমুঠো তণ্ডুল।
কৃষ্ণ পরম তৃপ্তিতে তণ্ডুল করেন গ্রহণ,
সেদিনও ছিলো অক্ষয় তৃতীয়া,
এই দিনেই কৃষ্ণ করেন সুদামার দারিদ্র‌ দূর।
আর দিলেন উপহার অঢেল সম্পদ দান।
সুদামা ফিরে এসে বৃন্দাবনে দেখেন
কোথায় তাঁর পর্ণকুটির!
সেখানে সুন্দর এক বাড়ি।
রয়েছেন স্ত্রী বসুন্ধরা ও সন্তানরা।

পৌরাণিক কথা অনুসারে শ্রীকৃষ্ণের কাছে
অক্ষয় তৃতীয়ার মাহাত্ম্য জানতে চাইলেন রাজা যুধিষ্ঠির।
উত্তরে কৃষ্ণ একটি বাক্যই করেন প্রয়োগ,
জেনে রাখুন এই দিনের মাহাত্ম্য অনন্ত।

পাণ্ডবদের বনবাসের কালে যুধিষ্ঠিরকে
সূর্য ভগবান অক্ষয় তৃতীয়ার দিনেই
অক্ষয় পাত্র করেছিলেন দান।
আর এই অক্ষয় তৃতীয়ার দিনই কৃষ্ণ
করেছিলেন দ্রৌপদীর লজ্জা নিবারণ।

অক্ষয় তৃতীয়ার দিনে
মা গঙ্গা মর্তে অবতরণ করেন।
এদিন শিব, গঙ্গা, কৈলাস, হিমালয় ও
ভগীরথ পূজা গ্রহণ করেন।

কৃষিপ্রধান দেশ ভারতবর্ষ,
অক্ষয় তৃতীয়ার দিনটিতে
অনেকে ই ধরিত্রীদেবীর পুজো করেন।

এইটুকুই আমার মস্তিষ্ক ভাণ্ডারে
অক্ষয় তৃতীয়ার জ্ঞান।

       <-----©-আদ্যনাথ--->       
     【--anrc--08/05/2019---】
     【=রাত্রি:01:31:22=】 【=তেঘড়িয়া=কোলকাতা -59=】
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