Tuesday, May 7, 2019

7>|| গান্ধারী সর্বশ্রেষ্ঠ মাতা কেন?

7>গান্ধারী সর্বশ্রেষ্ঠ মাতা কেন?

গান্ধারী, গান্ধার নরেশ পুত্রী। শকুনী গান্ধার দেশের যুবরাজ এবং গান্ধারীর ভাই।
হস্তিনাপুরের বোরো রাজকুমার ধৃতরাষ্ট জন্মান্ধ ছিলেন। ভীষ্ম দেব সহিত সমস্ত কুরু সমাজ
ধৃতরাষ্টের বিবাহ বিষয়ে চিন্তিত ছিলেন। কিন্তু অন্ধ রাজকুমার কে কোন রাজকুমারী ই
বড়মালা দিতে ইচ্ছুক নয়। সেই কারণেই একমাত্র উপায় কোনো রাজকুমারীকে অপহরণ
করে নিয়ে এসে ধৃতরাষ্টের সাথে বিবাহ দেওয়া।

কিন্তু অম্বিকা যিনি ধৃতরাষ্টের মাতা এমন কুকর্মের জন্য নিষেধ করলেন কারণ তিনি নিজে
এমন কৃত কর্মের ফল ভোগ করেছেন।

অতয়েব ভীষ্ম  গান্ধার রাজের কাছে ধৃতরাষ্টের বিবাহের  প্রস্তাব নিয়ে পৌঁছলে গান্ধার রাজ্
সে সম্বন্ধ কঠোর ভাবে প্রত্যাখ্যান করলেন। কুরু রাজ্যের থেকে গান্ধার রাজ্ একটু কম
শক্তি শালী তাই ভীষ্ম দেব গান্ধার রাজকে যুদ্ধের ভয় দেখালেন।
তখন দেশ ভক্ত গান্ধারী কুরু সেনাদের হাত থেকে নিজেদের রাজ্য বাসীর কে বাঁচাতে
নিজের আত্ম বলিদান স্বরূপ বিবাহে সম্মতিই শ্রেষ্ঠ মনে করলেন। এবং বিবাহে নিজের
সম্মতি জানালেন কিন্তু মনে মনে এহেন অপমানের প্রতিশোধ নেবার জন্য নিজের ভাই
শকুনীর সাথে পরামর্শ করে কুরু বংশের ধ্বসংষের প্রতিজ্ঞা করলেন।
সেই প্রতিশোধের আগুনে জ্বলে নিজে হস্তিনাপুর  রাজ্য নিজের চোখে দেখবেন না ,এমন চিন্তা
করে নিজে নিজের চোখে পট্টি বেঁধে রাখলেন।  এমন ভাব দেখালেন যেন যেহেতু তার
স্বামী অন্ধ তাই তিনিও অন্ধ হয়ে দিন কাটাবেন।
এমত অবস্থায় শকুনী ভীষণ ক্রোধে হস্তিনাপুরের সর্বনাশ করবার জন্য প্রতিজ্ঞা করে
গান্ধারীর সাথে হস্তিনাপুর গেলেন।


1>गांधारी =माता गांधारी भरत कुल की सभी माताओ में सर्वश्रेठ थी क्यो ?

हस्तिनापुर मे माता गांधारी ने अपने पुत्र को हस्तिनापुर का युवराज बनाने के लिए माता कुंती के पुत्र से पहले जन्म देना चाहा परन्तु देवयोग से ये हो ना सका।

अतः उन्होने क्रोध मे अपने गर्भ पर घुसो से मारा और उस समय पुत्र गर्भ से गिर गया पर वह पुत्र हालातों से मुकाबला करके बच गया तथा इस तरह की युद्धजनक परिस्थितियो मे बच निकलने के कारण उसका नाम सुयोधन (दुर्योधन) रखा गया।

उन्होने प्रारंभ मे सुयोधन के मन मे अपनी महत्वकाँशा की परते जमाई परन्तु बाद मे शकुनी के अधार्मिक आचरण को समझ उन्होने कुरू राज्यसभा मे द्रोपद्दि के वस्त्रहरण का विरोध किया।

अब समय के साथ माता गांधारी अधर्म को समझ चुकी थी तथा उन्हे इस बात का भलीभाँति ज्ञान हो गया था कि शकुनी का साथ व अधर्म की नीति उनके पुत्रो के लिए घातक है।

परन्तु धर्म युद्ध के समय जब सुयोधन(दुर्योधन) उनसे विजय का आशीर्वाद माँगने आया तब उन्होने धर्म की रक्षा के लिए उसे विजयश्री का आशीर्वाद नही दिया। ऐसा करके उन्होने धर्म के प्रति अपनी निष्ठा दिखाई।

परंतु माता की अपने पुत्रो के प्रति निष्ठा कभी कम नही होती अतः उन्होने युद्ध के आख़िर मे दुर्योधन को अपने सतीत्व का कवच पहनाकर उसके शरीर को लोहे के समान कठोर बना दिया। इसी पुत्र निष्ठा के अधीन होकर उन्होंने वासुदेव कृष्ण को श्राप भी दिया की "हे वासुदेव कृष्ण ! तुम चाहते तो ये युद्ध टल सकता था,तुम्हारे ही रोष के कारण ये युद्ध हुआ है अतः मैं तुम्हे श्राप देती हू की जिस तरह मैंने अपने सौ पुत्र खोये है उसी तरह तुम्हारे कुल भी नाश हो जायेगा और चाहे तुम मानव हो या भगवान् परन्तु एक साधारण व्याघ्र के हाथो मारे जाओगे। "

परन्तु माता गांधारी भरत कुल की सभी माताओ में सर्वश्रेठ थी क्योकि न केवल उन्होंने धर्म का पालन किया अपितु माता होने का कर्तव्य का भी पूर्ण निर्वहन किया।

आज जब भी इस महासमर की बातें होती है तब धर्म की विजय और अधर्म की पराजय के बारे में बोला जाता है परन्तु इस महासमर में सभी ने कुछ न कुछ खोया है ;और माता गांधारी ने धर्म की विजय के खातिर अपना सबकुछ खोया है |

वे इस युद्ध में धर्म की ओर से खडी एक पराजित योद्धा थी। परन्तु सौ पुत्र खोने के बाद भी धर्म से मुख न मोड़ने के कारण इस गंधार राजकुमारी को इतिहास सदैव याद रखेगा।

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